अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

वैदिक एस्ट्रोलॉजी में स्त्री-पुरुष की सत्ता

Share

पवन कुमार

 जो शक्ति वेद मंत्रों में अर्थ बन कर छिपी रहती है, जो शक्ति छन्द बन करके प्रकट होती है, जो शक्ति मूलतः शब्द है और विकृत हो कर पद रूप से विस्तार को प्राप्त करती है, वही शक्ति ज्योति बन कर जल रही है। अग्नि की दाहकता में जो शक्ति है, वहीं वाक् में है। इस शक्ति से सम्पन्न व्यक्ति शाप और वरदान देता है। 
   राशियां १२ हैं। इन में से ६ स्त्री संज्ञक और ६ पुरुष संज्ञक हैं। १, ३, ५, ७, ९, ११ राशियाँ पुरुष तथा २, ४, ६, ८, १०, १२ राशियाँ स्त्री है। इससे स्पष्ट है- स्त्री धन है। स्त्री सुख है। स्त्री शत्रु है। स्त्री मृत्यु है। स्त्री प्रतिष्ठा है। स्त्री व्यय है। स्त्री धनदा लक्ष्मी है। यह सुखदा तथा यशदा श्री है।
 [भाव/राशि २, ४, १०]

पुनः
यहाँ स्त्री शत्रु मृत्यु एवं नाश रूपा भी है [भाव / राशि ६,८,१२].

स्त्री पा कर पुरुष शत्रु, अपमान एवं हानि को प्राप्त होता है। स्त्री ब्रह्म की उपासना करने से व्यक्ति ६, ८, १२ भावों की पीड़ा से ऊपर उठता है, आनन्द पाता है।
स्त्री तत्व से अपरिचित व्यक्ति मूर्ख है। स्त्री तत्व और पुरुष में भेद करने वाला मूर्ख है। पुरुष को स्त्री से बढ़ कर समझने वाला महामूर्ख है। कौन ज्ञानी है ? जो यह समझता है कि स्त्री पुरुष, वह ज्ञानी है। जो यह देखता है कि स्त्री में पुरुष है, पुरुष में स्त्री है, वह ज्ञानी है। इन दोनों में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है- एक के होने पर दूसरा है।
केवल हाड़ मांस के देह को स्त्री वा पुरुष समझना त्रुटि है। यह चराचर विश्व स्त्री पुरुषमय है। इस का ज्ञाता अपि है। ऐसे अपि को मेरा प्रणाम । जो संख्या दो समान भागों में विभक्त नहीं होती, वह पुरुष है।
【स्त्री संख्या = २, ४, ६, ८, १०, १२ : पुरुष संख्या = १, ३, ५, ७, ९, ११】

जातक की कुण्डली में दोनों प्रकार की संख्याएँ हैं। अतः हर जातक स्त्री-पुरुष का संयुक्त रूप होने से पूर्ण विश्व है। हर जातक अर्धनारीश्वर है। स्त्री-पुरुष परस्पर विरुद्ध तत्व हैं और दोनों एक साथ रहते हैं। यह अद्भुत योग है। यह योग अनिर्वाच्य है। २, ४, ६, ८, १०, १२ संख्याएँ शुभ वा सौम्य हैं। ३, ५, ७, ९, ११ संख्याएँ अशुभ वा क्रूर है।
अतः स्त्री= शुभ, सौम्य । पुरुष =अशुभ, क्रूर। स्त्री = स्निग्ध, तरल । पुरुष =रुक्ष, ठोस।
स्त्री = भद्र सुन्दर, गतिशील । पुरुष = अभद्र असुन्दर, स्थाणु।
स्त्री= शीतल, रम्य । पुरुष = उष्ण, खर। स्त्री =तनु, दुर्बल। पुरुष = पृथुल, सबल।

