अग्नि आलोक
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*वेदों में आधुनिक विज्ञान जैसा कुछ भी नहीं*

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          ~ पुष्पा गुप्ता 

कतिपय पूर्वांग्रही लोग वेदों में विज्ञान के नाम पर जनता को गुमराह करने की कोशिश करते रहते हैं, उनका कहना है कि वैदिक काल में विज्ञान उन्नत अवस्था में था और आज से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं था। क्या यह सही है? 

      दरअसल, जब से मानव धरती पर आया तभी से वह तमाम प्राकृतिक घटनाओं को देखकर अपना निष्कर्ष निकालने की कोशिश करता रहा है। ऐसा वैदिक काल में भी हुआ होगा। उदाहरण के लिए सूर्योदय और सूर्यास्त का प्रतिदिन होना। मौसम का बदलाव एक अंतराल के बाद होना। जैसे जाड़ा, गर्मी और बरसात का एक निश्चित समय पर आना। वर्षा से ही वर्ष की अवधारणा बनी। 

      वैदिक काल में 366 दिन का एक वर्ष माना जाता था। ऐतरेय ब्राह्मण (7.17) में तो 360 दिन का ही वर्ष माना गया है। आजकल यह संख्या 365.24219 दिन की है लेकिन यह बहुत बड़ा अंतर है। इस वैदिक काल गणना के अनुसार एक सौ साल में 75 दिनों का अंतर आ जायेगा। इस अंतर को वैदिकजन कैसे समायोजित करते होंगे, इसकी जानकारी नहीं है क्योंकि बिना समायोजन के वेध के अनुसार वर्षारंभ के समय उक्त गणना तपती गर्मी बता रही होगी क्योंकि गणना 75 दिन पीछे का समय बता रही होगी। कोई न कोई विधि इस स्थिति से निपटने के लिए अवश्य रही होगी।

स्पष्ट है कि पुराकालीन मानव समाज गणना एवं वेध का काम तो कर रहा था परन्तु वैदिक काल में इतनी सूक्ष्मता से गणना नहीं की जाती रही है। अब इसी तरह की कुछ और बातों पर चर्चा कर लेना ठीक रहेगा। वास्तव में विज्ञान निरन्तर अन्वेषण करता रहता है। वैदिक जन भी कुछ प्रयास करते रहे होंगे परंतु तब विज्ञान आज की तरह सुव्यवस्थित नहीं था।

*वेदों में पृथ्वी अचला (स्थिर) है :*

       पृथ्वी में जरा- सा कम्पन भूकंप लाता है. कई बार शहर के शहर को तहस-नहस कर डालता है. पृथ्वी अपनी धुरी पर नाचती हुई सूर्य के भी चक्कर लगाए तो?

     ऋग्वेद-2.12.2 में कहा गया है कि हे मनुष्यो, जिसने कांपती हुई पृथ्वी को स्थिर किया, वह इन्द्र है।

इसी तरह यजुर्वेद 32/6 में कहा गया है कि जिस देवता ने पृथ्वी को स्थिर किया; और भी अनेक रूपों वाली विस्तृत और अचल भूमि की इन्द्र रक्षा करता है.

    ~अथर्ववेद (12.1.17)

आज भी संस्कृत और हिन्दी के शब्दकोशों में पृथ्वी का एक नाम ‘अचला’ (स्थिर या गतिहीन) है। इन सब बातों से स्पष्ट हो रहा है कि उस समय के लोग पृथ्वी को गतिहीन मानते थे लेकिन आधुनिक विज्ञान से यह सिद्ध है कि पृथ्वी गतिशील है।   

     पृथ्वी को गतिशील सिद्ध करने के लिए वेदों में विज्ञान खोज निकालने वालों ने ऋग्वेद के एक दूसरे मंत्र का सहारा लिया है जो निम्नलिखित है :

     या गौर्वर्तनिं पर्येति निष्कृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः।

सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते॥       

   ~ऋग्वेद [10.65.6].

