मिलता है रोजगार

दीक्षा बोरा
उम्र – 17 वर्ष
कक्षा – 11वीं
रा. इ. का. मैगडी स्टेट
गरुड़, उत्तराखंड
पहाड़ों में होता है ये,
जंगलों के बीच पलता है,
लाया जाता पहाड़ियों से,
कई नई बातें इसमें ढलता है।
होता है इसका बहुत सारा भार,
पर इससे मिलता है रोजगार,
जंगलों से इसे लाया जाता,
बाहर जाकर इसे बेचा जाता।
समझा जाता है इसे
एक अच्छा साधन, एक पहचान,
इससे पहाड़ों में आता है
विकास का नया प्रमाण।
महिलाओं को भी मिलता है
इससे रोजगार का सहारा,
हो जाती हैं वे आत्मनिर्भर,
बदल जाता है जीवन सारा।
मिल जाए अगर ये रोजगार,
तो सपने होते हैं साकार,
होती है तब अपनी एक पहचान,बढ़ता है आत्मविश्वास अपार।
कहाँ है शिक्षा?

– भावना
उम्र – 18
बागेश्वर, उत्तराखंड
कहते हैं देश बदल रहा है,
पर स्कूलों की हालत पूछो।
काग़ज़ों में हर रोज़ नया सपना,
हक़ीक़त में टूटते सपनों को देखो।
अरबों का बजट काग़ज़ों में आया,
पर क्लासरूम में कुर्सी तक नहीं।
दीवारों पर लिखा शिक्षा सबका अधिकार,
अंदर बच्चे बैठे किताब नहीं, शिक्षक नहीं।
मिड-डे मील में रोटी मिल जाती है,
पेट तो किसी तरह भर जाएगा।
पर ज्ञान का भोजन कब मिलेगा?
भविष्य कौन और कैसे बनाएं?
गाँव के मासूम नन्हें कदम,
किलोमीटरों चलकर स्कूल आते हैं।
फटी चप्पल, ऊबड़-खाबड़ रास्ते,
फिर भी सपनों के लिए रोज़ लड़ते जाते हैं।
कैसे बनेगा विश्व गुरु यह देश,
कैसे उड़ान भरेंगे बच्चों के सपने,
जब छोटी-छोटी सुविधाओं के बिना,टूट जाता है हौसला उनका?
ये बिछड़े पल

दीपा
कक्षा – 11वीं
गाँव – सुराग
ये हैं मेरे जीवन के बिछड़े पल,
दो दिन की छुट्टी में मिली सलाह,
ऐसी सलाह जो दो दिलों को मिला देती है।
वही सलाह मैं फिर से पाना चाहती हूँ,
एक नई उम्मीद फिर जगाना चाहती हूँ।
ऐसे हैं ये पल जो बिछड़ गए हैं मुझसे,
चले गए वो दिन जिनसे उम्मीद मिलती थी।
फिर एक दिन चरखा आई,
दिया जिसने मुझे सहारा,
टूटी उम्मीदों के बीच,
एक नई राह दिखाया।
अब अपने कदम बढ़ाने हैं,
अब अपनी मंज़िल पानी है,
बिछड़े पलों को याद कर
टूटी उम्मीद को फिर जगानी है
आपदा का कहर

ललिता परिहार
कक्षा – 8वीं
जखेड़ा, गरुड़
बागेश्वर
जब से आई है आपदा,
तब से हरियाली सो गई।
पेड़ों से पूछो क्या हाल हो गया?
पेड़ों को बहा ले गई नदियाँ,
सब कुछ अपने साथ ले चली।
न पेड़ बचे, न चिड़ियाँ रहीं,
न कहीं उनकी आवाज़ गूँजी।
रोते-रोते बोली धरती,
ये कैसी आपदा है आई?
पेड़ों के साथ मुझे भी बहा ले गई।
पेड़ों से मिलती थी ऑक्सीजन,
अब वह भी घटती जाती है।
नदियों के आगे क्या,
नदियों के पीछे क्या,
सबको अपने साथ ले जाती है।
बाढ़ आए, मेरा घर टूटा,
जीवन छोटा हो गया।
आपदा के इस कहर में
पूरा गाँव ही बह गया।





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