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*आरबी आई से एकबार फिर सरकार ने वसूला 2.69 लाख करोड़ डिवीडेंड*

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सनत जैन

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केंद्र सरकार ने एक बार फिर भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) से 2.69 लाख करोड़ रुपये का ऐतिहासिक डिविडेंड वसूल किया है। यह अब तक की सबसे बडी डिविडेंड की राशि है जिसका ट्रांसफर रिजर्व बैंक सरकार को कर रहा है। रिजर्व बैंक में जमा सोने का भंडार और विदेशी मुद्रा की कीमत बढ़ जाने से सरकार ने इसे रिजर्व बैंक का मुनाफा मान लिया है।

सवाल यह है, यह डिविडेंड रिजर्व बैंक का असल लाभ का नतीजा है,या बाजार में कीमत बढ़ने से सोने एवं विदेशी मुद्रा भंडार का जो मूल्यांकन बढा है। बाजार में सोने और डॉलर की कीमत चढ़ती और उतरती रहती है। आज जो मुनाफा दिख रहा है। कल वह घाटे में भी बदल सकता है। सरकार ने मूल्य वृद्धि को मुनाफा मानकर अपना डिवीडेंड रिजर्व बैंक से ले लिया। भविष्य में यदि घाटा होगा, तो नुकसान रिजर्व बैंक का होगा।

रिजर्व बैंक कोई कंपनी नहीं है। रिजर्व बैंक कोई व्यापार भी नहीं करता है। एक नियामक संस्था है, उसके पास जो संपत्तियाँ हैं। जैसे विदेशी मुद्रा भंडार, सोने का भंडार वह किसी व्यापार या विक्रय की कमाई से नहीं आया है। बाजार में मूल्य परिवर्तन से उसका मूल्यांकन साख के रूप में होता है। रिजर्व बैंक में जमा सोना और विदेशी मुद्रा भंडार से अंतरराष्ट्रीय साख बनती है। उसी साख के आधार पर वैश्विक संस्थाओं द्वारा रिजर्व बैंक की आर्थिक स्थिति का मूल्याकन किया जाता है। रिजर्व बैंक में जमा गोल्ड रिज़र्व की वैल्यू पिछले साल $80 बिलियन थी। जो इस साल बढ़कर $100 बिलियन हो गई।

सोने की सिर्फ कागज़ पर कीमत बढ़ी है। सोने की बिक्री नहीं हुई है। रिजर्व बैंक में जमा डॉलर की वैल्यू बढ़ी है। रुपये के मुकाबले 78-79 से बढ़कर 85-86 रुपया डॉलर का मूल्य हो गया है। जिससे विदेशी मुद्रा भंडार की वैल्यू कागज़ पर बढ़ी है। इस बढ़े हुए मूल्य को केंद्र सरकार ने मुनाफा मानकर रिजर्व बैंक से डिविडेंड मांग लिया। वास्तव में रिज़र्व बैंक की बैलेंस शीट का वर्तमान प्रचलित मूल्य पर यह री-वैल्यूएशन है।

जिसे सरकार मुनाफा मान रही है। रिजर्व बैंक का जमा यह फंड भविष्य के संकटों, मुद्रा स्थिरता और बैंकिंग प्रणाली की सुरक्षा के लिए रिजर्व बैंक के पास अभी तक सुरक्षित रहता आया है। केंद्र सरकार की यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। केंद्र सरकार द्वारा रिजर्व बैंक से डिविडेंड लेने के नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। केंद्र सरकार के इस नियम के कारण रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता और दीर्घकालिक आर्थिक स्थितियों के संतुलन की स्थिरता पर असर पड़ना तय है। सोचने की बात यह है, जब सरकार रिजर्व बैंक से इतना बड़ा डिविडेंड ले रही है। ऐसी स्थिति में पेट्रोल-डीज़ल पर करों के ज़रिए जनता से 4 लाख करोड़ रुपये की वसूली क्यों की जा रही है। कागज़ी लाभ को मुनाफा कब से माना जाने लगा। आम आदमियों के ऊपर भी क्या इसी तरीके से लाभ मानकर टैक्स लगाया जा सकता है।

पिछले एक दशक से केंद्र सरकार टेक्स के रूप में भारी राजस्व एकत्रित कर रही है ऐसी स्थिति में क्या आम नागरिक को टैक्स से राहत नहीं मिलनी चाहिए। सरकार को, रिजर्व बैंक की जो आय दिख रही है। वह काल्पनिक मुनाफा है। मूल्य गिरने पर इसके पीछे का घाटा रिजर्व बैंक का जोखिम है। वित्तीय स्वायत्तता, मौद्रिक नीति की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कैसे रिजर्व बैंक पर बना रहेगा। केंद्र सरकार द्वारा रिजर्व बैंक के खजाने की यह एक ऐसी लूट है। जो दिखती नहीं है, लेकिन देश की आर्थिक रीढ़ को लगातार कमजोर कर रही है। रिजर्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा संवैधानिक निकाय है। रिजर्व बैंक को सारी दुनिया में मान्यता मिलती है। भारत की बैंकिंग प्रणाली और सरकार की आर्थिक हालात का प्रतिबिंब रिजर्व बैंक है। कारोबार के जरिए तथा विदेशी मुद्रा के नियंत्रण को लेकर जो मुद्रा रिजर्व बैंक पास जमा रहती है।

उसी से देश की अर्थव्यवस्था का संचालन भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है। जिस तरह से केंद्र सरकार रिजर्व बैंक से डिविडेंड वसूल कर रही है। आगे चलकर आम नागरिकों और कंपनियों से भी सालाना मूल्यांकन करके सरकार इसी तरह का टैक्स वसूल करने की तैयारी तो नहीं कर रही है। अभी तक औद्योगिक संस्थान बैंक से लोन लेने के लिए अपनी संपत्तियों का मूल्यांकन कराकर वित्तीय संस्थानों से लोन लेने के लिए पुर्न मूल्यांकन का उपयोग करते थे। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा जिस तरह से रिजर्व बैंक से डिविडेंड वसूल करने के लिए तरह-तरह के उपाय किए जा रहे हैं। अर्थशास्त्रियों के लिए यह चिंता का विषय बन रहा है।

एक चिंता यह भी बन रही है, यदि मार्केट में आर्थिक मंदी या और अन्य किसी कारण से बैंकिंग प्रणाली में कोई जोखिम उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में नियामक संस्था के रूप में रिजर्व बैंक कैसे स्थिति से निपटेगा? रिजर्व बैंक में जिस तरह से केंद्र सरकार नियुक्तियां कर रही हैं। अर्थशास्त्रियों का स्थान धीरे-धीरे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को दिया जा रहा है। उसके बाद यही सब होना था जो हो रहा है, आगे भगवान ही मालिक है।

Ramswaroop Mantri

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