अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

नामकरण की राजनीतिक परंपरा: प्रतीक और सत्ता का बदलता चेहरा

Share

(दिनेश के वोहरा के एक वीडियो पाठ पर आधारित )

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          भारतीय राजनीति में नामों का महत्व हमेशा से रहा है। नाम बदले जाते हैं—कभी इतिहास को पुनर्परिभाषित करने के लिए, कभी सांस्कृतिक पहचान को बल देने के लिए, कभी राजनीतिक संदेश देने के लिए। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और भी तेज हुई है, विशेषकर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में, जहाँ भवनों, सड़कों, योजनाओं और सरकारी परिसरों के नाम बदलकर उन्हें नए प्रतीकात्मक अर्थ दिए जा रहे हैं।

          प्रधानमंत्री आवास के नए नाम सेवा तीर्थ और राजभवनों को दिए जा रहे नए नाम इसी व्यापक परिघटना का हिस्सा हैं। लेकिन यह केवल नाम बदलने का विषय नहीं है—यह सत्ता, सार्वजनिक संस्थानों की भूमिका, और जनमानस पर प्रभाव डालने की राजनीति के गहरे संकेत देता है।

          संदर्भित वीडियो पाठ में दिनेश के वोहरा कहते हैं — सेवा तीर्थ, हाँ, मोदी जी ने कुछ नाम बदल दिए हैं। ‘राजभवन’ का नाम अब ‘लोकभवन’ हो गया है। मुझे नहीं पता कि  कितनों ने राजभवन देखा है। अगर आप देखेंगे, तो आपकी आँखें चमक उठेंगी। क्योंकि लोक और सेवा जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यहाँ तो बस महाराजाओं की शान-ओ-शौकत है। वैसे, भारत का सबसे बड़ा राज भवन राष्ट्रपति भवन है। जी हाँ, राज्यपाल के लिए इसे राजभवन और राष्ट्रपति के लिए राष्ट्रपति भवन कहा जाता है। वो भी राजभवन ही है। लेकिन सच कहूँ तो ये सब महल ही हैं। राष्ट्रपति भवन का नाम पहले पैलेस हुआ करता था। और इसे महल की तरह बनाया गया था। इसका नाम भी वायसराय पैलेस था। उसके बाद सिर्फ़ राष्ट्रपति भवन रखा गया। अब मोदी जी को नाम बदलने की आदत है। लेकिन महल का नाम या उसकी भव्यता बदलने जैसी कोई बात नहीं होती। ऐसा तो होता ही नहीं। उदाहरण के लिए, मोदी जी ने अपने प्रधानमंत्री आवास का नाम लोक कल्याण मार्ग रखा है। पहले इसे सात रोज एवेन्यू मार्ग कहा जाता था। अब, जब इसमें रहने वाले लोग भारत के लोगों की तरह रहेंगे, तो इसका नाम लोक कल्याण होना चाहिए।

          यही वह देश है, जहाँ राजाओं का जमाना भले चला गया हो, लेकिन महलों की शान, रौब और भव्यता का जमाना कहीं नहीं गया। बस नाम बदलते रहते हैं—राजभवन से लोकभवनपीएम आवास से सेवा तीर्थ, और बाकी कथाएँ तो मोदी युग की नई पुराण-श्रृंखला का हिस्सा हैं। किसी ने ठीक ही कहा है—भारत बदले न बदले किंतु  नाम जरूर बदले हैंबाकी सब अपनी जगह वहीं के वहीं खड़े मुस्कुरा रहे है।

नामकरण: सत्ता का सबसे सुलभ और शक्तिशाली उपकरण:

          नाम बदलना आसान है, कम लागत वाला है, लेकिन प्रतीकात्मक प्रभाव अत्यधिक है।
इतिहास में कई शक्तियां अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए नामों का सहारा लेती रही हैं।
भारत की वर्तमान राजनीति में भी यह पैटर्न स्पष्ट दिखता है।

 

भारतीय राजनीति और भवनों का वैभव:

          सभी सरकारें अपने उच्च अधिकारियों के लिए बड़े, भव्य और सुरक्षित परिसरों का निर्माण करती रही हैं। मोदी युग में यह सिर्फ अधिक दिखाई देता है क्योंकि:

·        सुरक्षा मानक बढ़ गए हैं,

·        मीडिया कवरेज अधिक है,

·        और प्रतीकात्मकता को खुलकर व्यक्त किया जाता है।

 

लोक भवन: राजभवन का लोक” संस्करण:

          किसी भी राज्य का राजभवन देख लीजिए, आपकी आँखें चमक जाएँगी, दिल धड़क उठेगा… और तुरंत समझ आ जाएगा कि यहाँ “लोक” केवल  नाम में ही है। राजभवन हो या राष्ट्रपति भवन—ये सब असल में महल ही तो हैं, बस नाम कहीं रियासत का, कहीं गणतंत्र का। लेकिन मोदी जी को नाम बदलने का शौक है, और उनका यह शौक पुराना है। कहते हैं कि नाम बदलने से इतिहास बदल जाता है। शायद यही सोचकर सब कुछ बदला जा रहा है—पता चले कि नया भारत वही हैपर नाम सब विदेशी हटेसब अपने हुए!

 

प्रधानमंत्री आवास की भव्यता:

          नया परिसर अत्याधुनिक है—उच्च तकनीकी प्रणालियों, उन्नत सुरक्षा, संचार नेटवर्क और विस्तृत कार्यालय संरचनाओं से युक्त। यह 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति के अनुकूल है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि— क्या ऐसे परिसर के लिए सेवा तीर्थ” जैसा आध्यात्मिक शब्द उपयुक्त हैयही इस बहस का मूल बिंदु है।

 

प्रधानमंत्री आवास: घर नहींमहल भी नहीं… अब सेवा तीर्थ”:

          मोदी जी के नए आवास का नाम रखा गया—सेवा तीर्थ। …तीर्थ! वही शब्द जो अब तक भगवानों के लिए आरक्षित था। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ—सब भगवानों के घर।
मक्का-मदीना तीर्थ, तिरुपति तीर्थ, अजमेर दरगाह तीर्थ—सब किसी न किसी ईश्वर, संत, पैगंबर से जुड़े हैं। पर अब इस सूची में एक नया नाम जुड़ गया है—सेवा तीर्थ—जहाँ तीर्थ यात्रियों का प्रवेश निषिद्ध है, और सिर्फ “अजैविक देवता” ही विचरण कर सकते हैं। हाई-टेक देवता—सी सी टी वी वाले, टेलीप्रॉम्प्टर वाले, बुलेटप्रूफ गाड़ियों और 8500 करोड़ के विमानों वाले देवता। यही नया देव–पुराण है। और इस तीर्थस्थल में परम देवता हैं—श्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी… भारत के प्रधानमंत्री।          यह  आदमी सिर्फ़ ऐशो-आराम में लग गया। इसकी भगवान माया है। महंगी गाड़ियां, महंगे हवाई जहाज, डेढ़ लाख का पेन, छह लाख का फ्रेम, हज़ार की ड्रेस और जैकेट, लाखों के जूते, लाखों की बेल्ट, गले में पहनने के लिए कोट जो वो बाहर जाता है, हज़ार की टोपी और हैट जो उसके पास है। जो व्यक्ति माया से इतना जुड़ा हुआ है, जो खुद को इतनी ब्रांड वैल्यू देता है, सुबह से शाम तक, माया, माया, माया, माया। एक तरफ़ कहता है कि ये सेवा तीर्थ होगा, और दूसरी तरफ़ कहता है कि ये बहुत हाई-टेक होगा। कमाल है साहब।

भारतीय तीर्थों के बीच यह नया तीर्थ:

          भारत के असली तीर्थ आज भी खुले हैं। गंगोत्री में स्नान कर सकते हैं, तिरुपति में दर्शन कर सकते हैं, पावापुरी में बैठ सकते हैं। पर सेवा तीर्थ? नहीं साहब! यह तीर्थ सिर्फ नाम का है।
यहाँ न दर्शन होंगे, न श्रद्धालु आएँगे। यह तीर्थ सिर्फ यह दिखाने के लिए है कि किसी को भगवान जैसा दिखना कितना जरूरी है।

