देश 26 जुलाई को 23वां कारगिल विजय दिवस मनाने जा रहा है। यह खास दिन देश के उन वीर सपूतों
को समर्पित है जब तमाम मुश्किलों को पार करते हुए भारत के जांबाजों ने 18,000 फीट की ऊंचाई पर
बैठे दुश्मनों को खदेड़ कर कारगिल में विजय पताका फहराई थी। 1999 में ‘ऑपरेशन विजय’ नाम से शुरू
किए गए ऑपरेशन में अदम्य शौर्य और साहस का परिचय देने वाले देश के चार सैनिकों में से कैप्टन
विक्रम बत्रा और लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को मरणोपरांत और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, राइफलमैन
संजय कुमार को भारत के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र से किया गया सम्मानित।

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
टाइगर हिल के हीरो
कारगिल में आपरेशन विजय के दौरान अठारहवीं ग्रेनेडियर्स के ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव घातक प्लाटून
के सदस्य थे जिसे जम्मू कश्मीर के द्रास में टाइगर हिल टॉप पर कब्जा करने का काम सौंपा गया था।
03 जुलाई 1999 को दुश्मन की भारी गोलाबारी के बीच अपनी टीम के साथ उन्होंने बर्फीली खड़ी चट्टान
पर चढ़ाई की और वहां स्थित बंकर को ध्वस्त कर दिया जिससे प्लाटून उस खड़ी चट्टान पर चढ़ने में
कामयाब हो गई। पेट के निचले हिस्से और कंधे में तीन गोलियां लगने के बावजूद अतुलनीय ताकत का
प्रदर्शन करते हुए उन्होंने दूसरे बंकर पर हमला कर उसे भी ध्वस्त कर दिया और तीन पाकिस्तानी
सैनिकों को मार डाला। उनके शौर्यपूर्ण कारनामे से प्रेरित होकर प्लाटून को नया साहस मिला तथा उसने
अन्य ठिकानों पर हमला कर दिया और अंततः टाइगर हिल टॉप पर वापस कब्जा कर लिया। अदम्य
साहस और सर्वोच्च कोटि के शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को परमवीर चक्र
से सम्मानित किया गया।

राइफलमैन संजय कुमार
दुश्मनों को उनकी ही मशीनगन से दी मात
राइफलमैन संजय कुमार 13 जम्मू कश्मीर राइफल्स की एक कंपनी के लीडिंग स्काउट में शामिल थे
जिन्हें 04 जुलाई 1999 को जम्मू-कश्मीर के मुश्कोह घाटी में फ्लैट टॉप क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए
भेजा गया। चोटी पर पहुंचने के बाद, वह दुश्मन सेना के एक बंकर से की जा रही जबर्दस्त गोलाबारी की
चपेट में आ गए। आमने-सामने की लड़ाई में, उन्होंने तीन घुसपैठियों को मार गिराया और स्वयं भी
गंभीर रूप से घायल हो गए। इस कार्यवाही से दुश्मन के सैनिक बिल्कुल अचंभित रह गए और एक
यूनिवर्सल मशीन गन छोड़ कर भागने लगे। राइफलमैन संजय कुमार ने वह यूनिवर्सल मशीन गन उठाई
और भागते दुश्मनों को मार गिराया। उनकी इस साहसपूर्ण कार्यवाही से उनके साथियों को प्रेरणा मिली
और उन्होंने दुश्मनों पर धावा बोल कर अंतत: फ्लैट टॉप क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। उच्च कोटि की
वीरता और अदम्य साहस का प्रदर्शन करने के लिए राइफलमैन संजय कुमार को परमवीर चक्र से
सम्मानित किया गया।

कैप्टन विक्रम बत्रा
िजनकी वीरता को दुश्मन
ने भी किया सलाम
कारगिल में 1999 के आॅपरेशन विजय के दौरान 13 जैक राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा को प्वाइंट
5140 पर कब्जा करने का कार्य सौंपा गया। दस्ते का नेतृत्व करते हुए उन्होंने निडरतापूर्वक आमने-सामने
की लड़ाई मे चार शत्रु सैनिकों को मार गिराया। 07 जुलाई 1999 को उनकी कंपनी को प्वाइंट 4875 पर
कब्जा करने का कार्य सौंपा गया। आमने-सामने की भीषण मुठभेड़ में उन्होंने पांच शत्रु सैनिकों को मौत
के घाट उतार दिया। गंभीर रूप से जख्मी हो जाने के बावजूद, उन्होंने जवाबी आक्रमण में अपने सैनिकों
का नेतृत्व किया और वीरगति प्राप्त करने से पहले दुश्मनों की भीषण गोलाबारी के बीच सैन्य दृष्टि से
असंभव कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। उनके इस निडरतापूर्ण कार्य से प्रेरित होकर उनके जवानों
ने शत्रु का सफाया करते हुए प्वाइंट 4875 पर कब्जा कर लिया। उत्कृष्ट वीरता, प्रेरणादायक नेतृत्व,
अदम्य साहस तथा सर्वोच्च बलिदान के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत परमवीर चक्र से
सम्मानित किया गया।

लेफ्टिनेंट मनोज पांडे
खालूबार की लड़ाई के नायक
आॅपरेशन विजय के दौरान 11 गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को
जम्मू कश्मीर के बटालिक में खालूबार रिज को दुश्मनों से खाली कराने का काम सौंपा गया। 03 जुलाई
1999 को उनकी कंपनी जैसे ही आगे बढ़ी दुश्मन ने उन पर भारी गोलाबारी शुरु कर दी। उन्होंने
निडरतापूर्वक दुश्मन पर आक्रमण कर चार सैनिकों को मार डाला और दो बंकर तबाह कर दिए। कंधे और
पैरों में जख्म होने के बावजूद वे पहले बंकर के निकट पहुंचे और भीषण मुठभेड़ में दो अन्य सैनिकों को
मारकर बंकर खाली करा दिया। मस्तक पर प्राणघातक जख्म लगने से पहले एक के बाद एक बंकर पर
कब्जा करने में वे अपने दल का नेतृत्व करते रहे। उनके अदम्य साहस से प्रोत्साहित होकर उनके सैनिकों
ने दुश्मन पर हमला जारी रखा और अंततः पोस्ट पर कब्जा कर लिया। अत्यंत उत्कृष्ट शौर्यपूर्ण कारनामे
का प्रदर्शन और सर्वोच्च बलिदान करने के लिए लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को मरणोपरांत परम वीर
चक्र से सम्मानित किया गया।
रक्षा क्षेत्र 8 सालों में लगातार हुआ है मजबूत
सीडीएस- सरकार ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद के सृजन को मंजूरी दी और जनरल बिपिन रावत
को पहला सीडीएस बनाया। उनके निधन के बाद से यह पद खाली है जिसे जल्द ही भरने की प्रक्रिया
चल रही है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता- रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ाने के लिए स्वदेशीकरण पर जोर दिया जा
रहा है। अब तक कुल 310 रक्षा उत्पाद, प्रणालियों की 3 सूचियां जारी की जा चुकी हैं। जिनके आयात को
प्रतिबंधित कर देश में ही उन्हें खरीदा जाएगा। इस बार रक्षा खरीद के बजट में 68% राशि घरेलू बाजार
से खरीद के लिए रखी गई है।
बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर – दूसरे देशों से लगे हमारी सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है।
2014 से 2021 तक 6763 किमी सड़क और 15,000 पुल का निर्माण किया गया।
सेना को अधिक वित्तीय शक्ति – रक्षा बलों के आधुनिकीकरण और खरीद के लिए 2022-23 के बजट में
1.52 लाख करोड़ रुपये की घोषणा की गई। 2014 से अब तक इसमें करीब 76 फीसदी की बढ़ोतरी की
गई है।
आधुनिक हथियारों की खरीद– रूस से एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की पहली खेप मिल गई है।
क्लाशिनिकोव एके-203 अब देश में ही बनेंगी जबकि धनुष, के 9 वज्र, सारंग और अल्ट्रा लाइट होवित्जर
तोपें अब देश में ही बन रही हैं। 6 स्कॉर्पीन पनडुब्बी भारत में ही बनाई गई है जबकि अपाचे और चिनकू
हेलीकॉप्टर ने वायु सेना को मजबूती





