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सामयिक…अब !अशोक गहलोत की असलियत हुई उजागर

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सुसंस्कृति परिहार

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने अंदर और बाहर जिन परिस्थितियों से जूझ रही है उसके बावजूद राहुल गांधी पर देश की जनता का अटूट प्यार इस बात को इंगित करता है कि कांग्रेस आ रही है और सोनिया गांधी को बार बार अध्यक्ष बनाने का राज क्या था व राहुल की घरघोर उपेक्षा क्यों हो रही थी। सीधे शब्दों में कहें तो जी23 और उससे दूर रहें अधिकांश बुजुर्ग कांग्रेसी सोनिया को मनमाने तरीके से इस्तेमाल करते रहे। राहुल की बातों पर गौर किए बिना सोनिया उन्हें महत्त्व देती रहीं क्योंकि वे बुजुर्गियत का सम्मान करती थीं। राहुल और सोनिया गांधी में गुजरात के पुराने कांग्रेसी नेताओं को लेकर कई बार गंभीर बात चीत भी हुई। गुजरात में कांग्रेस को बुरी हालत में पहुंचाने वालों में गांधी परिवार से जुड़े अहमद पटेल की भूमिका जाहिर भी हुई। राहुल हालात समझ रहे थे किन्तु उन्हें ये लोग पप्पू ही बनाने पर तुले रहे।

अब अशोक गहलोत पर सोनिया जी के अतिरिक्त विश्वास की पोल पट्टी भी खुल गई।अच्छा हुआ ये सब उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले हो गया । सोनिया जी ने इसे देर से समझा लेकिन यह कांग्रेस की आंख खोलने वाला साबित होगा।  पहले से अशोक गहलोत राहुल गांधी का नाम ले रहे थे ।वे चाहते भी रहे कि उन्हें अध्यक्ष ना बनना पड़े क्योंकि वे सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहते थे।गहलोत के वफादार माने जाने वाले कुछ विधायकों ने परोक्ष रूप से पायलट का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का उत्तराधिकारी कोई ऐसा होना चाहिए, जिन्होंने 2020 में राजनीतिक संकट के दौरान सरकार को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, न कि कोई ऐसा जो इसे गिराने के प्रयास में शामिल था। सोनिया ने जब जोर डाला तो राजी हुए पर बात अपने मुख्यमंत्री बनाने की ज़िद बनी ही रही।ऊपर कुछ और अंदर कुुछ और ही चल था रहा । गहलोत   सचिन को मुख्यमंत्री नहीं बनने देना चाहते इसके पीछे उनका भाजपा के साथ पांच पांच साल राज का वादा है इसलिए वे बराबर कहते रहते हैं कि राजस्थान में पांच साल बाद बदलााव होता ही है।इसके गूढ़ार्थ समझने होंगे।यह कैसी डील और गठजोड़ है इसकी तहकीकात होनी चाहिए।  

 कहा जा रहा है कि गहलोत का नाम अध्यक्ष की सूची से हटा दिया गया है और अब दूसरे नाम जो सुर्खियों में हैं उनमें दिग्विजयसिंह और के सी वेणुगोपाल का नाम भी शामिल है। मल्लिकार्जुन खड़गे, मुकुल वासनिक तथा कमलनाथ का नाम भी है। कमलनाथ ने साफ तौर पर मना कर दिया उनका मोह भी गहलोत की तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है।देखना यह है कि पार्टी क्या निर्णय लेती है। कांग्रेस महासचिव के सी वेणुगोपाल राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं और दिग्विजयसिंह भारत जोड़ो के सूत्रधार हैं जो मुर्दा हो रही कांग्रेस में नई जान फूंक रहे है। राहुल गांधी एक बड़े मिशन में लगे हैं उनका कोई इरादा अध्यक्ष बनने का नहीं हैं।

अशोक गहलोत ने इस कठिन दौर में जो कुछ किया है  उससे वह कांग्रेस सदस्यों के निशाने पर आ गए हैं सीडब्ल्यूसी  अब उन्हें मुख्यमंत्री पद पर भी देखना नहीं चाहती।उनके पक्षधर कथित 82 विधायकों की भूमिका उनके मुख्यमंत्री पद भी जाने पर क्या होगी इसका संकेत गंगा बाई ने दे दिया है उन्होंने यू टर्न लेते हुए कहा है कि उन्हें सीडब्ल्यूसी का फैसला मंजूर होगा।कहते हैं कि दूसरे के लिए गड्ढा खोदने वाले खुद उसमें गिर जाते हैं ऐसा ही कुछ राजस्थान में नज़र आ रहा है।अगर गहलोत भाजपाई खेमे में जाने की सोच रहे हैं तो वहां उन्हें आगे नाउम्मीदी ही मिलेगी।भले शेष डेढ़ बरस उन्हें मिल जाएं। कुछ लोग तो यह कह रहे हैं कि  मुख्यमंत्री के साथ सिर्फ 82 विधायक हैं उनका बहुमत नहीं है उनसे इस्तीफा लिया जाना चाहिए।

बहरहाल,ये तमाम घटनाचक्र कांग्रेस को स्वस्थ बनाने वाला है इसे कांग्रेस की कमज़ोरी ना माना जाए इतनी पुरानी पार्टी में गहरे तक जमे कीचड़ का साफ होना ज़रुरी है क्योंकि यही कीचड़ है जिसने कमल को पनपने का अवसर दिया है।दृढ़निश्चयी राहुल के संकल्प और उनकी देश को जोड़ने वाली यात्रा तथा उनकी युवा टीम से उम्मीद बंधती है कांग्रेस इन समस्त झंझावातों से जूझकर देशवासियों को वह प्यारा वतन लौटाएगी जिसके तलबगार गांधी, नेहरू और अम्बेडकर थे।

Ramswaroop Mantri

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