
कनक तिवारी
अभिव्यक्ति मनुष्य की स्वाभाविक और जन्मगत आदत है। जब भाषा नहीं जानता, तब केवल ध्वनि में शिशु बनकर अभिव्यक्त होता है। जो बोल नहीं पाते, वे लिखकर या इशारों में अपनी बात ज़रूर कहना चाहते हैं। अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा और दैनिक आवृत्ति का संरक्षक और प्रोत्साहनकर्ता अखबार होता है। उसमें साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाएं भी शामिल हैं।
कई लोगों को गुमान है कि छत्तीसगढ़ वैचारिक नजरिए से बहुत समृद्ध इलाका है और यह कि यहां कई नामचीन अशेष हस्ताक्षर अब भी मौजूद हैं। गुमान मुगालता भी बनता है। छत्तीसगढ़ अपनी गंभीर दृष्टि के लिए पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय, लोचन प्रसाद पांडेय, माधवराव सप्रे, हबीब तनवीर, डाॅ. शंकर शेष, श्रीकांत वर्मा, हरि ठाकुर, सुंदरलाल त्रिपाठी, लाला जगदलपुरी, हरिहर वैष्णव, शानी, डाॅ. राजेश्वर सक्सेना, विनोद कुमार शुक्ल, शंकर गुहा नियोगी, डाॅ. रमेशचंद्र महरोत्रा, प्रभात त्रिपाठी, डाॅ. इंद्रदेव, मायाराम सुरजन, शरद कोठारी, रुचिर गर्ग, आलोक पुतुल मधुकर खेर, बसंत तिवारी, रम्मू श्रीवास्तव, गुरुदेव चौबे, रमेष याज्ञिक, रमेश नैय्यर जैसे कई नामों में अभिव्यक्त होता रहता है।
छत्तीसगढ़ की अपनी भौगोलिक बनावट, सांस्कृतिक समझ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। उसके मुख्य शहर रायपुर से प्रकाशित शुरुआती अखबारों ‘नवभारत‘, ‘युगधर्म‘, ‘नई दुनिया‘, ‘महाकोशल‘ सहित अन्य अखबारों की भी अपनी बाद में अकादेमिक हैसियत बनती रही है। इस सिलसिले में ‘देशबंधु‘, ‘लोकस्वर‘ ‘सबेरा संकेत‘ और ‘बस्तर बंधु‘ जैसे कई नाम उभरते हैं। कभी ‘दैनिक देशबंधु‘ में संपादकीय विभाग में रहे सुनील कुमार में अपनी पहचान, बेहद परिश्रमी आदतों, नया खोजने की जुगत और उपलब्ध जानकारियों का बार बार पुनरावलोकन करना शामिल रहा है। ‘देशबंधु‘ से अलग होकर सुनील ने ‘दैनिक छत्तीसगढ़‘ जैसे प्रतिनिधि नाम से अखबार निकाला। चलते चलते कभी इसी अखबार में एक साप्ताहिक पत्रिका निकालनी शुरू की जिसका नाम रहा है ‘इतवारी अखबार।‘ करीब 100 पृष्ठों की यह नई प्रयोगशील पत्रिका धीरे धीरे सुधी और गंभीर पाठकों के बीच अपने कलेवर के केवल दस रुपए की कीमत के कारण जगह बनाती गई।
मैं उन दिनों छत्तीसगढ़ के हाई कोर्ट बिलासपुर में व्यस्त वकील रहा था। तब भी सुनील के आग्रह और पत्रिका के कांसेप्ट के आकर्षण के कारण मैंने अधिकतर गंभीर विषयों पर लंबे लंबे लेख लिखे। ‘छत्तीसगढ़ अखबार‘ में लगातार लिखने के अतिरिक्त ये लंबे लेख किसी अन्य अखबार में नहीं छप सकते थे। जगह कैसे मिलती? अन्य इलाकों की पत्रिकाएं बार बार एक ही इलाके के लेखक को क्यों और कितना छापतीं। सुनील ने ‘इतवारी अखबार‘ में मेरे न जाने कितने लंबे लेख छापे हैं, जिन्हें वैचारिक लेख भी कहा जा सकता है। ये छोटे नहीं हैं। इनमें कोई बात मुकम्मिल तरीके से कहने की कोशिश की गई है। गांधी की किताब ‘हिन्द स्वराज का सच‘ पर मेरी टिप्पणी ‘इतवारी अखबार‘ ने पूरे का पूरा अंक सौ पेज का देकर मुझे छापी। ‘कैसे बना संविधान‘, ‘कांग्रेसः कल आज और कल,‘ ‘हिन्द स्वराज आज‘, ‘बेइंसाफ मशीनरी में इंसाफ की हकीकत‘, ‘संविधान का सच‘, ‘क्यों होता है धन काला?‘ जैसे कई लेख हैं। उनके लिए ‘इतवारी अखबार‘ ने बाहें फैलाकर स्वागत किया।
यकायक ‘इतवारी अखबार‘ बंद हो गया। एक शून्य आ गया इस लिहाज से कि छत्तीसगढ़ में क्या कोई चिंतन हो रहा है। जिसका राष्ट्रीय स्तर पर संज्ञान लिया जा सकता रहा है। मेरा लिखना भी बंद हो गया।
