
राजेन्द्र चौधरी
किसी को यह जानने के लिए कि महिला सफाई कर्मियों के साथ भेदभाव होता है, उन की स्थिति बहुत ख़राब है, उन की आपबीती बताती यह किताब “ज़हर जो हमने पिया” पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह कोई अबूझ पहेली नहीं है। परन्तु यह ज़हर किस-किस रूप में आता है, और वो इस से कैसे-कैसे निपटती हैं, कौन इस में उन का सहायक हो सकता है और कौन और कैसे उन के ज़हर को बढ़ाता है, यह जानने के लिए इस किताब को पढ़ना ज़रूरी है। मुझे सफ़ाई कर्मचारियों से सहानुभूति होने के बावजूद, इस किताब से उन के जीवन के बारे में बहुत कुछ नया जानने को मिला।
किसी विद्वान ने कहा है कि अगर दो लोग एक दूसरे की ओर पीठ कर के खड़े हों, तो पास-पास होते हुए भी एक दूसरे से काफ़ी हद तक अनजान रह जाते हैं। विषमताओं, और विशेष कर जातियों-सम्प्रदायों में बंटे हमारे समाज पर यह बात बखूबी लागू होती है। यह किताब इस कमी को, इस अनजानता को कुछ हद तक दूर करती है। महाराष्ट्र से छपी सफ़ाई कर्मियों के जीवन पर एक दो किताबें तो पहले भी पढ़ी हैं परन्तु ये किताब तथाकथित तौर पर सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हरियाणा से है। इसलिए भी यह किताब स्वागत योग्य है हालाँकि यह देखना बाकी है कि इस का कितना स्वागत होता है यानी कितनी पढ़ी जाती है ये किताब।
जातिगत भेदभाव, गरीबी और महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया हालाँकि महिला सफ़ाई कर्मियों के जीवन के बुनियादी अंग हैं, परन्तु इन 41 जीवनियों को पढ़ते हुए आम तौर पर दोहराव महसूस नहीं हुआ; अगर थोड़ी देर के लिए कहीं दोहराव महसूस भी हुआ तो जल्द ही कहानी ने नया मोड़ ले लिया। ये केवल दुःख दर्द की कहानियां नहीं है, अपितु संघर्षों और विपरीत परिस्थितियों में जगाई रखी गई उम्मीद का दस्तावेज़ भी हैं। किसी के अपनों ने भी समाज द्वारा दी जा रही पीड़ा में घी डाला, कहीं बाप या बाप जैसों ने शोषण किया तो कहीं बाप और बाप जैसों ने उम्मीद से बढ़ कर साथ दिया, कहीं ननद और सास ने सताया तो कहीं ननद ने माँ के विरुद्ध जा कर संबल दिया। कहीं पति जल्लाद है तो कहीं सौतेला पिता भी बच्चों को असली बाप की तरह रखता है।
धनबाद, झारखण्ड की बेटी और हरियाणा की दोहती की कहानी भी है। कहानियों सी रोचक भी है यह क़िताब। जीवन इकहरा नहीं होता, किसी को शादी से पहले भी सुख नहीं मिला, तो किसी को ससुर के रूप में बाप का साया मिला, तो कहीं, पर कहीं-कहीं ही, पति ने बल्कि दूसरे पति ने भी सच्चा साथ निभाया। अडचनों के बावज़ूद सपने नहीं थमते। ‘बेटी का सपना है कराटे….. बड़ा बेटा इंजीनियर बनना चाहता है जबकि परी का सपना डॉक्टर…’ एक ने बेटे को ‘मिस्टर हरियाणा’ बनाया है तो किसी की बहन डाक्टर बन गई और बेटा पत्नी के साथ इंग्लैंड पढ़ने गया हुआ है। बड़ी बात यह है कि सास का उत्पीड़न सहने वाली बहुत सी महिलाओं ने भी अपनी पुत्रवधू को सहेली बनाने की आस बना रखी है।
जातिगत भेदभाव तो इन सब 41 महिलाओं ने झेला है भले ही ये ‘बेटी, चूहड़े की तो कोनी लागती तूँ’ के रूप में बेटी के अपनेपन भरे संबोधन के साथ हो या बेहद अपमानजनक रूप में: ‘लोग बर्तन हाथ में नहीं देते थे और हमें उन्हीं गंदे हाथों ओक से पानी पीना पड़ता। बर्तन को छूने से बचाने के लिए इतने ऊपर से पानी पिलाते कि कपड़े भीग जाते थे।’ हैरानी है कि कोई महिला, पीठ पीछे नहीं मुँह पर इतनी अभद्र बात भी कह सकती है: मेरे सुन्दर भाई-बहन को देख कर आंटी बोली – ‘तुम कुछ भी कहो, कहीं न कहीं जमीदारों का बीज पड़ा है, इसलिए ये गोरे हैं, चूहड़े तो बिल्कुल भी गोरे नहीं होते।’ पर अब जातिगत भेदभाव का विरोध भी होने लगा है। एक दिन मैंने भी उन के घर की एक लड़की के बारे में पूछ लिया – आंटी यह लड़की भी चूहड़ों की है क्या?…
