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दया करना ही दुर्भाग्य का कारण है !

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                    *सुसंस्कृति परिहार

शीर्षक पढ़कर हो सकता है आपको खराब लगे, लगना भी चाहिए पर क्या किया जाए जब आज एक  पेट्रोलियम टैंकर पर पिछवाड़े में लिखा यह सूत्र वाक्य पढ़ा आंखें विश्वास ही नहीं कर पा रही थीं कि ऐसा भी कोई लिख सकता है परन्तु सच यही था। सोचने विवश हो गई कि हमारा देश कितना बदल गया है देखते ही देखते जिस देश में रामचरितमानस पूज्य पुस्तक हो उसका पाठार्थ समझाने वाले हज़ारों प्रवचनकार लगे हो उसमें तुलसीदास लिखते हैं

 दया धर्म का मूल है,पाप मूल अभियान

तुलसी दया ना छोड़िए,जब तक घट में प्राण। उस देश में इस तरह सूत्र वाक्य लिखे दिखें तो उसकी भर्त्सना या हटवाने से कुछ नहीं होने वाला क्योंकि वह आज के समाज को प्रतिविम्बित ही कर रहा है और आंतरिक सच उजागर कर हमें हिदायत दे रहा है।

आंखों के सामने तैरने लगते हैं मणिपुर हिंसा में नग्न महिलाओं का उत्पीड़न और नूंह में 22वर्षीय इमाम की हत्या के साथ अनेकों ऐसी बेरहम घटनाओं के कई दृश्य। जिनमें  दया भाव लेशमात्र कहीं कभी नहीं नज़र नहीं आया ना किसी को रोकते देखा।हिंसा में हर जगह महिलाओं और मासूमों का जो हाल हुआ वह सिरहन पैदा कर देता है। आज अतिक्रमण  विरोधी अभियान हो या अपराधी के विरुद्ध मकान को बुल्डोज करना हृदय द्रवित नहीं करता।इसके उल्ट उस पीड़ा  पर हंसा ज़रुर जाता है।अपराधी दंडित हों ज़रुरी है पर उनकी पारिवारिक पीड़ा का हाल देखकर भी दया भाव आजकल क्यों गायब है? किसने हमारे देश का ये हाल बना दिया है इस पर विचार करना बहुत ज़रूरी है।

  अफसोस इस बात का है कि देश में जब से हिंदू राष्ट्र की आवाज़ उठाई जाने लगी है तब से धार्मिकता  का चोला ओढ़कर कतिपय राजनीतिज्ञों के इशारे पर समाज में जो वैमनस्यता फैलाई जा रही है उससे अल्पसंख्यकों , महिलाओं और दलित समाज के प्रति दुर्भावना बढ़ रही है जिसमें भोले भाले आदिवासी भी शामिल हैं।इस आचरण से हमारी गंगाजमुनी तहज़ीब को गंभीर ख़तरा आते हुए हम देख रहे हैं।इस तहज़ीब को बचाने दयाभाव का होना अतिआवश्यक है। सोचिए एक ओर हम जीव-जंतुओं मसलन गाय,सर्प वगैरह के प्रति रहमदिली बताते हैं उन्हें पूज्य मानते हैं वहीं इंसान के प्रति नफ़रत का जहर फैलाने में लगे हैं।ये तब  यहां हो रहा जब हमारी भारतीय संस्कृति के दया,करुणा ,सत्य अहिंसा  जैसे बहुमूल्य विचारों को दुनियां के बड़े समृद्ध राष्ट्रों ने अपनाया हुआ है । गांधी जी द्वारा गाया जाता नरसो मेहता का गीत “वैष्णव  जन तो तेने कहिए  पीर पराई जाने रे ”आज दुनिया में एक ताकत बन उभरा है विश्व के तमाम लोकतांत्रिक देशों में नस्ली, धार्मिक और जातिगत भेदभाव लगभग ख़त्म हो चुका है तब भारत में जन्मे ये मानवतावादी सदभाव ख़़त्म होने की कगार पर है।

  सनातन धर्म में सबके कल्याण  की बात की गई। वसुधैव कुटुम्बकम इसकी पुष्टि करता है जिसमें इंसान ही नहीं धरती पर मौजूद तमाम जीव-जंतुओं, पेड़ पौधों, तमाम प्राकृतिक  उपादानों  को कुटुम्ब की संज्ञा दी गई है।देश में  जन्में महापुरुषों बुद्ध ,महावीर आदि ने भी जो महत्वपूर्ण जीवन संदेश दिए  वे हमारी अमूल्य निधि हैं। इस अनमोल विरासत से दया,समता,ममता, एकता और सद्भाव का मंत्र आज खतरे में हैं। पैगम्बर हज़रत मुहम्मद भी कहते हैं “मुझे दया के लिए भेजा गया है शाप देने के लिए नहीं।” फिर ये भाव विलोपित क्यों हो रहा है। ‘महाभारत’ में भी तो यही लिखा है ‘दया सबसे बड़ा धर्म है।’ दयाभाव छोड़कर क्या हम अधर्मी  हो रहे हैं। संसार के सभी धर्म एक सिरे से दया भाव पर ज़ोर देते हैं।तब ये हालत कैसे और क्यों बनी। मुंशी प्रेमचंद तो यहां तक कहते हैं कि ‘दया तो मनुष्य का स्वाभाविक गुण है।’तो क्या हमारा स्वाभाविक गुण हमसे विलग हो गया है नहीं यह असंभव है क्योंकि रहमदिली तो जानवरों जीव-जंतुओं में मिलती है तो मानव कैसे अछूता रह सकता है।

