
दिलीप पांडेय
भारत की राजनीति में एक बदलाव आम आदमी पार्टी भी लेकर आई है, जिसकी शुरुआत 10 साल पहले हुई थी। इस राजनीति में जोर सुशासन और आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने पर है। दिल्ली के बाद इधर पंजाब में पार्टी की सरकार बनी है। इसका असर दूसरे राज्यों की राजनीति पर भी पड़ेगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का दिल्ली दौरा भी इसकी स्पष्ट झलक देता है।
दिल्ली विधानसभा के बजट सत्र से अंदाजा लगता है कि यह राजनीति कैसे बदल रही है। हर दिन जब दिल्ली के किसी चौराहे पर हमारी गाड़ी रुकती है, तो कुछ बच्चे आकर पेन, फूल, किताब, गुब्बारे खरीदने की फरियाद करते हैं। कोई नहीं सोचता कि ऐसे बच्चों वाले देश का भविष्य क्या होगा। सच तो यही है कि 75 साल में हम अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को निभाने में चूक गए। ऐसे बच्चों को देखते वक्त मेरी नजर अखबार की उस हेडलाइन पर भी पड़ती है, जो बताती है कि आईआईएम की फीस बढ़कर 21 लाख हो गई है।
क्या फुटपाथ के इन बच्चों ने कभी आईआईएम का नाम सुना होगा? इनकी छोड़िए, जिन मध्यवर्गीय बच्चों ने ऐसे संस्थानों का सपना देखा हो, उनके लिए यह फीस देना कितना संभव होगा? हमारे हजारों बच्चों को मेडिकल या अन्य पढ़ाई के लिए यूक्रेन और चीन जैसे देश क्यों जाना पड़ता है? हमारे बच्चों की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त संस्थान अपने देश में ही क्यों नहीं बन सकते? दिल्ली सरकार ने फुटपाथ के बच्चों के आवासीय विद्यालय के लिए बजट में विशेष प्रावधान करके देश की प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित करने की जरूरत बताई है।

महात्मा गांधी ने कहा था कि निर्णय लने से पहले सोचो कि इससे समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आदमी को क्या लाभ होगा। दिल्ली सरकार का आवासीय सुविधाओं वाला अत्याधुनिक विद्यालय इसी सोच के साथ की गई पहल है। दिल्ली सरकार ने इस बार बजट को ‘रोजगार बजट’ का नाम दिया। जरा सोचिए, जब आजादी के 75 साल बाद भी करोड़ों नौजवानों की ऊर्जा का सदुपयोग हम राष्ट्रहित में नहीं कर पा रहे हैं तो इसका मतलब है देश की राजनीति में बड़े बदलाव जरूरी हैं। दिल्ली के रोजगार बजट में इन जरूरतों का ख्याल रखा जाना इसी का संकेत है। बजट में स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए भी विशेष प्रावधान किए गए हैं।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है, ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सोई नृप अवसि नरक अधिकारी।’ यानी जिस राजा को सिर्फ अपना राज भोगना पसंद हो, और जहां प्रजा दुखी हो, वैसा राजा निश्चय ही नरक जाने लायक है। आप विधानसभा में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण देखिए, यहां लोगों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है और यह राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है। यह उपलब्धि तब हासिल हुई है, जब केंद्र दिल्ली से सौतेला व्यवहार कर रहा है। देश संविधान के मुताबिक चले, इसके लिए निर्धारित समय पर चुनाव होने चाहिए। लेकिन दिल्ली नगर निगम के चुनाव टालकर केंद्र ने डबल इंजन के खतरनाक इरादे स्पष्ट कर दिए हैं।
आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली नगर निगम के चुनाव की मांग करना भी काफी दिलचस्प है। हमने तो कभी सोचा ही नहीं था कि राजनीति करेंगे, पार्टी बनाएंगे, चुनाव लड़ेंगे। हम तो महज कुछ कानूनी सुधार की मांग लेकर आए आम आदमी थे। लेकिन हमें ललकारा गया कि चुनाव लड़कर दिखाओ। हम आज दिल्ली और पंजाब में सरकार चला रहे हैं।
जनता को विकास और सुशासन की राजनीति पसंद है। परंपरागत दलों ने धर्म-जाति के ध्रुवीकरण में चाहे जितनी महारत हासिल कर रखी हो, दिल्ली और पंजाब की जनता ने इस दायरे को तोड़ दिया है। बदलाव की यह लहर अन्य राज्यों में भी दिख रही है।
राजनीति की डगर वैसे भी कठिन होती है। बदलाव की राजनीति तो और मुश्किल होती है। जब कभी उलझन या दुविधा होती है, तो एक बार सोचता हूं कि यह हम जैसों के वश की बात नहीं। फिर कैफी आजमी साहब की बात याद आती है-
‘कोई तो सूद चुकाए कोई तो जिम्मा ले/ उस इंकलाब का जो आज तक उधार सा है।’
(लेखक दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के मुख्य सचेतक और तिमारपुर क्षेत्र से विधायक हैं)