पुरुष मूर्ति है। पुरुष बल है। पुरुष ज्ञान है। पुरुष संघर्ष है। पुरुष धर्म है। पुरुष लाभ है। सब में लाभ, बल, युयुत्सा का भाव होता है।
【संख्या/ भाव राशि ११, ३, ७】
सब में ज्ञान, धर्म आत्मा का भाव देखा जाता है।
【संख्या / भाव राशि ५, ९, १】
पुरुष अशुभ है। स्त्री शुभ है। पुरुष के अशुभत्य में शुभ और अशुभ होता है स्त्री के शुभत्व में शुभ और अशुभ पाया जाता है।
【अशुभ १, ३, ५, ७, ९, ११ में ११, ३, ७ अशुभ तथा ५, ९,९ शुभ हैं : शुभ २, ४, ६, ८, १०, १२ मे २, ४, १० शुभ तथा ६, ८, १२ अशुभ हैं।】
इस प्रकार, स्त्री में शुभ+ अशुभ है तथा पुरुष में भी अशुभ+ शुभ है। अतएव, स्त्री= पुरुष तथा स्त्री में पुरुष, पुरुष में स्त्री है। तत्वतः दोनों समान हैं। इन दोनों में भेदभाव रखना अनुचित है। यह तर्कतः सत्य है। इस सत्य को मैं देखता हूँ। वो में तीन व्यञ्जन, स्,त्,र्। पुरुष में तीन व्यञ्जन, प्,र् ष्,।अतएव,स्त्री=पुरुष।
【स्त्री=स् त् र् ई।पुरुष=प् उ र् उ ष् अ।】

स्त्री ईकारान्त दीर्घ होने से बड़ी है। पुरुष अकारान्त ह्रस्व होने से छोटा है। यही कारण है कि स्वी अपने उदर में पुरुष के शुक्र] को धारण करती है, पुरुष अपने उदर में स्त्री [ के रज] को धारण नहीं करता। छोटा सदा बड़े के भीतर ही रहता है, अतः पुरुष के लिये स्त्री पूज्य है। यह सिद्ध हुआ।
अतः प्रकृति बड़ी हुई पुरुष से दोनों की राशि नक्षत्र चरण एक ही है, क्योंकि दोनों का नाम प्रकार से है।अतः दोनों में स्वाभाविक मेल है। दोनों सदैव साथ-साथ रहते हैं।
इस वर्णन से स्पष्ट है-पुरुष को अपेक्षा प्रकृति (स्त्री) महत्वपूर्ण है। यह विश्व सृष्टि की मूल है। इसलिये इसे मूल प्रकृति नाम दिया गया है। ‘ओ’ नमो मूलप्रकृतये अजितायमहात्मने। -गजेन्द्र मोक्ष, वामन पुराणे।
जिसे प्राप्त कर व्यक्ति धन्य हो जाता है, वह उसके लिये धन है। स्त्री प्राप्त कर पुरुष धन्य हो जाता है। इस लिये स्त्री धन है। स्त्री से पुरुष धनी माना जाता है। वो लक्ष्मी है। स्त्री श्री है। वेद में स्वी सूक्त हैं। धन को ही राधा कहा गया है।
अमन्महीदनाशवोऽनुप्रासश्च वृत्रहन्।
सकृत्सु ते महता शूर राधसानु स्तोमं मुदीमहि॥
~अथर्ववेद (२० | ११६ |२)
अन्वय : वृत्रहन् ! अनाशवः अनुप्रासः इत् (वयं) अमन्महि । च शूर! ते स्तोमम् अनु महता राधसा सकृत् सुमदीमहि।
वृत्रहन् = हे अन्धकार हन्ता सूर्य !
अनाशकः = अन् + आशु + जस्। [आशु = अश् (अश्नुते व्यापने) + उण् ।]= शीघ्रता विहीन, स्थैर्ययुक्त, धैर्यशील, शीघ्रबोध के चक्कर में न पड़ने वाले, स्थिरमिति स्थित प्रज्ञ।
अनुप्रासः = अनु + ग्रस् (भ्वा. आ. ग्रसते) +घञ् = महाकाल के लघुपास (कौर), मरणधर्मा, सीमित जीवन वाले।
इत् = इण् (गतौ एति) + क्विप् । = गतिशील, न रुकने वाले प्रयत्न में शिथिल न होने वाले, उद्योगी, उत्साही।
अमन्महि= मनु (अवबोधने तनादि मनुते) + लुङ प्रथम पुरुष बहुवचन । = मनन करते रहे हैं, जानते चले आये हैं।
शूर !=हे शक्तिमान् सूर्य !
ते =तेरी, आप की।
स्तोमम् = स्तु प्रशंसायाम् + मन् + अम्। प्रशंसा, स्तुति, प्रार्थना।
अनु =पश्चात्, अननार।
महता = महत् + टा उच्चता से मह (पूजायाम्) + अति।
राधसा = राधस् + टा सम्पन्नता से ऐश्वर्य से धन से।
राध्= धनम् (विघण्टु २ । १० ।)
रा (राति) + था (दधाति + असुन = स्वधृत वस्तुको देने वाला, उष्मा और प्रकाश देने वाला सूर्य, ज्ञान, धन धन ही धन को देता है। ज्ञान ही ज्ञान को देता है।
राध् (स्वा. पर राध्नोति प्रसन्न करना सम्पन्न करना दिया. पर राध्यति नष्ट करना पूर्ण करना समृद्ध होना) +असुन =राधस्-समृद्धि, सफलता पूर्णता, तमोनाशक, विद्युत् दीपक, ज्योति।
राध् + अच् = राध = प्रकाश, ज्ञान किरण, सुख, धन।
राध + टाप्= राधा तिमिर सूर्य रश्मि, मार्गदर्शक ज्ञान, सुखप्रद विद्या देखने की शक्ति दृष्टि को देवी देवता।
राधस् (पुंलिंग) तथा राधा (स्त्रीलिंग) समानार्थक शब्द हैं।
सकृत् = एक बार तो सर्वप्रथम पहिली बार। अव्यय शब्द।
सु-मदीमहि = सु उपसर्ग + मुद (हर्षे भ्वा. आ. मोदते) + विधिलिङ् उत्तम पुरुष बहुवचन। = सुमोदेमहि – उत्तम / प्रचुर आनन्द पावें।
मन्त्रार्थ :
तमान्तक सूर्य देव। हम स्थित प्रज्ञ हैं, अटलचित्त हैं, एक निष्ठ हैं। हम सीमित जीवन वाले मरणधर्मा हैं। हम प्रयत्नशैथिल्यहीन हैं, उत्साहसम्पन्न हैं, अपगामी हैं। हम तुझे जान गये हैं। तथा, हे शक्तिमान् सूर्य। तू अपनी स्तुति (स्वीकारने) के पश्चात् एक बार तो प्रचुर धन (आनन्द) से तुष्ट कर दे, भर दे।
इस मन्त्र में सूर्य से राधा की प्राप्ति के लिये प्रार्थना की गई है। महत् राधस्= महती राधा। राधा नाम किरण वा ज्ञान है। ज्ञान विहीन पशु होता है। राधा का अर्थ है-विद्या 【विद् + क्यप् + टाप्】= ज्ञान। जिस से मन का मैल नष्ट हो, बुद्धि पर पड़े हुए तमावरण का नाश हो, वही राधा तत्व नित्य प्राप्य है। सूर्य रश्मियाँ राधा है, अन्धकार का निवारण करने से वैदिक अचाएँ राधा हैं, इन से अज्ञान का निवारण होता है। सम्मुख जल रही दीपक की लौ राधा है, इस से सर्वधन मिलता है, इसी से यह सब लिखा जा रहा है।
राधस् शब्द का प्रथमा एक वचन में रूप राधाः है। विसर्ग का विसर्ग (नाश/लोप) होने पर, राधाः = राधा। लोक में राधा की मान्यता कृष्ण की प्रियतमा के रूप में है। पुराणों में ही ऐसा कहा गया है। कृष्ण नाम सूर्य का, मृत्यु का प्रकाश सूर्य में है, अंतः उस का स्वरूप वा आत्मा है। सूर्य अपने प्रकाश से अभिन्न है। सूर्य (कृष्ण) अपने प्रकाश (राधा) से अपृथक है। दोनों एक हैं। मूर्खो की दृष्टि से राधा और कृष्ण दो हैं। राधा = कृष्ण = एक, यही ज्ञान है।
जो राधा है, वही कृष्ण है। जो कृष्ण है, वही राधा है। दोनों का अभेद ज्ञान है। यह ज्ञान मृत्यु का मृत्यु है, अभयपद है।【 कुण्डली में, भाव २ = धन = राधा ।】
【 भाव ८ = मृत्यु = कृष्ण । 】
ये दोनों परस्पर दृष्टि संबंध रखते हैं। दोनों मारक हैं। इसलिये ये दोनों एक हैं, अभिन्न हैं। संख्या ८ का संबंध राधा वा एवं कृष्ण से है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को कृष्ण का आविर्भाव हुआ।
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को राधा का अवतरण कृष्ण पक्ष की अष्टमी और शुक्ल पक्ष की अष्टमी के चन्द्रमा में प्रकाश की मात्रा समान होती है। दोनों अष्टमियों में चन्द्रमा आधा ही दिखता है। अतः प्रकाश के परिमाण से, कृष्ण = राधा यह ज्ञान शब्दों द्वारा बताया नहीं जा सकता। ज्ञानी समझेगा, मूर्ख क्या समझेगा।