यह काले रंग की क्यों है? क्या चूहड़ों का बीज पड़ा है?’ या ‘मैंने कहा था –‘दादा, तेरे बेटे को पाली रख ले, वह क्यों जाता है स्कूल। जब मेरा भाई कुछ नहीं बनेगा तो तेरा लड़का के बनेगा स्कूल जाकर’… और अपने भाई का दाखिला स्कूल में करवा दिया। इन कटु अनुभवों के बीच कुछ राहत के पल भी हैं: ‘वहाँ मेरी सहेलियाँ हैं… कोई जाट है, कोई यादव’, ‘मेरी दो सहेलियाँ पंजाबन थीं, दो जाटनी थी। हम इकट्ठा रहतीं। शादी के बाद सबसे दोस्ती छूट गई। अब सहेलियाँ हिसार में हैं, पर मिलती नहीं।’ स्पष्ट है कि जातिगत भेदभाव नैसर्गिक न हो कर सामाजिक रूढ़ि है। अगर नैसर्गिक होता तो बचपन में जातियों के बीच दोस्ती नहीं होती! बचपन की दोस्तियों का बाद में टूट जाना, सामाजिक जकड़न की ताकत भी दर्शाता है।
जातिगत भेदभाव तो है ही परन्तु केवल इतनी बात ही नहीं है। गरीबी, महिला उत्पीड़न, शराबखोरी और शिक्षा व्यवस्था पर भी रोशनी डालती हैं ये जीवनियाँ। ‘चाऊमिन खाकर सोते थे। रोटी महँगी पड़ती थी’ पढ़ कर यह याद आ गया कि मैकडॉनल्ड्स, जिस पर आज भारत का मध्यवर्ग लाइन लगा कर खड़ा होता है, अमरीका में असल में गरीब का भोजन है। उधार मिलता तो है पर 5 रुपया सैंकड़ा पर और बैंक ब्याज़ की तरह यह वार्षिक दर नहीं बल्कि मासिक दर है। दादी सफ़ाई कर्मचारी, बाप बैंक में क्लर्क और बेटी फिर कच्ची सफाई कर्मी। कैसा हो रहा है हमारे देश का विकास? हालाँकि कईयों ने सफाईकर्मी की नौकरी छोड़ कोई और काम करने की इच्छा जताई है परन्तु अधिकांश की पुकार तो कच्ची नौकरी को पक्की करने की है।
निश्चित तौर पर यह पुकार केवल सफ़ाई कर्मियों की नहीं है परन्तु इतनी सी बात भी आज पूरी नहीं हो रही। दाद देनी पड़ेगी उस महिला की जिस का बचपन में यौन शोषण हुआ, जो चाह कर भी पढ़ नहीं पाई परन्तु पति से ‘जुए के पैसे, पाप की कमाई लेने से मना किया… माँग कर नहीं खाऊँगी और न ही कोई चोरी करूँगी। मैं काम कर सकती हूँ, माँग कर नहीं खा सकती’। पर हमारा समाज है कि काम ही नहीं दे सकता। यह भी बता दूँ कि भारत सरकार के आंकड़ों में एक खाना ‘कामकाजी परन्तु गरीब का भी होता है यानी काम है भी तो जीने लायक पगार/आमदनी नहीं।
शायद जाति, गरीबी से बड़ा अभिशाप है महिला होना। तभी तो, “यदि भगवान आपको छूट दे कि आप अगले जन्म में उच्च जाति की अमीर महिला बनना चाहोगी या निम्न जाति का गरीब लड़का, तो आप इन में से क्या चुनेंगी?…. गरीब पुरुष” ‘….लड़कियों को भी लड़कों की तरह पालने वाले’ बाप ने भी 12 साल की उम्र में बेटी को ब्याह दिया। इसलिए बीस साल की उम्र में 5 बच्चों की माँ की कहानी भी है (परन्तु 18-19 साल की उम्र में शादी करने वाली भी हैं)। ‘बेटी मिलने आए और खर्चे का भी डर हो, कितने दुख की बात है’। यह दुख केवल सफ़ाई कर्मी माँ को नहीं, बहुतों का है। और कंगाली में आटा गीला वाला काम कर देती है शराबखोरी। तभी तो आठ साल की बेटी बोली-‘मम्मी, मैं जब शादी करूँगी तो लडके के मुँह को खोल कर देखूँगी कि वह शराब तो नहीं पीता।’