वेदों से विज्ञान निकालने वालों ने इसका अर्थ किया है :

     पृथ्वी निरंतर अन्नरस आदि से प्राणियों को पूर्ण करती हुई तथा अपने नियम का पालन करती, ईश्वरीय महिमा का उपदेश करती, दानी,श्रेष्ठजन और विद्वानों को सुख देती हुई, अपनी कक्षा में सूर्य के चारों और घूमती है।

     सोचने की बात है कि मूल पाठ में ऐसा एक भी शब्द नहीं है जिसका अर्थ ‘अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमती है’ बनता हो।

दरअसल यह मंत्र पृथ्वी विषयक है ही नहीं। प्रस्तुत मंत्र में दूध देने और आहुतियों की सामग्री जुटाने वाली गाय है। अतः विद्वानों ने इस मंत्र का ठीक तौर पर अर्थ ऐसे किया है :

      जो गाय स्वयं पवित्र स्थान यज्ञ में आती है, वह दूध देते हुए यज्ञ कर्म को सम्पन्न करती है। मेरी इच्छा है कि वह गाय दाता वरुण और अन्यान्य देवों को होमीय द्रव्य (दूध और घी आदि) दे और मुझ देवसेवक की रक्षा करे।

     एक दूसरे मंत्र का भी इस काम के लिए सहारा लिया जाता है :

   आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन् मातरं पुरः। पितरञ्च प्रयन्त्स्वः॥

      ~यजुर्वेद (अ॰ 3).

  वेदों से विज्ञान निकालने वाले इसका अर्थ इस प्रकार करते हैं :

   यह पृथ्वी जल को प्राप्त होकर अर्थात् जल सहित अंतरिक्ष में आक्रमण करती है अर्थात् अपनी धूरी पर घूमती है और सूर्य के चारों ओर घूमती है।

     इस अर्थ की गलती कोई भी पकड़ सकता है। आक्रमण का अर्थ ‘अपनी धूरी पर घूमती है’ किसी तरह भी सिद्ध नहीं होता है। मंत्र में ऐसा कोई शब्द नहीं है जिसका अर्थ ‘सूर्य के चारों ओर घूमती है’ होता हो।

     इस मंत्र का देवता अग्नि होने के कारण अग्नि की स्तुति की गई है जबकि विज्ञान निकालने वालों के अर्थ में अग्नि का नाम भूल से भी नहीं आया है। उबट और महीधर के भाष्य भी विज्ञान निकालने वालों की बात की पुष्टि नहीं करते।

    उक्त दोनों वेद-भाष्यकर्ताओं ने इस मंत्र का अर्थ इस प्रकार किया है :

    इस यज्ञसिद्धि के अर्थ यजमान के घर आने-जाने वाले श्वेतरक्त आदि बहु प्रकार की ज्वालाओं से युक्त अग्नि ने सब ओर से आह्वनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि के स्थानों में अतिक्रमण किया। पूर्व दिशा में पृथ्वी को प्राप्त किया और सूर्य रूप होकर स्वर्ग में चलते अग्नि ने स्वर्ग लोक को प्राप्त किया।

*3. वेदों में सूर्य का घूमना :*

      सूर्य प्रकाशमान है और सारे प्राणियों को जानता है। सूर्य के घोड़े उसे सारे संसार में दर्शन के लिए ऊपर ले जाते हैं (ऋ-1.50.1)। दीप्तिमान और सर्वप्रकाशक सूर्य, हरित नाम के सात घोड़े रथ में तुम्हें ले जाते हैं    (ऋ-1/50/8)। 

      सूर्य ने रथवाहिका सात घोड़ियों को रथ में लगाया, उन घोड़ियों के द्वारा सूर्य गमन करता है (ऋ-1.50.9)। 

सूर्य के कल्याणकारी हरि नाम के विचित्र घोड़े इस पथ से जाते हैं। वे सब के स्तुतिभाजन हैं। हम उन को नमस्कार करते हैं। वे आकाश के पृष्ठ देश में उपस्थित हुए हैं। वे घोड़े तुरंत ही आकाश और पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण कर डालते हैं अर्थात् वे पृथ्वी के चारों ओर जल्दी ही चक्र लगा देते हैं (ऋ-1.115.3)।