मैंने कई बार सुनील कुमार से कहा कि ‘इतवारी अखबार‘ का प्रकाशन शुरू करना स्वागत योग्य परिघटना रही है। उसका प्रकाशन स्थगित हो जाना दुर्घटना। संपादक, प्रकाशक के सामने आर्थिक और अन्य कई कारण रहे होंगे। अविभाजित मध्यप्रदेश में सरकारी पत्रिका ‘मध्यप्रदेश संदेश‘ का प्रकाशन होता था। उसमें सरकारी खबरों के साथ साथ कई नामचीन लेखकों की रचनाओं को जगह मिलती थी। दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने। तो किसी नौकरशाह ने उनके कान भरे। मुख्यमंत्री ने पत्रिका का प्रकाशन बंद कर दिया। 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में छत्तीसगढ़ के गुमनाम कस्बे पेंडरा रोड से यशस्वी लेखक पत्रकार माधवराव सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ नाम की पत्रिका का प्रकाशन किया। वह हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक पूर्वज परिघटना है। मैंने कोशिश की लेकिन मुख्यमंत्री अजीत जोगी इतने सुंदर नाम वाली पत्रिका को सरकारी प्रकाशन नहीं बना पाए। फिर सप्रे जी के पौत्र अशोक सप्रे ने उसके सभी अधिकार एक निजी प्रकाशक को सौंप दिए जो इस नाम से प्रकाशन से संबद्ध है।
फिलवक्त देश और दुनिया कई बड़े सवालों से बेतरह उलझे हुए हैं। दैनिक अखबार तो गोदी मीडिया में बदल गए हैं सिवाय ‘टेलीग्राफ‘, ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ और ‘हिन्दू‘ वगैरह को छोड़कर। ये अंगरेजी के अखबार हैं। हिन्दी में तो दुर्गति है। नई पीढ़ी को बहुत सा ज्ञान चाहिए। इंटरनेट के माध्यम के अलावा भी लेखी में जिसके लिए ‘इकाॅनाॅमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली‘, ‘आउट लुक‘, ‘इंडिया टुडे‘ और इन सबसे बढ़कर ‘फ्रंट लाइन‘ जरूरतों को पूरा कर रही है। इसमें कहां हैं हिन्दी की पत्रिकाएं? जो कभी ‘दिनमान‘ या ‘धर्मयुग‘ कहलाती थीं। कभी ‘जनयुग‘ भी लोकप्रिय हो रहा था। ‘पांचजन्य आॅर्गनाइजर‘ से विकसित और उन्नत होती इच्छाएं संतुष्ट नहीं हो पाती हैं।
ऐसे संकुल समय में फिर से छत्तीसगढ़ से अब तक प्रकाशित इकलौती महत्वपूर्ण वैचारिक पत्रिका ‘इतवारी अखबार‘ का प्रकाशन भी हो सके। तो एक बड़ी बौद्धिक ज़रूरत पूरी हो सकती है। आगे अल्लाह जाने। या सुनील कुमार जानें।
‘इतवारी अखबार‘ में प्रकाशित मेरे लेख
- संविधान का सच-21 नवम्बर 2010
- अतिमानव का विद्रोह लोहिया-11 अक्टूबर 2009
- बेइंसाफ मशीनरी में इंसाफ की हकीकत-2 फरवरी 2014
- हिन्द स्वराज आज-3 मार्च 2013
- यादों के झुरमुट में मुक्तिबोध-7 सितम्बर 2014
- कांग्रेस कल और आज-5 जनवरी 2014
- नक्सल विकास पर श्वेत पत्र क्यों नही-29 अगस्त 2010
- कैसे बना संविधान-11 मई 2014
- कालजयी हिन्द स्वराज-1 नवम्बर 2009
- हिन्द स्वराज का सच -3 अक्टूबर 2010
- विवेकानन्द की जनपक्षधरता-6 जनवरी 2013
- न्यायपालिका का सच-4 अक्टूबर 2009
- फिर से हिन्द स्वराज-28 सितम्बर 2008
- कांग्रेसः अमरबेलों से जकड़ा वटवृ़क्ष- 18 जनवरी 2009
- नक्सलवाद पर दस लेख-23 मई 2010
- जसवंत सिंह की किताबः-30 अगस्त 2009
भारत विभाजन के आइने में - विवेकानन्द का जनधर्म-25 सितम्बर 2011
- मेरे लिए भगतसिंह-9 अक्टूबर 2011
- जनलोकपाल कथा-11 सितम्बर 2011
- संविधान का सच 9 लेख-11 नवम्बर 2010
- छत्तीसगढ़ में छपे मेरे लेख-27 जुलाई 2014
- संसदीय देह में कारपोरेटी जिन्न-13 अप्रेल 2014
- नौकरशाही की संवैधानिक सीमा-24 नवम्बर 2013
- नटवर सिंह के कटाक्ष का तड़का-17 अगस्त 2014
- अभिनय का सूरजः दिलीप कुमार-20 जुलाई 2014
- कश्मीरः अनुच्छेद 370-1 जून 2014
- राजनीति में वंशवाद-8 जून 2014
- आडवाणी की आत्मकथा-11 मई 2008
- राज्यपालों की असामयिक बर्खास्तगी-29 जून 2014
नोटः कुछ और भी होंगे।




