रंग बदल के कितने यहाँ सियार बैठें हैं
मुल्क़ लूटने को सभी बेकरार बैठें हैं
जो चलें नहीं साथ चार क़दम आज़ादी में
सियासत में बनकर देश की तक़दीर बैठें हैं
अब बो आओ खेतों में बंदूक और भालें
किसानों से मुँह मोड़कर जागीर बैठें हैं
सब सोते ही रह जाओगे अवाम हिन्द के
कोई जगाने वाले कहाँ तेरे नशीब बैठें हैं
तक़दीर अपने हाथ से माथें पर खींच लो
तक़दीर बनाने वाले कहाँ अब फ़क़ीर बैठें हैं।
बिमल तिवारी “आत्मबोध
कवि लेखक पत्रकार
देवरिया उत्तर प्रदेश
➖➖➖➖➖➖➖➖
किसान देश बचाने निकला है
रेलवे बिकी = रेलवे कर्मचारी चुप
एयर पोर्ट बिके = एयर पोर्ट कर्मचारी चुप
सी पोर्ट बिके = वो भी चुप
भेल बिकी = वो भी चुप
एल आई सी बिकी = वो भी चुप
सड़क बिकी = वो भी चुप
टोल बिके = वो भी चुप
रोडवेज़ बिकी = वो भी चुप
स्कूल बिकने वाले हैं = मास्टर चुप
सेल बिकी = वो भी चुप
बी एस एन एल बिकी = वो भी चुप
पुलिस में ठेका प्रथा = वो भी चुप
हास्पिटल मे ठेका प्रथा = वो भी चुप
और भी ना जाने क्या क्या बेच दिया सब चुप।
हर जगह ठेका प्रथा सब चुप।
महंगाई आसमान छू रही है = सब चुप।
ऐसे ही चुप रहे तो कल आपको भी बेच दिया जाएगा, और बेँचा ही जा रहा है।
सब देश हित में हो रहा है। हिंदू खतरे में है। सैनिक शहीद हो रहे हैं।
जैसे ही इनकी नजर खेत पर पड़ी तो जिंदा कौम को ये बरदाश्त नहीं हुवा। एक साल से विरोध कर रहे हैं। खेत नहीं बिकने देंगे।
लेकिन इन चुप को वो देशद्रोही, खालिस्तानी दिख रहे हैं। इनमें खुद तो बोलने की हिम्मत है नहीं अगर कोई बोले तो ये उसको भी चुप करना चाहते हैं।
पिछले 10 महिने से किसानों पर ना जाने क्या क्या जुल्म किए सरकार ने इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। अब तो सरकार ने सारी हदें पार कर दी किसानों को गाड़ी से कुचल कर लेकिन इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। अब भी ये सरकार को ही सही बता रहे हैं।
देश को बचाने की ये अंतिम लड़ाई है। अगर अब भी फेल हो गए तो देश को गुलाम होने से कोई नहीं रोक सकता।
एक बात समझ नहीं आती ये सब खाते तो अन्न ही है ना? या गोबर खाते हैं? बाकी गोबर भी किसान के पशु ही करते हैं।
किसान देश बचाने निकला है।
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से प्राप्त ज्ञान





