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सियासी प्रहसन?

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शशिकांत गुप्ते

यह उथलपुथल है,या आपस में उठा पटक है।उठापटक भी नहीं कह सकतें हैं।कुछ तो स्वयं ही स्वयं को उठा कर एक जगह से दूसरी जगह पटक रहें हैं।कुछ तो एक ओर सुचिता की दुहाई देतें हैं, दूसरी ओर, स्वयं के द्वारा स्वयं को उठाकर पटकने वाले हों या दूसरी जगह से दूध में से मख्खी की तरह निकाल बाहर किए हुए हों उन्हें सहर्ष स्वीकार कर लेतें हैं।
ऐसे व्यक्ति को भी स्वीकार कर लेतें हैं,जिस हर तरह के भ्रष्ट्र आचरण का आरोप हो?
जो हो रहा है,यह सब सियासी प्रहसन माफ़िक प्रतीत हो रहा है।
लेखक ने प्रहसन का शाब्दिक अर्थ जानने की कोशिश की,तो गूगलबाबा ने प्रहसन का अर्थ निम्नानुसार बताया।
प्रहसन:- रूपक का वह भेद जिसमें तापस, सन्यासी, पुरोहित, भिक्षु, श्रोत्रिय आदि नायकों और नीच प्रकृति के अन्य व्यक्तियों के मध्य परिहास चर्चा होती है प्रहसन कहलाता है,निकृष्ट श्रेणी के पात्रों का परिहासपूर्ण अभिनय संकीर्ण प्रहसन के अंतर्गत आता है।

वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य प्रहसन का पर्याय बन गया है।
बार बार लिखा जा रहा है कि, राजनीतिशास्त्र (Political Science) है।इसे विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाता है।
इनदिनों विश्वविद्यालय भी कुकुरमुत्ते की तरह तादात में खुल रहें हैं।कुकुरमुत्ते का मतलब होता है।सीली हुई जगह उगने बाला पौधा।
विश्वविद्यालयों की सर्वसुविधायुक्त ईमारतों की बाह्य साज सज्ज़ा तो नयनाभिराम होती है।खोज का विषय तो यह है कि, ऐसे विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थीयों कितने शिक्षित हो पातें हैं?पढ़े लिखे तो लगभग सभी मिल जाएंगे।
कुछएक विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम तो बाबा आदम के जमाने का ही है किंतु, गणवेष बदल दिया है।
उपर्युक्त सभी मुद्दों पर गम्भीरता से सोचने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि,राजनैतिक माहौल प्रहसन जैसी ही बन रहा है।
कोई यहाँ से वहाँ जा रहा है।कोई सीधे हाथ की राह को छोड़ दक्षिण की ओर मुड़ रहा है।कोई मस्खरा लोगों को हँसाना की जगह स्वयं हँसी का पात्र बन रहा है।
एक ओर यह सब हो रहा है।दूसरी ओर कानून के रक्षक स्वयम्भू यमराज बन रहें हैं?
बुनियादी समस्याओं के लिए सवाल करने वालों को देशद्रोह की श्रेणी में रखा जा रहा है?
महाभारत की कथा का कलयुगी रूपांतर हो रहा है।द्रौपदी का चीरहरण सरे आम हो रहा है।कौरवों की संख्या में इजाफा हो रहा है।पांडव सिमटते जा रहें हैं।एक बात अच्छी है कि, कृष्ण,कन्हैया पांडवों के साथ ही है।
अब इतंजार है कि महाभारत की कथा का कलयुगी रूपांतर हक़ीकत में कब परिवर्तित होती है।कब कलियुगी शिशुपालों के सौ छूट कब खत्म होतें हैं,और कब कलयुगी कृष्णजी का वैचारिक सुर्दशन चक्र चलता है।
एक शायर ने कहा है।
अभी तक कोई ऐसी रात नहीं बनी,जिसका सवेरा न हुआ हो

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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