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*अब केवल आपातकाल की यात्राओं की कहानियां है शेष*

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 रामबाबू अग्रवाल

श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लगाया जाने को 48 साल पूरे हो चुके हैं। देश के लोकतांत्रिक इतिहास का वह काला अध्याय है । इस दौर में राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों आदि पर जो निरंकुश शासन प्रशासन ने जुल्म ढाए, वह एक किवदंती बन कर रह गए हैं।

 इंदिरा गांधी का इलाहाबाद हाईकोर्ट से अयोग्य घोषित होना, बिहार -गुजरात के प्रभावी छात्र आंदोलन, महंगाई- बेरोजगारी की बेलगाम वृद्धि कुछ ऐसे कारण थे जिन्होंने इंदिरा गांधी को नाकाम प्रधानमंत्री सिद्ध किया और परिणाम हुआ देशभर में आपातकाल।

 पूरे देश को 25 जून की रात से ही यातना ग्रह के रूप में बदल दिया गया। जहां दिल्ली में बड़े विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुई। वही पूरे देश भर के छोटे-छोटे शहरों में तमाम उन राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुई, जो कहीं ना कहीं कांग्रेस के विरोध में खड़े थे । इंदौर में भी छात्र नेताओं से लेकर सोशलिस्ट, जनसंघ और अन्य विरोधी दलों से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया गया। जेल जाने वाले नेता और उनके परिवारों को तब यह भी आभास नहीं होने दिया गया कि इनकी रिहाई कब होगी।

 इस तरह से पूरा देश कैद खाने में तब्दील हो गया ।लाखों कार्यकर्ता जेलों में थे, और दूसरी ओर आपातकाल से मिले अधिकारों के चलते पुलिस और प्रशासन के अधिकारी कर्मचारी पूरी तरह से निरंकुश होकर जनता पर जुल्म ढा रहे थे ।आपातकाल के जुल्म की जो कहानियां हैं उनकी आज केवल कल्पना ही की जा सकती है ।

राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा प्रशासन का डंडा उन अखबारों पर भी चला जो सरकार की खामियों और गलतियों को उजागर करने का काम करते थे । आपातकाल के तहत ही सेंसरशिप भी लागू कर दी गई। कुछ अखबारों ने इस सेंसरशिप का कड़ा विरोध किया, उनमें से नई दुनिया भी एक अखबार था, जिसने अपना संपादकीय कॉलम खाली छोड़ कर अपना विरोध प्रदर्शित किया ।

19 महीने लगातार देश को केद खाना बनाकर रखने के बाद जब इंदिरा गांधी को उनके सरकारी तंत्र ने रिपोर्ट दी कि अब देश में केवल उन्हे ही लोग पसंद करने वाले हैं । तब उन्होंने आपातकाल में कुछ ढील देकर चुनाव की घोषणा की । चुनाव की घोषणा होते ही आपातकाल से त्रस्त लोग सड़कों पर निकल आए और पहली बार देश में सरकार के खिलाफ जनता ने चुनाव लड़ा। तन मन धन से विपक्ष के उम्मीदवारों को मदद की और कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया । देश में केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी । आपातकाल की आज केवल यादें ही शेष बची है । लेकिन वह यादें इस बात का प्रमाण है की तानाशाही इस देश में कभी सफल नहीं हो सकती । हर शासन करने वाले को इस बात से आगाह रहना चाहिए कि लोगों की बोली की आजादी छीनने की जो भी कोशिश करेगा। उसे एक न एक दिन अपनी सत्ता गवाना पड़ेगी ।

 रामबाबू अग्रवाल

 वरिष्ठ समाजवादी नेता एवं मीसाबंदी

Ramswaroop Mantri

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