डॉ. विकास मानव
तीनों लोकों में मोक्ष पाने के तीन ही रास्ते हैं : योग, तंत्र और सम्भोग. चौथा कोई रास्ता नहीं है.
योग-तंत्र साधना के दो चरण हैं या कहना चाहिए कि दो स्तर हैं : बहिरंग साधना और अंतरंग साधना।
बहिरंग साधना नंगी तलवार की धार पर चलने के समान है या तलवार की धार पर रखी शहद की बून्द चाटने के समान है। थोड़ी-सी चूक हुई कि जीभ कट गई। इसमें मांस, मदिरा, मैथुन, मीन और मुद्रा- इन पञ्च मकार के अतिरिक्त श्मशान, चिता, शव, नरमुंड, स्त्री आदि की आवश्यकता पड़ती है किन्तु उनके प्रयोग में जो भाव होता है, जो भावना होती है, वह आध्यात्मिक होती है।
आज के स्वयंभू तांत्रिकों में न वैसा भाव होता है और न होती है वैसी भावना ही। न वे तंत्र को जानते हैं और न तो जानते हैं किसी भी प्रकार की तांत्रिक साधना विधि ही।
यदि कुछ जानते भी हैं तो आडम्बर करना जानते हैं, पाखंड करना जानते हैं और जानते हैं तंत्र-मन्त्र के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाना।
तो फिर योग-तंत्र साधना है क्या?
यह प्रश्न इतनी गंभीर है कि इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। लेकिन तंत्र के प्रति जो जनमानस में भ्रामक धारणाएं हैं, उनके निराकरण के लिए यह बताना ज़रूरी है कि भारत का संस्कृति ‘सनातन संस्कृति’ है जो आदि-अंत रहित है।
दो आधार-स्तम्भ हैं :
वेद और तंत्र।
इन्हीं को ‘निगम’ और ‘आगम’ कहा जाता है। वेद परम ज्ञान है और तंत्र है गुह्य ज्ञान। परम ज्ञान प्राप्ति का मार्ग सबके लिए खुला है जो मनसा-वाचा-कर्मणा आध्यात्मिक है और है शुभ संस्कार संपन्न।
वेद कर्म ‘प्रधान’ है और तंत्र है–‘भाव प्रधान’। तंत्र की साधना शक्ति के विभिन्न रूपों की साधना है। शक्ति से सम्बंधित रहस्यमय गुह्य और गोपनीय ज्ञान को क्रियारूप में परिवर्तित करने का जो उपाय है, वही तंत्र साधना है।
तांत्रिक साधना का पहला उद्देश्य है भोग से मोक्ष की ओर जाना और दूसरा उद्देश्य है निरपेक्ष भाव से योग्य पात्र का कल्याण करना। इसी कल्याण की भावना से शक्ति मानव रूप में संसार में अवतरित होती है।
शक्ति के तीन रूप हैं :
अपरा, परा और परमा।
इन तीनों शक्तियों की अभिव्यक्ति शरीर में प्राण, मन और आत्मा के रूप में होती है। ये तीनों शक्तियां मानव शरीर में क्रियाशील हैं। इन्हीं की संयुक्त सत्ता को ‘चेतना’ कहते हैं जो तंत्र साधना का एकमात्र आधार है।
सच्चे अर्थों में जो तंत्र साधक या साधिका हैं, वे सदैव अपने को गुप्त रखते हैं समाज में। पारिवारिक , सामाजिक और सांसारिक जीवन व्यतीत करते हुए भी वे अपने स्वरुप को, अपनी साधना को कभी प्रकट नहीं करते। तंत्र की ऐसी कोई साधना नहीं, जिसकी सिद्धि मेरे पास नहीं हो. जो लोग मेरे रिसर्च आर्टिकल पढ़े हैं या मेरा सानिध्य लिए हैं वे जानते हैं. लेकिन मैं इस व्यक्तित्व का प्रदर्शन नहीं करता. मेरी पहचान ध्यानिष्ठ के रूप में ही है. जो वास्तविक सिद्ध हैं उनकी वेशभूषा, उनका रहन-सहन, व्यवहार ऐसा होता है कि कोई विरला ही जान-समझ पाता है।
योगियों के सम्बन्ध में भी यही बात समझनी चाहिए। योग और तंत्र एक दूसरे के पूरक हैं। जो योगी होगा ,वह तांत्रिक भी होगा। इसी प्रकार जो तंत्र साधक होगा, वह योगी भी होगा। लेकिन दोनों रहते हैं प्रच्छन्न भाव से। ज्ञानवान व्यक्ति ही उन्हें जान-समझ सकता है और लाभान्वित भी हो सकता है।
रही संभोग की बात तो, इससे बेहतर और कारगर कोई मार्ग नहीं है. स्त्रियों का उद्धार तो इसके बिना हो ही नहीं सकता. योग, ध्यान, तंत्र से सबकुछ हासिल कर लेने वाले ऋषि- महर्षि- ब्रह्मर्षि यहाँ तक की स्वयं भगवान कहे गए लोग भी अगर सम्भोग में उतरे तो सिर्फ़ स्त्री उद्धार के लिए.
यह मार्ग सबसे बेहतर मार्ग है लेकिन आज के दौर में असंभव जितना मुश्किल है. इसलिए कि पुरुष में इतना पौरुष नहीं रहा जो स्त्री को संतुष्ट ही कर सके. बेसुध करके मोक्ष अवस्था तक ले जाना तो बहुत ज्यादा दूर की बात है.
यह क्षमता भी मैं विकसित करता हूँ, लेकिन खुद को मर्द समझने वाले तिस्मारखां कहाँ समर्पण करने वाले. उनकी पत्नी मेरे पास उन्हें लाना भी चाहे तो उसे थप्पड़ पड़ता है, उसको हवसी, सेक्स एडिक्ट बताकर. यही कारण है कि फीमेल्स सीधे मेरी सेवा लेती हैं. ऐसों के लिए मेरा पैटर्न स्प्रिचुअल ही है, दुराचारपूर्ण नहीं है. निःशुल्क भी है. होम सर्विस तक सुलभ है.





