अरुण कुमार त्रिपाठी
अमेरिका और इजराइल ने रमजान के पवित्र महीने में ईरान पर हमला करके सुप्रीम नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, राष्ट्रपति मोहम्मद पेजस्कियां, ईरान इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांडर जनरल पकपोर, रक्षामंत्री अली शमखान को मार डाला है। इससे पहले लड़कियों के स्कूल पर हमला करके कम से कम 50 बच्चियों को भी मौत के घाट पर उतार दिया गया है। रमजान के पवित्र महीने में हुई 86 वर्षीय नेता खामेनेई की इस शहादत को लोग करबला के मैदान में हुई हुसैन की शहादत के बराबर मान रहे हैं।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में छिड़े इस युद्ध का संदर्भ और वजहें बेहद आधुनिक हो सकती हैं लेकिन इसके प्रतीक जिस तरह से प्राचीन हैं उससे लगता है कि इसे धर्म आधारित सभ्यतामूलक युद्ध का रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि हमला रमजान के पवित्र महीने के मध्य में किया गया है मामला यह भी है कि यह हमला पुरिम दिवस पर किया गया है।
पुरिम यहूदियों का एक प्रमुख और आनंद का त्योहार है। बाइबल की कथाओं के अनुसार इस दिन फारस यानी आज के ईरान में हामान नाम के दुष्ट अधिकारी के हाथों से यहूदियों के एक समूह को हत्या से बचाया गया था। पुरिम का हिब्रू में अर्थ होता है लाटरी।
हामान ने यहूदियों की हत्या के लिए यह दिवस लाटरी निकाल कर तय किया था। इस दिन एस्तेर ने रानी बनकर अपने चाचा मोर्दके के साथ मिलकर यहूदियों को नरसंहार से बचाया था। इस दिवस को यहूदी लोग एस्तेर का पाठ करते हैं, दान देते हैं, रंगीन वेशभूषा धारण करते हैं और हैमंस्टीन नाम की तिकोनी पेस्ट्री खाते हैं।
जाहिर सी बात है कि 21 वीं सदी के युद्ध भले ही आधुनिक हथियारों जैसे कि मिसाइलों और एआई से माध्यम से लड़े जा रहे हों लेकिन उनकी वजहें नस्ली हैं, धार्मिक हैं और पौराणिक हैं। भले ही बहाना एटमी हथियारों को नष्ट करने और अपने को सुरक्षित करने का दिया जा रहा हो लेकिन उनका लक्ष्य एक सभ्यतामूलक युद्ध को छेड़ना और भेदभाव के आधार पर एक विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है।
हम अब एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं जहां, नस्ल और धर्म आधारित घृणा, युद्ध और हिंसा नियम बनते जा रहे हैं और संवाद, वार्ताएं और राजनय अपवाद। विडंबना देखिए कि यह सब सुरक्षा के नाम पर हो रहा है लेकिन वास्तव में कोई सुरक्षित नहीं है। जो असुरक्षित हैं और मारे जा रहे हैं उनकी तो बात होनी ही चाहिए लेकिन जो हिंसा को अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हैं वे भी बेहद डरे हुए हैं। इजराइल ने भले ही पुरिम जैसे त्योहार के मौके पर युद्ध छेड़ा हो लेकिन उसके नागरिक इस दिन जश्न मनाने की स्थिति में नहीं थे। लोग जगह जगह भाग रहे थे और तेल अवीव हवाई अड्डे पर सन्नाटा पसरा हुआ था। उड़ानें रद्द हो गई थीं। तेल अवीव ही क्यों एक वैश्विक बाजार और पर्यटन स्थल समझे जाने वाले दुबई की स्थिति भी लगभग तेल अवीव जैसी ही हो रही थी।
अमेरिका दावा करता है कि वार्ताएं फेल हो रही हैं इसलिए उसे युद्ध में उतरना पड़ा है लेकिन वास्तविकता यह है कि वार्ताएं महज दिखावा हैं और युद्ध एक नियम बन गया है। बल्कि यह कहा जाए कि राजनय दिखावा हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अमेरिका दावा कर रहा था कि वह ईरान को परमाणु हथियारों को नष्ट करने के लिए बाध्य करना चाहता है इसलिए उससे वार्ता कर रहा है और दबाव बना रहा है। लेकिन वार्ता और संधि से अधिक जरूरी लक्ष्य है ईरान में सत्ता परिवर्तन का। इसी मकसद से जनवरी के महीने में वहां सत्ता विरोधी जबरदस्त आंदोलन भड़काया गया था या कहें कि उठ खड़ा हुआ था।
ईरान की सरकार ने उस आंदोलन को शांत करने के लिए जबरदस्त दमन किया। बताते हैं कि उसमें हजारों लोग मारे गए। तमाम पाबंदियों से घिरे ईरान में महंगाई बढ़ना लाजिमी है और लोग उसी के विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। लेकिन इस अभियान में इजराइली जासूसी एजंसी मोसाद और अमेरिकी जासूसी एजंसी सीआईए की भूमिका की खुलेआम चर्चा हुई थी।
ईरान यूरोपीय देशों की तरह एक लोकतांत्रिक देश नहीं है। लेकिन वहां सब कुछ तानाशाही से होता है ऐसा भी नहीं है। ईरान ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध इस्लामी कानून के दायरे में एक चुनाव प्रणाली और सत्ता हस्तांतरण की व्यवस्था विकसित की है। अगर बाहरी शक्तियां उसे निशाने पर न लें तो वह सऊदी अरब समेत, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे तमाम राजतंत्र पर आधारित देशों के मुकाबले अधिक संप्रभु और गरिमामय व्यवस्था है।