ये बात और कि पूंजीवादी संस्कृति हावी होने के कारण लोगों में अमीर बनने की जो प्रवृत्ति घर कर गई है वहीं इस दयाभाव की हत्यारी है। पिछले सालों में तो कारपोरेट संस्कृति ने जो नुकसान देश को पहुंचाया है उसने तो उन छोटे छोटे अमीरों को भी चाट लिया। यहां तक कि देश के वे बड़े प्रतिष्ठान जिनमें रोजगार सर्वाधिक मिलता था उसको भी लील लिया।भारत देश किसानों का देश था जिससे परस्पर बहुसंख्यक लोग इस तरह जुड़े थे कि वे देश के बड़े त्योहारों की वजह बने।आज भी दीपावली और होली उस सामंजस्य की याद दिलाते हैं।यह सब बिखर रहा है हर जगह राहुल गांधी की भाषा में कहें ‘हम दो हमारे दो’ ही रह गए हैं जिनमें दयाभाव सिरे से नदारद है।ऐसी स्थितियों में यह लिखा जाना कि दया भाव दुर्भाग्य  का कारण है आज की उत्पन्न परिस्थितियों में सही प्रतीत होता है।

और तो और आजकल इसका ठेका जिन दयाभाव दिखाने वालों ने ले रखा है मसलन गरीब बच्चियों के सामूहिक विवाह, बड़े बड़े भंडारे जिनमें ग़रीब गुरबे एक दिन भरपेट भोजन तो कर ही लेते हैं। वे चुनिंदा धंधेबाज है।इसी तरह सरकार भी दयाभाव से सम्पृक्त होकर लाड़ली बहना को हजार रुपए दे रही है बुजुर्गों को तीर्थाटन कराती है वगैरह।यह दयाभाव नहीं बल्कि यह उस दिन की तैयारी होती है जो सीधे-सीधे मतदान से जुड़ता है। दयाभाव का ग़लत इस्तेमाल राजनीति और धार्मिक पाखंडियों के बीच सबसे ज्यादा देखने मिलता है जिसके पीछे दैहिक शोषण के साथ ही दया पाए लोगों का हर तरीके से शोषण होता है वे कांवड़िए हो या रैलियों में जाने वाले लोग।

आज लोग इतने परेशान हैं कि वे इस दया भाव को अपने रसूख से जोड़ने लगते हैं कुछ तरक्की भी कर लेते हैं। देखा-देखी इनकी संख्या बढ़ती चली जा रही है।चुनावी घोषणाएं तो ऐसी आ टपकती है जिससे लगता है उनका जीवन सफल हो जाऊंगा।बस एक बार — सरकार ने तो दरिया दिली के ऐसे ख़्वाब दिखाएं कि लगा 15 लाख की लाटरी खुल गई और क्या चाहिए?इस राजनैतिक दया भाव का अंजाम हम सब देख चुके हैं। चुनाव में कंबल,साड़ी ,नकद राशि आदि जिस दयापूर्वक दी जाती है वह भी क्यों  यह सत्य किसी से छिपा नहीं है।कहने का आशय यह है कि आज दया भाव का स्वरुप इतना विकृत हुआ है कि उसने तमाम नैतिकताओं को दफन कर दिया है आज तो दया पूर्वक दिया दान प्रतिदान मांगता है।

जिस सूत्र वाक्य को पढ़कर दुख हुआ। महसूस हो रहा है आज के परिवेश में लोग जैसा देख रहे हैं वैसा ही तो लिखेंगे।समाज का आईना है  यह। बहरहाल अब ये हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि इस अध्याय को बदलकर कैसे हम अपनी संस्कृति की वापसी करते हैं।देश में अभी भी दयाभावी चंद लोग मौजूद हैं जो आजीवन दयाभाव के साथ दूसरों के दुखदर्द में सहभागी है और मानवतावादी समाज को आगे बढ़ा रहे हैं वे धन्य है जो कठिन परिस्थितियों में इस सूत्र से मुक्ति मार्ग दिखा रहे हैं।उनका साथ देना बहुत जरूरी है वरना आगे क्या क्या लिखा मिल सकता है कल्पना से परे हैं।आमीन ख़ुदा ख़ैर करे।

Ramswaroop Mantri

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