       जिस समय सूर्य अपने रथ से हरित नामक घोड़े को खोलता है, उस समय सारे संसार में रात्रि अंधकार फैला देती है (ऋ-1.115.4)।

सात अश्वों का अधिपति सूर्य हम लोगों के सम्मुख उपस्थित हो, क्योंकि उसे एक कठिन रास्ते से बहुत दूर जाना होगा। वह श्येन (बाज) पक्षी की तरह शीघ्रगामी होकर हमारे द्वारा दी गई आहुति को लेने आता है (ऋ-5.45.9)।

     पानी बरसाने वाले, देवों को आनंद देने वाले, दीप्तिमान और द्रुतगामी सूर्य के रथ ने पूर्व दिशा में प्रवेश किया। तत्पश्चात स्वर्ग के मध्य में निहित विभिन्न वर्ण और सर्वव्यापी सूर्य अंतरिक्ष के दोनों भागों की ओर बढ़ गया और जगत की रक्षा की (ऋ-5.47.3)।

सूर्य देव, जिस समय तुम वेगशाली घोड़े को रथ में जोतकर आकाश मार्ग से जाते हो, तब कोई भी जीव तुम्हारे पास नहीं आने पाता तुम्हारी प्राचीन ज्योति दूसरी है जो तुम्हारे साथ रहती है जब तुम जाते तो, तब तुम्हारी ज्योति भिन्न होती है (ऋ-10.37.3)।

    उक्त वेद मंत्रों के अनुसार वे कभी सूर्य के घोड़ों की बात करते हैं, कभी रथ की कभी यह कहते हैं कि सूर्य के अस्त हो जाने पर सारे लोकों में (अर्थात् सारी दुनिया में) रात्रि हो जाती है और कभी यह कहते हैं कि सूर्य की पुरानी रोशनी भिन्न किस्म की है तथा जब वह शाम को अस्त होता है तब उसके पास और रोशनी होती है। कभी उसे सर्वव्यापी कहते हैं।

     उक्त सारी बचकानी बातें इस बात की सूचक है कि वेदों में सूर्य के विषय में जरा भी वैज्ञानिक ज्ञान नहीं है। उन्होंने केवल अनर्गल कल्पनाएं ही की हैं।

*सूर्य की आकर्षण शक्ति :*

     वेदों में विज्ञान सिद्ध करने के दीवाने वेदों के ऐसे मंत्र पेश करते हैं जिनमें उनके मुताबिक न केवल सूर्य विषयक उसकी आकर्षण शक्ति विषयक भी ज्ञान है जो अद्यतन ज्ञान से पूरी तरह मेल खाता है।

   इस उद्देश्य से यजुर्वेद का यह मंत्र दिया जाता है :

    आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।

हिरण्ययेन रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥.

   ~यजुर्वेद (33.43)

इस मंत्र का अर्थ वेदों में विज्ञान निकालने वाले स्वामी दयानंद ने निम्न प्रकार किया है :

    हे मनुष्यो, जो रमणीय स्वरूप से, आकर्षण से परस्पर संबद्ध लोकमात्र के साथ अपने भ्रमण की आवृत्ति करता हुआ सब लोकों को दिखाता हुआ प्रकाशमान सूर्यदेव जल व अविनाशी आकाशादि और मरणधर्मा प्राणी मात्र को अपने-अपने प्रदेश में स्थापित करता हुआ ‘उदयास्त समय में आता-जाता है’ सो ईश्वर का बनाया सूर्य लोक है।

     इस मंत्र का अर्थ करते हुए यद्यपि स्वामी दयानंद ने ‘आ कृष्णेन’ का अर्थ ‘आकर्षण’ किया है तथापि शेष मंत्र का अर्थ करते हुए उन्होंने सूर्य के आने-जाने का स्पष्ट उल्लेख किया है, जो उनके वेदों को वैज्ञानिक सिद्ध करने का उपहास है। दूसरे, इस अर्थ के विषय में एक और उल्लेखनीय बात यह है कि स्वामी दयानंद ने प्राय: सब जगह सविता का अर्थ परमात्मा किया है और वेदों में किसी भी देवता का अस्तित्व नहीं स्वीकारा है लेकिन यहां सूर्य की आकर्षण शक्ति का वेदों में वर्णन दिखाने के उद्देश्य से उन्होंने यहां सविता का अर्थ न केवल सूर्य किया है बल्कि सूर्यदेव लिख दिया।