‘झाड़ू नहीं, कलम थामनी होगी’ और ‘पढ़ाई से ही ज़िन्दगी बदलेगी’ जैसे सपने भी व्यवस्था के आगे दम तोड़ देते हैं। पढ़ने की इतनी तीव्र इच्छा कि स्कूल में नाम दर्ज न होने के बावजूद चचेरी बहन के साथ स्कूल जाती थी परन्तु ‘स्कूल में जो लड़कियां फेल हुई थी, उनका मुँह काला करके चारों तरफ घुमाया गया… इस के बाद मैं कभी स्कूल नहीं गई’। ‘मेरे माता-पिता एक स्कूल में काम करते थे लेकिन हम चारों बहने अनपढ़ हैं। मेरे भाई पढ़े-लिखे हैं’। बारहवीं पास कर, घरों में साफ़-सफ़ाई का काम करने और एक स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने वाली कमला की बीए बीएड की फीस भरने की औकात नहीं है। संपादक मण्डल की मेहनत और सफलता छोटी नहीं है। किसी महिला द्वारा अपने साथ बरसों पहले हुए बलात्कार की चर्चा सार्वजनिक तौर पर करना, वो भी कानूनी करवाई हेतु नहीं बल्कि महज एक घटना के तौर पर, इंगित करती है कि आप ने उन का भरोसा पूरी तरह जीत लिया है। विश्वास जीतने की शुरुआत होती है एक बेहद सामान्य परन्तु असाधारण घटना से।
एक अधिकारी का अपने मातहत कर्मचारियों की सुनवाई करना कोई क्रांतिकारी कदम नहीं है परन्तु ऐसा आम तौर पर होता नहीं है। महिला दिवस पर महिलाओं द्वारा स्टेज पर प्रस्तुति कोई बड़ी बात नहीं है परन्तु जब ये मौका सफाई कर्मी महिलाओं को मिलता है, तो उनके दबे कुचले अरमान जाग जाते हैं। अधिकारी की इतनी औकात तो नहीं कि वे इन कच्चे कर्मचारियों को पक्का कर दें या इन का वेतन बढ़ा दें, और उन्होंने ये किया भी नहीं, परन्तु उन के साथ सम्मान के साथ पेश आना, उन की बात सुनना, तो हर अधिकारी कर सकता है। अशोक गर्ग ने इतना भर किया और उन के मन में पैठ बना ली। इतना आसान भी होता है कुछ करना!
इस किताब को ज़रूर पढ़ें और दूसरों को भी पढ़वाएँ। हो सकता है कि किसी के दिल को निम्न पंक्तियां छू जाएँ ‘हम धूप में जलते-सुलगते रहते हैं, वे सिर्फ पानी पिलाने में ही तंग हो जाते हैं’ ‘सम्मान हमें याद रहते हैं, अपमान हमें भूल जाने पड़ते हैं।’ अगर पीड़ा के कारण कई हैं तो निवारण के उपाय भी कई होंगे। यह तो ठीक है कि जातिगत भेदभाव और महिला को इन्सान न मानने की प्रवृति को नष्ट किये बिना एवं सब के लिए सम्मानजनक आजीविका की व्यवस्था किये बिना महिला सफ़ाई कर्मियों का जीवन खुशहाल नहीं हो सकता परन्तु अगर आग को हवा देने वाले कारकों में विविधता हो तो उपाय, भले ही वे प्राथमिक उपचार सरीखे उपाय ही हों, उन में भी विविधता होगी। प्रयास तो समस्या के खात्मे के ही होने चाहिए परन्तु तात्कालिक राहत, मरहम को भी नज़रन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए। इस क़िताब की बुनियाद भी यही विचार प्रतीत होता है।
बचपन में जिस का यौन शोषण हुआ, जो चाह कर भी पढ़ नहीं पाई परन्तु जिस ने पति से जुए के पैसे, पाप की कमाई लेने से मना किया और कहा कि ‘माँग कर नहीं खाऊँगी और न ही कोई चोरी करूँगी। मैं काम कर सकती हूँ, माँग कर नहीं खा सकती’, वही निर्मला कहती है ‘किसी भी जाति में सभी लोग <एक जैसे> नहीं होते। मेरे पापा और मेरे चाचा में भी दिन रात का फर्क है। मेरे पापा रोज पीते थे, माँ से मार पिटाई करते थे, लेकिन चाचा और चाची बहुत प्यार से रहते हैं। मेरी मम्मी की भी बहुत इज्जत करते हैं। ।।। कोई जाति ख़राब नहीं होती, आदमी खराब हो सकता है’। जीवन में बेहद कटु अनुभव होने के बावजूद कटुता का न होना! सलाम है आप को निर्मला।
“ज़हर जो हमने पिया” (2025) यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र। सम्पर्क सूत्र unic.publishers10@gmail.com; 9000968400 सम्पादन: अशोक कुमार गर्ग, मनोज छाबड़ा और राजकुमार जांगड़ा
(राजेन्द्र चौधरी, भूतपूर्व प्रोफ़ेसर, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक। वर्तमान में क़ुदरती खेती अभियान, हरियाणा के सलाहकार।)





