सुहेल हामिद
कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को लेकर सियासी पार्टियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। आंदोलन को अराजनीतिक रखने की कोशिश के बावजूद राजनीतिक पार्टियां किसानों के प्रति एकजुटता दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हैं। क्योंकि, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले किसानों ने विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का मौका दे दिया है। वहीं, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में भी इसका असर होगा।
संसद का बजट सत्र चल रहा है। इसलिए विपक्षी दल सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। किसानों के छह फरवरी को कुछ घंटों के लिए चक्का जाम करने के ऐलान के बीच गुरुवार को दस राजनीतिक दलों के सांसद गाजीपुर बॉडर पहुंचे, पर पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इन नेताओं में शिरोमणि अकाली दल, एनसीपी, डीएमके, टीएमसी, आईयूएमएल और आरएसपी सहित दूसरी पार्टियों के सांसद शामिल थे।
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सरकार के खिलाफ विपक्ष को मिला है बड़ा मुद्दा? जानें किसान आंदोलन का चुनावी राज्यों में कैसा होगा असर
सुहेल हामिद,नई दिल्ली | Published By: Shankar Pandit
- Last updated: Fri, 05 Feb 2021 06:23 AM

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कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को लेकर सियासी पार्टियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। आंदोलन को अराजनीतिक रखने की कोशिश के बावजूद राजनीतिक पार्टियां किसानों के प्रति एकजुटता दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हैं। क्योंकि, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले किसानों ने विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का मौका दे दिया है। वहीं, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में भी इसका असर होगा।
संसद का बजट सत्र चल रहा है। इसलिए विपक्षी दल सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। किसानों के छह फरवरी को कुछ घंटों के लिए चक्का जाम करने के ऐलान के बीच गुरुवार को दस राजनीतिक दलों के सांसद गाजीपुर बॉडर पहुंचे, पर पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इन नेताओं में शिरोमणि अकाली दल, एनसीपी, डीएमके, टीएमसी, आईयूएमएल और आरएसपी सहित दूसरी पार्टियों के सांसद शामिल थे।https://cdn.jwplayer.com/players/JUhE77zz-SBGWwnIq.html
पंजाब में निगम चुनाव लिटमस टेस्ट माना जा रहा :
कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत पंजाब से हुई। इसलिए आंदोलन का राजनीतिक असर पड़ना तय था। शिरोमणि अकाली दल किसानों का समर्थन करते हुए सरकार से अलग हो गई। पर शिअद की चुनौती यही खत्म नहीं हुई। पंजाब में करीब दस दिन बाद आठ नगर निगम, सौ से ज्यादा नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों के चुनाव है। किसान आंदोलन के बीच हो रहे चुनाव को लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। पंजाब में विधानसभा चुनाव भी बहुत दूर नहीं है। वर्ष 2022 से पहले होने वाली स्थानीय निकाय के चुनावों को लोगों के मूड के तौर पर देखा जाएगा। पिछले निकाय चुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत दर्ज की थी। ऐसे में पार्टी को उम्मीद है कि वह अपने प्रदर्शन दोहराने में सफल रहेगी। वहीं, शिअद के लिए भी यह चुनाव काफी अहम हैं। वहीं, आम आदमी पार्टी भी स्थानीय निकायों के चुनाव में पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है।
महाराष्ट्र में एनसीपी अपनी खोई पकड़ वापस पाने की जुगत में :
किसानों से मुलाकात करने के लिए गए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल में एनसीपी की सांसद सुप्रिया सूले भी मौजूद थीं। महाराष्ट्र में एनसीपी की पकड़ ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर हुई है। पार्टी की कोशिश है कि किसान आंदोलन के जरिए वह एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में जनाधार हासिल कर सकती है। एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार भी कुछ दिन पहले मुंबई के आजाद मैदान में हुई किसानों की रैली में शामिल हुए थे। उनके साथ शिवसेना के आदित्य ठाकरे भी थे। शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी गाजीपुर बॉडर जाकर किसानों से मुलाकात की थी। शिवसेना भी किसान आंदोलन के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचना चाहती है। क्योकि, अभी तक शिवसेना की छवि शहरी पार्टी की है। इसलिए वह गांव-देहात में अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है।
तमिलनाडु में होने हैं विधानसभा चुनाव :
तमिलनाडु में भी विधानसभा चुनाव हैं। यह चुनाव मुख्य तौर पर सत्तारुढ एआईडीएमके और डीमके के बीच हैं। एआईडीएमके का भाजपा से गठबंधन हैं। तमिलनाडु में भी किसानों का एक बड़ा वर्ग आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। इसलिए, यह चुनावी मुद्दा बनेगा।
पश्चिम बंगाल में ममता किसानों के साथ:
पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हैं। चुनाव को लेकर भाजपा काफी अक्रामक है। इसलिए तृणमूल कांग्रेस किसान आंदोलन को लेकर सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। बंगाल मे कई संगठन किसानों के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। दूसरी तरफ वामदल भी किसानों के आंदोलन के साथ हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी किसानों के साथ एकजुटता दिखाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहती। केरल में भी विधानसभा चुनाव हैं। इसलिए एआईयूएमएल भी किसानों के प्रति एकजुटता दिखा रही है।





