गणतंत्र दिवस-2026 की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने पद्म पुरस्कार 2026 की सूची घोषित की है, जिसमें 45 नामों का चयन ‘गुमनाम हीरोज’ के रूप में किया गया है। इस वर्ष मध्य प्रदेश की तीन प्रतिष्ठित विभूतियों मोहन नागर, भगवानदास रैकवार और कैलाश चंद्र पंत को पद्मश्री से सम्मानित किया जा रहा है। ये पर्यावरण, कला और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए चुने गए हैं।
बैतूल के नागर पर्यावरण आंदोलन की सशक्त आवाज
प्रदेश के सक्रिय और जमीनी स्तर पर कार्यरत पर्यावरण कार्यकर्ता मोहन नागर को वर्ष 2026 के पद्मश्री सम्मान से नवाज़े जाने की घोषणा ने प्रदेश को गौरवान्वित किया है। जल संरक्षण, भू-जल संवर्धन और समग्र पर्यावरण जागरूकता के क्षेत्र में उनके दशकों लंबे योगदान ने न केवल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को मजबूती दी है, बल्कि समाज को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने में भी अहम भूमिका निभाई है। 23 फरवरी 1968 को जन्मे मोहन नागर, स्व. भवरलाल नागर और स्व. गुलाबदेवी नागर के सुपुत्र हैं। उन्होंने विक्रम यूनिवर्सिटी, उज्जैन से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। वर्तमान में वे बैतूल स्थित भारत भारती आवासीय विद्यालय परिसर में निवासरत हैं।
सोना घाटी में वर्षा जल संचयन किया
मोहन नागर ने विशेष रूप से बैतूल जिले की सोना घाटी में वर्षाजल संचयन और जल संरचनाओं के निर्माण के माध्यम से प्राकृतिक जल चक्र को पुनर्जीवित करने का कार्य किया। सूखते जल स्रोतों, गिरते भू-जल स्तर और जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों में उनके प्रयासों ने जल उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ खेती और आजीविका को भी संबल दिया है। उनके कार्यों का प्रभाव यह रहा कि स्थानीय स्तर पर लोग स्वयं जल संरक्षण की पहल से जुड़ने लगे। नागर द्वारा प्रारंभ किया गया ‘गंगा अवतरण अभियान’ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक जनआंदोलन के रूप में उभरा है। इस अभियान के माध्यम से उन्होंने स्थानीय समुदायों को जोड़ते हुए वैज्ञानिक और पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों को साझा किया। जल संरचनाओं का निर्माण, तालाबों और नालों का पुनर्जीवन, वर्षाजल संग्रहण और जनजागरूकता इस अभियान के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। जल संरक्षण के साथ-साथ मोहन नागर ने जैविक कृषि, गो-संरक्षण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति तक सीमित नहीं, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन संरक्षण और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। इसी सोच के तहत उन्होंने किसानों, युवाओं और स्वयंसेवी संगठनों को पर्यावरणीय गतिविधियों से जोड़ा।
कई बार सम्मानित किया गया
नागर के कार्यों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2019 में राष्ट्रीय ‘जल प्रहरी’ सम्मान, 2020 में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा ‘वाटर हीरो’ सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का ‘गोपाल पुरस्कार’, भाऊराव देवरस राष्ट्रीय पुरस्कार तथा उनकी काव्य कृति ‘चातुर्मास’ के लिए दुष्यंत कुमार साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें मिल चुका है। यह उनकी बहुआयामी सोच और समाज के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
जनअभियान परिषद के उपाध्यक्ष हैं नागर
प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर भी मोहन नागर की सक्रिय भूमिका रही है। वर्तमान में वे मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष हैं तथा नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय, जबलपुर के प्रबंधन मंडल और मध्यप्रदेश शासन वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य भी हैं। इन दायित्वों के माध्यम से वे नीति निर्माण और जनभागीदारी के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं।
हिंदी का मान बढ़ाने वाले कैलाश चंद्र पंत को राष्ट्रीय सम्मान
हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और शिक्षा के क्षेत्र में दशकों तक निरंतर योगदान देने वाले वरिष्ठ लेखक, पत्रकार और समाजसेवी 90 वर्षीय कैलाश चंद्र (कैलाश चंद्र पंत) को पद्मश्री सम्मान 2026 से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। यह सम्मान उन्हें साहित्यिक साधना, भाषा सेवा और सामाजिक-शैक्षणिक चेतना को सशक्त करने के लिए प्रदान किया जाएगा। उनके चयन को मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि समूचे हिंदी साहित्य जगत के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। पद्मश्री के लिए चयन पर कैलाश चंद्र पंत ने कहा कि यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि इतने प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चयन किया गया है। यह सरस्वती की कृपा है।

1936 में महू, इंदौर में हुआ जन्म
पंत का जन्म महू, जिला इंदौर 26 अप्रैल 1936 को हुआ था। उन्होंने एमए साहित्याचार्य, साहित्य रत्न की शिक्षा प्राप्त की है। वह वर्तमान में भोपाल में रह रहे हैं। पंत ने अपने लेखन और संपादन कार्य के माध्यम से हिंदी साहित्य को केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज, संस्कृति और जनचेतना से जोड़ा। वे बीते दो दशकों से चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ‘जनधर्म’ का सफल प्रकाशन कर रहे हैं, जिसने वैचारिक पत्रकारिता को नई पहचान दी। इसके साथ ही वे ‘अक्षरा’ मैगज़ीन के संपादक के रूप में भी साहित्यिक विमर्श को दिशा दे चुके हैं।
पत्रकारिता, शिक्षा व संस्कृति के क्षेत्र में भी पंत का योगदान
पत्रकारिता के साथ-साथ कैलाश चंद्र पंत ने शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में संस्थागत विकास में भी अहम भूमिका निभाई है। भोपाल स्थित हिंदी भवन न्यास और कृषि भवन जैसे सांस्कृतिक-बौद्धिक केंद्रों के विकास में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने स्वध्याय विद्यापीठ, महू की स्थापना कर शिक्षा, भारतीय संस्कृति और मूल्यों के प्रसार का कार्य किया, जिससे अनेक विद्यार्थी और शोधार्थी लाभान्वित हुए। नगर के लेख देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं। उनकी लेखनी में भाषा की सहजता, विचारों की गहराई और सामाजिक सरोकार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया
साहित्यिक और पत्रकारिता संगोष्ठियों में वे अनेक बार मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किए गए, जहां उन्होंने हिंदी भाषा और समकालीन विमर्श पर प्रभावशाली विचार रखे।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कैलाश चंद्र पंत ने हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है। भारत सरकार और मध्य प्रदेश शासन के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने विभिन्न देशों की यात्राएं कीं और विश्व हिंदी सम्मेलनों सहित कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषा की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। इससे उन्हें वैश्विक साहित्यिक पहचान मिली।
कई सम्मान से नवाजे गए
पंत को इससे पहले भी बृजलाल द्विवेदी सम्मान, साहित्य भूषण, निराला साहित्य सम्मान, संस्कृति गौरव सम्मान और हिंदी सेवी सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय अलंकरण प्राप्त हो चुके हैं।