लेकिन इजराइल और अमेरिका वहां अपने पसंद की कठपुतली सरकार बनाना चाहते हैं जो कि 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले वहां पर थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या ईरान में तख्तापलट के लिए छेड़े गए युद्ध के उपरांत वहां अमेरिका समर्थक शासन प्रणाली कायम हो पाएगी। अगर कायम भी हुई तो क्या वह स्थायी हो पाएगी? क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ईरान में राष्ट्रीय स्वाभिमान खाड़ी के अन्य देशों के मुकाबले अधिक है। संभव है कि इस हमले के बाद मध्यपूर्व के दूसरे देशों में अमेरिका विरोध और राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना अधिक बलवती हो। यह नहीं कहा जा सकता कि वह भावना तमाम देशों के राजतंत्र को अपदस्थ कर देगी लेकिन उनके लिए असहज स्थिति तो पैदा कर ही सकती है।
ईरान विरोधी इस युद्ध में भारत का युद्धोन्मादी शक्तियों के पक्ष में खड़ा होना दुर्भाग्यपूर्ण है। पुरिमा के दिवस के ठीक एक दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री इजराइल में थे। भारत ने इस यात्रा का उद्देश्य तमाम प्रकार की प्रौद्योगिकी पाना और रक्षा सौदा करना बताया है लेकिन अघोषित उद्देश्य तो यही लग रहा है कि भारत इजराइल के माध्यम से अमेरिका को साधना चाहता है और प्रधानमंत्री के भाषण से यह बात भी प्रकट होती है कि भारत अपनी राजनीति और कूटनीति को इजराइल के मॉडल पर ढालना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी का भारत को मातृभूमि और इजराइल को पितृभूमि बताना महज संयोग नहीं है इसके पीछे भारत और इजराइल के राष्ट्रवाद को एक दूसरे की प्रतिकृति बताने और बनाने का प्रयास है।
इजराइल में फिलस्तीनियों के प्रति जितनी घृणा है उसी को आधार बनाकर भारतीय मुसलमानों के प्रति भी घृणा की बृहत्तर योजना को राष्ट्रीय रूप दिया जा रहा है। अगर नेतनयाहू का यहूदीवाद पूरे अरब जगत में फैले फिलस्तीनियों को अपने निशाने पर रखते हैं तो नए भारत का हिंदुत्व भी पूरे उपमहाद्वीप के मुसलमानों के साथ असहजता महसूस करता है। कहीं बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर अभियान चलता है तो कहीं कश्मीरियों के नाम पर। बाकी देश में बुलडोजर की तबाही और लव जेहाद व धर्मांतर के नाम पर कानूनी चाबुक तो चलते ही रहते हैं। लेकिन गौरतलब है कि यहूदीवाद महज फिलस्तीनियों को ही निशाना नहीं बनाता बल्कि उन मिजराही यहूदियों पर भी भरोसा नहीं करता जो मध्यपूर्व से संबंधित बताए जाते हैं। इजराइली सिद्धांतकार दावा करते हैं कि उन प्राच्य यहूदियों से हमारा कोई भी रीति रिवाज नहीं मिलता। वे चाहते हैं कि अशिक्षित यहूदियों के भीतर जो मध्यपूर्व की आध्यात्मिक परंपरा के अवशेष हैं उन्हें उनके भीतर से निकाला जाए। उनके स्कूलों में इस तरह से प्रयास चल भी रहे हैं। वे कहते भी हैं कि जो यहूदी अरब से आ रहे हैं उनके हाथों में अस्पताल से उठाए गए अरबों के हजारों बच्चे दे दिए गए।
ठीक यही स्थिति भारत के दलितों और पिछड़ों के साथ भी है। हिंदुत्व के पैरोकार चुनावी रणनीति के तहत भले दलितों पिछड़ों को राजनीति में स्थान दे दें लेकिन वैचारिक विमर्श और सनातन के आख्यान में उनके लिए कोई जगह नहीं है। यह दूरी यूजीसी नियमावली के लागू होती घृणा और टकराव के रूप में प्रकट होने लगी।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय के टकराव इसी कहानी को कहते हैं। आज भी यहां सीवर में काम करने वाले 77 प्रतिशत मजदूर उन्हीं दलित जातियों से आते हैं जिनके साथ सदियों से भेदभाव होता आया है। भारत और इजराइली राष्ट्रीयता में एक दूसरे से प्रेरणा लेने की यह होड़ न सिर्फ इन दोनों राष्ट्रों को संकीर्ण बना रही है बल्कि उनके सहयोग से दुनिया को युद्ध और घृणा केंद्रित कर रही है।
यहीं पर दो-राज्य समाधान के समर्थक और पीस नाउ मूवमेंट के संस्थापक व प्रसिद्ध इजराइली कवि व लेखक अमोस ओज का वह कथन याद आता है कि इस इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रवाद की बात करना हीथ्रो एअरपोर्ट पर लालटेन दिखाना है। वे कहते थे कि मैं इजराइल से प्यार करता हूं लेकिन इससे बहुत ज्यादा सहमत नहीं हूं। आज दुनिया जिस दिशा में बढ़ रही है उसमें राष्ट्रवादी संकीर्णता के साथ एक साम्राज्यवादी जज्बा भी है। यह साम्राज्यवाद पहले के साम्राज्यवाद से अधिक विनाशकारी है। समय शांति और प्रेम के योद्धाओं के फिर से जागने और आगे बढ़ने का है और दुनिया को नए तरीके से विन्यसित करने का है। यहीं पर अमोस ओज की वह टिप्पणी याद आती है कि आग बहुत बड़ी है और मैं एक चम्मच लेकर खड़ा हूं लेकिन हममें से लाखों लोग हैं और प्रत्येक के हाथ में एक चम्मच है।






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