          वहाँ तो कोई चिड़िया भी नहीं उड़ सकती। अगर लोग सच में कहते हैं कि लोक कल्याण कोई जगह है, तो वो व्हाइट हाउस है। लोग वहाँ जा सकते हैं। वे इसके सामने खड़े हो सकते हैं, तस्वीरें खींच सकते हैं, सच में, यह बहुत बड़ा हिस्सा है। लोग इसके अंदर भी जा सकते हैं। उन्हें व्हाइट हाउस जाने की इजाज़त है ताकि वे आकर देख सकें कि उनके राष्ट्रपति कैसे रहते हैं, किन इमारतों में रहते हैं। इसलिए, लोगों को इसके एक बहुत बड़े हिस्से में जाने की इजाज़त है।

हिरण्यकश्यप की कहानी और एक आधुनिक सीख:

          कभी-कभी राजाओं को लगता था कि वे भगवान हैं। हिरण्यकश्यप को यही भ्रम था। वह चाहता था कि प्रह्लाद सिर्फ उसे ही पूजे। ठीक इसी प्रकार मोदी जी को भी कभी-कभी लगता है—“मैं जैविक नहीं हूँ, अजैविक हूँ…ऊपर से एक बूँद हूँ।” बस फर्क यह है कि हिरण्यकश्यप ने महल नहीं बदला था, नाम नहीं बदले थे। उन्होंने स्तंभों को तीर्थ नहीं बनाया था। उनमें भी अभिमान था, पर इतना नहीं कि अपने घर का नाम “सेवा तीर्थ” रख दें। यहाँ नाम को ही हथियार बना दिया गया है। कटाक्ष यह है कि तीर्थ वह होता है जहाँ जनता पहुँचती है। पर यह तीर्थ ऐसा है जहाँ जनता की एंट्री बंद। सेवा का कोई नामोनिशान नहीं, केवल सुरक्षा, वैभव और माया का साम्राज्य।

मोदीजी का नामप्रेम कोई नया अध्याय नहीं:

          बात केवल पीएम आवास की ही नहीं है। पिछले दस वर्षों में भाजपा शासित राज्यों में नाम बदलना एक सांस्कृतिक परियोजना बन गया है। कुछ प्रमुख नाम परिवर्तन (भाजपा शासित राज्य)–

·        इलाहाबाद → प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

·        फैजाबाद → अयोध्या

·        मुगलसराय → पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर

·        हैदराबाद की कई ऐतिहासिक बस्तियों को भग्यानगर” कहने का प्रस्ताव

·        गुड़गाँव → गुरुग्राम (हरियाणा)

·        उड़ुपी के कई इलाकों के नाम संस्कृतनिष्ठ करने की कोशिश

·        अहमदाबाद → कर्णावती (विचार, अभी लागू नहीं)

·        बैंगलोर → बेंगलुरु (हालांकि यह कांग्रेस सरकार के समय, पर बाद में नाम–राजनीति का हिस्सा बनाया गया) शहर बदले, स्टेशन बदले, सड़कें बदलीं, अब बारी आलीशान सरकारी ठिकानों की है—ताकि इतिहास भी बदले, वर्तमान भी और यादें भी।

भक्ति की नई परिभाषा:

          मोदी जी कभी केदारनाथ में भगवा चोला पहनकर फोटोग्राफर की सेना बुलाते हैं। कभी कन्याकुमारी में “मौन साधना” करते हुए कैमरों को आमंत्रित करते हैं। यह साधना कम और ब्रांडिंग अधिक लगती है। विवेकानंद का सारा जीवन त्याग का था, यह जीवन ब्रांडेड चश्मों, 20 करोड़ की गाड़ियों, हाई-टेक सुरक्षा और करोड़ों के विमानों में लिपटा हुआ है। पर नाम वही—सेवा तीर्थ

सेवा तीर्थ 1, सेवा तीर्थ 2, सेवा तीर्थ 3…:

          जैसे देवताओं के लोक होते हैं—स्वर्गलोक, इंद्रलोक, वैकुंठ…। वैसे ही यहाँ बन गए हैं सेवा तीर्थ के उप-लोक।

