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उत्तम शौच लोभ परिहारी

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डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर,
शौच नाम सुचिता का है, पवित्रता का है। शुचिता-पवित्रता का सबसे बड़ा शत्रु है। लोभ। लोभ के कारण ही लोग ठगी, चोरी, हिंसा में लिप्त हो रहे हैं, यहां तक कि लोभ के कारण अपने सगे संबंधियों को भी मौत के घाट भी उतार देते हैं। भोग, उपभोग, जीवन, इंद्रिय अभिलाषा इन चार प्रकार के लोभ से विरत होना उत्तम शोच धर्म है। लोभ के सभी प्रकारों का त्याग करना शौच धर्म है। जो परम मुनि इच्छाओं को रोककर और वैराग्य के विचारों से सहित होकर आचरण करते है, उनके शौच धर्म होता है। कहा है ‘‘लोभः पापस्य कारणम्’’ लोभ ही सब पापों का करण है, अतः लोभ का त्याग करना चाहिए।

एक कथानक आता है- एक उच्चवर्गीय युवक  का विवाह हो गया, वह शिक्षा प्राप्त करने बनारस जाता है। वहां कुछ वर्षों रहकर सभी विषयों की शिक्षा प्राप्त करके घर लौटता है। उसकी पत्नी उससे पूछती है- आप क्या पढ़कर आये हैं? उसने बताया- ‘चारों वेद, पुराण, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद आदि सभी विषय पढ़कर आया हूं, तुम पूछो कुछ पूछना चाहती हो।’ पत्नी ने कहा- ये सब बेद पुराण तो मैं नहीं जानती, तुम तो यह बताओ कि ‘पाप का बाप क्या है।’ युवक ने कहा सभी विषय पढ़े पर यह नहीं पढ़ा। वह ये पाठ पढ़ने पुनः जाता है। काशी की गलियों में घूमते हुए उसके मन्तव्य को एक वेश्या ने जान लिया। उसने युवक को बुलाया कहा तुम्हारी क्या समस्या है? युवक ने कहा ‘पाप का बाप क्या है’ पाठ पढ़ना है। वेश्या ने उससे कहा आओ मेरे चौबारे पर ये पाठ तुम्हें पढ़ाऊंगी, युवक ने मना कर दिया कि मैं कुलीन हूं, तूं वेश्या मैं तेरे चबूतरे पर नहीं आ सकता। वेश्या ने 100 रु. की पेशकश की, युवक मान गया। वेश्या ने कहा तुम चलकर हारे थके आये हो कुछ खा-पी लो, सूखा सामान देती हूं तुम बना लेना, फिर तुम्हें पाठ पढ़ाऊंगी, इसके लिए मैं 200 रु. तुम्हें दूंगी। 200 के लालच में युवक मान गया। पुनः वेश्या बोली 500 मोहरें दूंगी मुझे भोजन बना देने दो, 500 के लालच में युवक वेश्या से भोजन बनवाने को मान गया। ज्यों ही वह कुलीन युवक खाना खाने लगा वेश्या बोली जब मैंने बना ही दिया है तो एक ग्रास मेरे हाथ से खा लीजिए मैं भी पवित्र हो जाऊंगी इसके लिए मैं तुम्हें 1000 मोहरें दूगीं, तभी तुम्हें पाठ भी पाप का बाप क्या है यह पाठ भी पढ़ा दूंगी। युवक ने सोचा यहां कोई देख तो रहा नहीं और 1000 मोहरें भी मिल रहीं हैं, पाठ भी मिल जायेगा। वह लालच में आकर वेश्या की बात मान गया। वेश्या ने भोजन का एक ग्रास उठाया, खिलाने लगी, युवक ने खाने को मुंह खोला कि वेश्या ने युवक के गाल पर एक चांटा जड़ दिया। युवक ने कहा तूने ये क्या किया, मुझे चाटा क्यों मारा। वेश्या बोली यही तो तुम्हारा सबक है, जो मैं पढ़ाने वाली थी। लोभ-लालच ही पाप का बाप है। तुम मेरे चबूतरे पर आने को भी तैयार नहीं थे, अपवित्र मान रहे थे और लोभ में पड़कर मेरे हाथ का बना और मेरे ही हाथ से खाने को भी तैयार हो गये।

लोभ में पड़कर व्यक्ति बड़े से बड़े पाप कर बैठता है। अतः अधिक लालच में न पढ़कर शौच धर्म अपनाना चाहिए।

ग्रहस्थ के लिए पंचतंत्र में कहा है- ‘‘अति लोभो न कर्तव्यः लोभो नैव परित्यजेत्’’ अत्यधिक लोभ नहीं करना चाहिए और भरण-पोषण के लिए लोभ त्यागना भी नहीं चाहिए। अत्यंत लोभ करने के परिणाम भयावह बताये हैं।  

-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’,

Ramswaroop Mantri

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