पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की विशेष बेंच ने चुनाव आयोग के आधार पर संदिग्ध माना गया है।
ग्राम पंचायतों और वार्डों में चस्पा होगी लिस्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह सूची ग्राम पंचायतों, ब्लॉक कार्यालयों और वार्ड ऑफिसों में अनिवार्य रूप से लगाई जाए। कोर्ट ने इस प्रक्रिया के लिए यह दिशा-निर्देश दिए-
- 10 दिन का समय: लिस्ट जारी होने के बाद लोगों को अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 10 दिनों का पर्याप्त समय मिलेगा।
- सुनवाई का अधिकार: यदि किसी के दस्तावेज अधूरे हैं, तो उन्हें नए प्रूफ पेश करने का मौका दिया जाएगा। अधिकारियों को डॉक्यूमेंट जमा करने पर रसीद देना अनिवार्य होगा।
- कारण बताना जरूरी: यदि किसी वोटर का नाम सूची से काटा जाता है, तो चुनाव आयोग को अंतिम फैसले में उसका ठोस कारण बताना होगा।
‘व्हाट्सएप से नहीं चलती सरकार’ – कोर्ट
सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि चुनाव आयोग आधिकारिक सर्कुलर के बजाय व्हाट्सएप (WhatsApp) के जरिए निर्देश भेज रहा है, तो CJI सूर्यकांत नाराज हो गए। उन्होंने दो टूक कहा, “सब कुछ व्हाट्सएप के जरिए चलाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसके लिए प्रॉपर आधिकारिक सर्कुलर जारी होना चाहिए।”
बाल विवाह और तकनीकी खामियों पर बहस
अदालत में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ की परिभाषा पर भी तीखी बहस हुई…
- उम्र का अंतर: जब आयोग ने माँ और बेटे की उम्र में 15 साल का अंतर होने को गलती बताया, तो जस्टिस बागची ने कहा कि भारत में बाल विवाह एक हकीकत है, इसे सीधे तौर पर गड़बड़ी नहीं माना जा सकता।
- नाम की स्पेलिंग: कपिल सिब्बल ने दलील दी कि बंगाल में ‘गांगुली’ या ‘चटर्जी’ जैसे सरनेम की स्पेलिंग अलग-अलग हो सकती है, इसे आधार बनाकर नाम हटाना गलत है।
- अमर्त्य सेन को नोटिस: कोर्ट को सूचित किया गया कि आयोग के एल्गोरिदम की गड़बड़ी के कारण नोबेल विजेता अमर्त्य सेन तक को नोटिस भेज दिया गया है।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह सुनवाई केंद्रों पर सुरक्षा और पर्याप्त स्टाफ सुनिश्चित करे ताकि 1 करोड़ से अधिक लोगों के तनाव को कम किया जा सके।