·        सेवा तीर्थ 1—प्रधान देवता का निवास

·        सेवा तीर्थ 2, 3—छोटे देवताओं का आवास

·        सचिव भी देवता, सलाहकार भी देवता, और सुरक्षा अधिकारी भी किसी ‘नारद’ से कम नहीं।

सभी के पास हाई-टेक अस्त्र—लैपटॉप, कैमरे, इंटरकॉम, और वातानुकूलित वैकुंठ।

तीर्थस्थल जो तीर्थ नहीं :

          हर तीर्थस्थल खुले होते हैं—यहाँ जनता आती है, भगवान से मिलती है, मनोकामना मांगती है। किंतु यह नया तीर्थ? यह तीर्थ जनता के लिए नहीं है। यह तीर्थ दिखावे के लिए है।
यह तीर्थ नाम के लिए है। यह तीर्थ मूलतः एक संदेश है—मेरे घर का नाम तीर्थ हैक्योंकि मैं साधारण मानव नहीं हूँ।

 सत्ता और देवत्व: एक ऐतिहासिक रूपक:

          भारतीय मिथकों में हिरण्यकश्यप का उदाहरण अक्सर दिया जाता है—एक राजा जो खुद को ईश्वर मानने लगा। यह कथा सत्ता, अहंकार और व्यक्ति पूजा के खतरों का प्रतीक रही है।

समकालीन राजनीति में इस कहानी का उल्लेख इसलिए होता है क्योंकि आधुनिक नेता भी अक्सर प्रतीकों, लोक–आस्था और शक्ति के मेल से एक विशेष प्रकार का ऊँचा स्थान ग्रहण कर लेते हैं। यह देवत्व नहीं होता, लेकिन देवत्व की भाषा और संकेत राजनीति में इस्तेमाल होने लगते हैं।

नामों में अर्थ-व्यवस्था:

·        राजभवन का नाम लोकभवन हो जाए तो संदेश यह है कि सत्ता जनता की है।

·        प्रधानमंत्री आवास सेवा तीर्थ कहलाने लगे तो संकेत यह मिलता है कि शासन सेवा का केंद्र है। लेकिन नाम और वास्तविकता के बीच जो दूरी है, वही इस विमर्श को रोचक बनाती

 

राज्यपालों की कार्यप्रणाली व दायित्व : वर्तमान विमर्श का विश्लेषण:

          भारत में राज्यपाल की भूमिका संविधान के संघीय ढांचे में एक आवश्यक संतुलनकर्ता की होती है। समय–समय पर कुछ राज्यों में राज्यपालों के निर्णयों को लेकर राजनीतिक रस्साकशी बढ़ी है, जिसने इस पद की गरिमा, कार्यक्षमता तथा दायित्वों पर बहस को तेज किया है। मौजूदा परिस्थितियों में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि कई राज्य सरकारें अब राज्यपाल की उपस्थिति, हस्तक्षेप, अनुशंसा और अधिकार क्षेत्र पर प्रश्न उठा रही हैं। अब बात करते हैं राज्यों के राज्यपालों के निवास का नाम बदलने की—

राजभवन के नाम परिवर्तन की पहल : राजनीतिक प्रतीकवाद और संवैधानिक अर्थ:

          हाल के समय में कुछ राज्यों ने राजभवन का नाम बदलकर राज्यपाल भवन करने की घोषणा की है। यह कदम कई स्तरों पर विचारणीय है—

  • यह नाम परिवर्तन इस विचार पर आधारित बताया गया है कि राजभवन शब्द राजशाही या राजसत्ता की याद दिलाता है, जबकि राज्यपाल भवन अधिक लोकतांत्रिक और आधुनिक प्रशासनिक ध्वनि उत्पन्न करता है।
  • कुछ सरकारों का मानना है कि यह परिवर्तन राज्यपाल पद की “परंपरागत प्रभुसत्ता” की छवि को सीमित कर लोकतांत्रिक जवाबदेही और पारदर्शिता को रेखांकित करेगा।
  • इसके आलोचकों का तर्क है कि यह मुद्दा मूलतः प्रतीकात्मक राजनीति है, क्योंकि नाम बदलने से न तो संवैधानिक भूमिका बदलती है और न ही प्रशासनिक अधिकार—फिर भी इसका राजनीतिक संदेश अवश्य जाता है कि राज्यों में राज्यपाल की निरपेक्षता और हस्तक्षेप पर प्रश्न उठ रहे हैं।

