
उदयपुर, “कविता मनुष्य के उद्विकास की एक उच्चतर अवस्था है। साहित्य, कला, संगीत से विहीन
मनुष्य मनो पशुवत जीवन ही जी सकता है। किसी भी बड़ी साधना की पूर्व शर्त सावकाश है।
आज की पीढ़ी के पास यह उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद यदि कोई युवा कवी कर्म की
साधना करता है तो उसका स्वागत और सम्मान किया जाना चाहिए। दर्पण की कविताये इसलिए भी
महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनमे नया तेवर, नया शिल्प और नै व्यंजन के दर्शन होते हैं।”
उक्त विचार वरिष्ठ कवि डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय ने युवा कवि दर्पण चण्डालिया की काव्य कृति
“हथेलियों में उगते गुलाब” के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में कविता के बारे में बात करने के अवसर कम हो गए हैं।
कक्षा कक्षों में भी साहित्य पर इस प्रकार चर्चा नहीं होती कि कविता के मर्म को समझा जा
सके। जयपुर से आये वरिष्ठ प्रगतिशील कवी गोविन्द माथुर ने कहा कि किसी भी कवि की भाषा,
शिल्प और बिम्ब उसकी कविता को विशिष्ट बनाते हैं। उन्होंने कहा कि दर्पण चण्डालिया की
कविताओं से गुजरते हुए उन्हें नयी कविता आन्दोलन के प्रमुख कवि शमशेर सिंह की याद आती
है।

विशिष्ठ अतिथि वरिष्ठ गीतकार और राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व कोषाध्यक्ष किशन
दाधीच ने अपने उद्बोधन में कविता की शास्त्रीय परंपरा और उसमंे उपस्थित लय की चर्चा
करते हुए कहा कि आवश्यक नहीं कि सिर्फ गीत ही गाये जा सके, मुक्त छंद की कविता भी गयी जा सकती
है। दर्पण की कविताओं में लय है, उसका बिम्ब विधान चमत्कृत करता है। उर्दू की
ख्यातनाम अफसानानिगार और उपन्यासकार डॉ. सर्वत खान ने उर्दू साहित्य के हवाले से दर्पण की
कविताओं की चर्चा करते हुए कहा कि अच्छी कविता में भाषा की सादगी और अर्थ की
गहराई ज़रूरी है जिसकी बानगी दर्पण की कविताओं में देखने को मिलती है। उन्होंने
पुस्तक से पंक्तियों के उद्वरण देकर बताया कि दर्पण की कविताओं को सरसरी टूर पर नहीं पढ़ा जा
सकता। वह पाठक को रुकने पर मजबूर करती है। वरिष्ठ आलोचक प्रो मलय पानेरी ने कहा कि
आधुनिक समय में विज्ञानं और प्रौद्योगिकी ने हमें शक्तिशाली बनाया है, हमारे जीवन को
सुविधापूर्ण बनाया है किन्तु हमें कविता से, संवेदनशीलता से, रिश्तों की ऊष्मा से दूर कर
दिया है।
उन्होंने कहा कि दर्पण चण्डालिया में हमें एक संभावनाशील रचनाकार और कवि के
दर्शन होते हैं। गुजरात से आये वरिष्ठ कथाकार डॉ. गोपाल सहर ने पुस्तक में लिखी अपनी
भूमिका से अनेक कविताओं को उधृत करते हुए कहा कि दर्पण की कविताओं को सामान्य
पारंपरिक कविता की तरह नहीं पढ़ा जा सकता। उसकी कविता में स्थापित परम्पराओं को तोड़कर
नवीन सृष्टि करने का साहस कथ्य व बिम्ब सभी स्तरों पर दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि
कविता के अर्थ को यदि बाँध दिया जाये तो कविता की हत्या हो जाती है।
उन्होंने कहा कि पाठक अपने लिए अपने ही अर्थ का सृजन करता है। श्रेष्ठ कविता पाठक को यह
स्वतंत्रता देती है। दर्पण की कविता इसका एक अच्चा उदाहरण है। कार्यक्रम में पुस्तक में
रेखांकन और पृष्ठ सज्जा करने वाली नागपुर से आई अवंती टोहारे ने अपने रेखांकन के बारे
में बताया और एक कविता भी प्रस्तुत की। इस अवसर पर प्रो सुधा चौधरी ने शाल ओढ़कर
उनका सम्मान किया। कार्यक्रम में इक़बाल हुसैन इक़बाल और जगदीश तिवारी ने भी अपनी
रचनाये प्रस्तुत की। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. राजेश शर्मा ने किया तथा धन्यवाद डॉ.
करुण चण्डालिया ने ज्ञापित किया। प्रारंभ में प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया ने सभी अतिथियों का
स्वागत किया व् मनमोहन मधुकर ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।
हिम्मत सेठ
मो. 9460693560