ऐसे ही एक अन्य व्यक्ति ने इस मंत्र से आकर्षण शक्ति के साथ-साथ सूर्य का अपनी धुरी के गिर्द घूमना सिद्ध किया है, क्योंकि स्वामी दयानंद कृत अर्थ से सूर्य से आना-जाना सिद्ध होता था जो विज्ञान से एकदम विपरीत था।

   उन्होंने अर्थ किया है :

प्रकाश स्वरूप सूर्य आकर्षण के साथ लोक-लोकान्तरों को अपनी कक्षा में स्थिर करता हुआ और सब में किरण द्वारा प्रवेश करता हुआ, पृथ्व्यादि लोकों को प्रकाशित करता हुआ घूमता है लेकिन यहां अर्थ-परिवर्तन का प्रयास बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देता है। मूल में शब्द है—’याति’ इसका अर्थ होता है—जाता है।इसका अर्थ ‘धुरी पर घूमता है’ कदापि नहीं बन सकता। ‘कृष्ण’ का अर्थ होता है काला, अंधकार, रात्रि।

     इसका मतलब आकर्षण नहीं हो सकता है परन्तु सूर्य के आकर्षण को सिद्ध करने के लिए जबरदस्ती आकर्षण अर्थ किया गया है। उबट और महीधर ने इसका अर्थ किया है—

सविता देवता अर्थात् सूर्य स्वर्णमय रथ पर सवार होकर अंधकारपूर्ण अंतरिक्ष के मार्ग में विचरण करने वाले देवताओं और प्राणियों को अपने-अपने कर्म में लगाते हुए संपूर्ण लोकों को देखता हुआ आता है।

*चंद्रमा :*

  चंद्रमा के विषय में ऋग-1.105.1 में कहा गया है :

   चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि। अर्थात् चंद्रमा जलमय अंतरिक्ष में दौड़ता है।

वेदों से विज्ञान निकालने वाले निम्नलिखित मंत्र प्रस्तुत करते हैं :

    त्वं सोम पितृभि: संविदानोsनु द्यावापृथिवीsआ तंतथ।

तस्मै त इंदो हविषा विधेम वयं स्याम् पतयो रयीणाम्॥

    ~ऋग्वेद (8.48.13).

वे कहते हैं कि इस मंत्र में यह बात है कि चंद्रलोक पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। कभी-कभी वह सूर्य और पृथ्वी के बीच में भी आ जाता है।

       दरअसल, इस सूक्त के सारे मंत्र सोम नामक पौधे के गुणों का वर्णन करते हैं और इस मंत्र में भी सोम का जिक्र है :

    “हे सोम, तुम पितरों के साथ मिलकर द्यावा (पृथ्वी) को विस्तृत करते हो। सोम, हवि के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करेंगे। हम धनपति होंगे।”

     यदि सोम का अर्थ चंद्रमा भी करें तब भी इसमें इस बात का सूक्ष्म संकेत तक नहीं है कि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है व कभी-कभी सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है।

*ग्रहण :*

     वेदों में सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण का उल्लेख मिलता है। सूर्य ग्रहण के बारे में ऋग्वेद का कहना है कि सूर्य को स्वर्भानु नामक असुर आ दबोचता है और अत्रि व अत्रिपुत्र उसे उस असुर से मुक्त कराते हैं, तब ग्रहण समाप्त होता है (ऋग-5.40.5,5.40.9)। 

     इसी प्रकार चंद्रग्रहण करने वाला राहु असुर बताया गया है (अथर्ववेद-19..9.10)।

*वेदों की मूल प्रति विदेशियों द्वारा चुराना :*

      ऐसे लोग भी हमारे यहां हैं जो यह कहते नहीं थकते कि वेदों की मूल प्रतियां विदेशी ले गये। वहां उन लोगों ने इसे पढ़कर विज्ञान में इतनी प्रगति कर ली है। यह बात सही नहीं है। 

      उज्बेकिस्तान निवासी एक फारसी विद्वान लेखक, वैज्ञानिक, धर्मज्ञ तथा विचारक अल-बयरुनी ‘अलबरुनी’ (973-1048) अपनी मातृभाषा फारसी के अलावा तीन और भाषाओं—सीरियाई, संस्कृत, यूनानीका ज्ञाता था।

      वह भारत और श्रीलंका की यात्रा पर 1017-20 के मध्य आया था। वह भारत पर कई बार आक्रमण करने वाले गजनी के महमूद के कई अभियानों में सुल्तान के साथ था।

      अलबरुनी को भारतीय इतिहास का पहला जानकार कहा जाता था। वह एक मशहूर गणितज्ञ, भूगोलवेत्ता, कवि, रसायन वैज्ञानिक और दार्शनिक भी था। उसने ही धरती की त्रिज्या नापने का एक आसान फामूर्ला पेश किया था। बरुनी ने यह भी साबित किया कि प्रकाश की गति (वेग) ध्वनि की गति (वेग) से अधिक होती है।

      अल-बिरुनी ने अरबी में लिखे अस्सी अध्यायों में विभाजित अपने एक महत्वपूर्ण ग्रंथ—’किताब-उल-हिन्द’ में भारतीय धर्म, दर्शन, त्योहार, खगोल-विज्ञान, रीति-रिवाज, प्रथाओं, सामाजिक-जीवन, कानून आदि विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की है।  

इसका अर्थ है कि अलबरुनी के भारत आने (1017-20) से पहले हमारे शास्त्रों का ज्ञान पूर्णतया हम तक ही सीमित था और हम ही इन शास्त्रों के ज्ञाता, व्याख्यता व भाष्यकार थे। तब उक्त कालखड 1017-20 ई. से पहले भारतीयों ने वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रगति क्यों नहीं की?

     यदि मान लिया जाए कि विदेशियों ने हमारे शास्त्रों से विज्ञान ग्रहण किया तो इन शास्त्रों का अध्ययन तो हमसे ही किया होगा। हमसे अध्ययन करके उन्होंने दो सदियों में इतना विज्ञान खोज निकाला और हम हजारों वर्षों में कुछ क्यों नहीं निकाल पाए?

     जैसा कि डॉ. वी. राघवन ने भी अपनी पुस्तक—’इंडोलाजिकल स्टडीज इन इंडिया’ में लिखा है कि आधुनिक युग में विदेशियों द्वारा भारतीय साहित्य आदि के अध्ययन की शुरुआत विलियम जोन्स के द्वारा 1784 ई में की गई। तो उससे पहले यानी मुगलों के आने से भी पहले तक इतने विशाल भारत में वैदिक ज्ञान आधारित अनुसंधान कार्य उपेक्षित क्यों रहा? 

अपने यहां ऐसे-ऐसे लोग रहे हैं जिनको वेद कंठस्थ थे और वे लिखित प्रतियों में हुई अशुद्धियां तक निकाल देते थे। ऐसे में यह कहना कि वेदों की मूल प्रतियां विदेशों में है, एकदम गलत है।

    अतः यह कहा जा सकता है कि वेदों के जो अर्थ हजारों वर्षों से यहां के ऋषि, मुनि और विद्वान करते और लोगों को समझाते आए हैं, वही ठीक अर्थ है। आज उनमें विज्ञान का अस्तित्व जबरदस्ती ढूंढना और उनके अर्थ तोड़-मरोड़ कर पेश करना न केवल बौद्धिक बेईमानी है, बल्कि वेदों से ज्यादती करना भी है।

     आज वेदों से विज्ञान निकालने वालों की संख्या काफी है। सबकी बातों का विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है। फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वेदों में आधुनिक विज्ञान जैसी कोई बात नहीं है।

Ramswaroop Mantri

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