इस प्रकार, राजभवन के नाम बदलने की पहल राज्यपाल–सरकार संबंधों में बढ़ते तनाव का एक मृदु संकेत भी मानी जा सकती है, जहाँ राज्य सरकारें कुछ प्रकरणों में अत्यधिक सक्रियता का विरोध व्यक्त कर रही हैं।

 

सत्ता और प्रतीक: मोदी युग की शैली:

          प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकों के माध्यम से संप्रेषित होता है। वे जिस प्रकार की भाषा, दृश्य, पोशाक, यात्रा और मंचन का उपयोग करते हैं, वह एक सुनियोजित छवि निर्माण का हिस्सा है।  दृश्य राजनीति और सार्वजनिक छवि–

·        केदारनाथ में ध्यान, भगवा वस्त्र

·        समुद्र तटों पर ध्यान मुद्रा

·        हाई-टेक मंच, ड्रोन कैमरे, लाइव प्रसारण

·        अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में विशिष्ट परिधान

          यह सब मिलकर एक विशेष राजनीतिक सौंदर्यशास्त्र बनाते हैं—जहाँ नेता एक साथ आध्यात्मिक, आधुनिक, शक्तिशाली और सर्वज्ञ दिखाई देता है। नामकरण इस छवि का विस्तार-सेवा तीर्थ, लोकभवन, लोक कल्याण मार्ग—ये नाम उसी छवि का विस्तार हैं। यह सामान्य सरकारी परिसर नहीं; यह “संकल्प”, “भावना” और “आदर्शवाद” से जुड़ी हुई जगहें बनकर प्रस्तुत किए जाते हैं।

निष्कर्ष: नाम बदलिएकहानी नहीं:

·        सेवा तीर्थ नाम रख देने से कोई स्थान तीर्थ नहीं बन जाता

·        लोकभवन कह देने से राजभवन की चमक कम नहीं होती

·        लोक कल्याण मार्ग लिख देने से महल का वैभव नहीं मिटता।

          किंतु ये नाम निश्चित रूप से एक कहानी गढ़ते हैं— एक ऐसा भारत जहां सत्ता स्वयं को ईश्वरत्व के करीब ले जाना चाहती है। और भविष्य के इतिहासकार कहेंगे— यह वह समय था जब एक महत्वाकांक्षी नेता खुद को भगवान की जगह पर स्थापित करना चाहता थापर उसकी भक्ति सिर्फ काँचकैमरेमोटरकेड और महलों की थी। और इंसान का भगवान बनने का सपना। अंततः व्यंग्य का विषय ही हो जाता है—चाहे वह हिरण्यकश्यप हो या कोई आधुनिक संस्करण।

          लोकभवन हो, लोक कल्याण मार्ग हो या सेवा तीर्थ—नाम बदले जा सकते हैं, लेकिन संस्थाओं की वास्तविक भूमिका अपने व्यवहार, पारदर्शिता और जनसंपर्क से तय होती है। यदि कोई स्थान वास्तव में “सेवा” का केंद्र बने, यदि वह जनता के लिए सुलभ हो, यदि निर्णय वास्तव में जनकल्याण के हों—

·        तो वह बिना नाम बदले भी तीर्थ जैसा बन सकता है

·        परंतु केवल नाम बदलने से न तो स्थान तीर्थ बनता है

·        न शासन व्यवस्था लोक कल्याणकारी साबित होती है

·        और न नेता देवता।

          नाम बदलना एक संदेश जरूर देता है— किंतु  इतिहास यह तय करता है कि उस संदेश का सार्थकता में कितना योगदान था।

(दिनेश के. वोहराhttps://youtu.be/2mhOpX_HdY4?si=AORc7U5JX2zF-r3v)

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें