मुनेश त्यागी
आज कुछ लोग
कहते फिर रहे हैं
कि वे हिंदूओं
को जगा रहे हैं।
मैं कहता हूं कि
हिंदू जग नहीं रहें हैं,
वे तो बुरी तरह से रो रहे हैं,,,
मंहगाई के वारों से,
रोज कुलांचे भर रही
आर्थिक गैरबराबरी से,
जुमले बन गए नारों से,
सरकार के झूठे वादों से,
बेरोजगारी के थपेडों से,
लगातार बढ़ते अन्यायों से,
शोषण के रौंदते कदमों से,
दनदनाते हुए अपराधों से,
रोज रोज बढ़ रहे दामों से,
रोजाना हो रहे अपमानों से,
भूख और गरीबी की कराहों से,
औरतों पर बढ़ते अत्याचारों से,
लगातार खाली फिर रहे हाथों से,
महिलाओं पर रोज हो रहे अपराधों से,
किसानों मजदूरों पर बढ़ते अत्याचारों से,
जनता की एकता को तोड़ते हथियारों से,
देश व समाज विरोधी नीतियों और नारों से,
साम्प्रदायिक और नफरती सिपहसालारों से,
गंगा जमुनी तहजीब को रौंदते हुए विचारों से,
बलात्कारियों को दिये गये फूलों और हारों से,
सांप्रदायिक नफरत के शिकार बने नौजवानों से,
हिंदू मुसलमान दंगों और फसादों के आह्वानों से,
सरकार द्वारा छीने जा रहे जरूरी अधिकारों से।