     कृष्ण :

१. कृष विलेखने तुदा. पर. कृषति,
२. कृष् कर्षणे भवा. पर. कर्षति + नक्= कृष्ण,【 न=ण 】
३. कृष् अदर्शने क्रूया. पर कृष्णाति।
कृष्ण के तीन अर्थ हैं :
१. भूमि / योनि को जोतने वाला हल, लिंग।
२. सब को अपनी ओर अनायास खींचने वाला।
३. सतत अदृश्य/ दिखायी न पड़ने वाला।

राधा :
१. राध् वृद्धौ दिवा पर राध्यति,
२. राध् संसिद्धौ स्वा. पर. राध्नोति + अच् + टाप्=राधा।
३. राधे नाशे भ्वा. आ. राधते।

राधा के तीन अर्थ :
१. अपने को प्रकट करने वाली वृद्धशक्ति।
२. सफलता समृद्धि धनदात्री शक्ति।
३. विश्वविनाशक संहर्त्री शक्ति।
एक ही शक्ति है। जब यह अदृश्य रह कर क्रिया करती है तो कृष्ण नाम से जानी जाती है। यह पुरुष तत्व है। वहीं शक्ति जब प्रकट होकर कार्य करती है तो राधा कहलाती है। यह प्रकृति तत्व है। जैसे अत्यधिक शक्ति वाले विद्युदाविष्ट तार के निकट जाने पर प्राणी खिच कर उससे चिपक जाता, मृत्यु को पाता है। यह शक्ति इस रूप में अदृश्य हो कर खींचती है।
यही कृष्ण है। जब इसी तार से विद्युद्वल्व जोड़ दिया जाता है तो वही शक्ति प्रकाश बन कर प्रकट होती है और हम उस से अपना कार्य सिद्ध करते है। यह दृश्य एवं वृद्ध शक्ति ही राधा है। यह अन्धकार को मारती / भगाती है। ज्ञानी इस भेदाभेद से परिचित होता है।

प्रकाश उज्ज्वल होता है। अतः राधा को गौर वर्ण कहा गया है। यह प्रकाश जब तक प्रकट नहीं होता, लुप्त/ अदृश्य रहता है, अनुज्ज्वल होता है। यही कृष्ण श्याम वर्ण माना जाता है। मैं इस व्यक्ताव्यक्त तत्व राधाकृष्ण की उपासना करता हूँ। यह मुझ में, सब में सतत विद्यमान है। यह दो नहीं एक है।
इस तत्व को नमस्कार करने से अहंकार गल जाता है, व्यक्ति तद्रूप हो जाता है।
सधन सगुन सधरम संगन, सबल सुसाई महीप।
तुलसी जे अभिमान बिनु ते विभुवन के दीप।।
~दोहावली : तुलसीदास

जो धनवान् है, गुणवान् है, धर्मवान् है, मृत्यवान् है, बलवान् है, सुयोग्य स्वामी है तथा शासक है. किन्तु अभिमान रहित है, ऐसा व्यक्ति तीनों लोकों का दीप सब को प्रकाश देने वाला, साक्षात् सूर्य है। निरभिमानता ज्ञानी का प्रमुख लक्षण है। ज्ञानी स्वाभिमानी होता है, हीन नहीं। (चेतना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें