*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
बुलंदी पर चमकते हुए कंगूरे को तो हर कोई देख लेता है, पर जिस बुनियाद पर वह खड़ा है बहुत कम लोग उससे वाकिफ होते हैं। परंतु जो उससे वाकिफ होते हैं, वह हमेशा उनको याद रखते हैं, नमन करते हैं। ऐसे ही थे प्रेम भसीन, हिंदुस्तान पाकिस्तान के बंटवारे से पहले पंजाब के मशहूर वकीलों का खानदान जो आजादी की जंग में भी लड़ रहा था, 27 दिसंबर 1917 को प्रेम भसीन का जन्म रावलपिंडी के नामवर वकील गोकुलचंद भसीन के घर हुआ था। जो कांग्रेस कार्यकर्ताओं की लड़ाई की रणनीति, तैयारी करने का भी केंद्र था। वह दौर था जब साइमन कमीशन, लाला लाजपत राय की लाठी चार्ज से मृत्यु, भगत सिंह, बी के दत्त द्वारा सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने का प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस चल रहा था। प्रेमजी ने 12 वर्ष की आयु में लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में भी शिरकत की थी। अभी उम्र 12 साल 5 महीने की थी, जब इनके बड़े भाई योगराज भसीन तथा तिलक राज चड्ढा तथा अन्य कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हो रही थी, उस पर हुए पुलिस लाठीचार्ज में प्रेम जी भी घायल हो गए।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के बाद ये उसके युवा संगठन में सक्रिय हो गए। उसी के साथ पार्टी की गतिविधियों की रिपोर्ट बनाने की जिम्मेदारी इनको दी गई। एम ए पॉलिटिकल साइंस की डिग्री हासिल करने के साथ ही, दूसरा विश्व शुरू हो चुका था। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने युद्ध विरोधी फैसला कर विरोध शुरू कर दिया। सोशलिस्टों ने ‘बोल्शेविक’ के नाम से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रचार सामग्री का प्रकाशन शुरू कर दिया। इसकी जिम्मेदारी प्रेम भसीन को दी गई। गिरफ्तारी की आशंका के कारण प्रेमजी को प्रचार केंद्र के संचालन के लिए पार्टी ने दिल्ली भेज दिया। वहां चांदनी चौक कोतवाली के साथ की एक बिल्डिंग में गुप्त केंद्र बनाया गया। साहित्य प्रकाशित होने के बाद, बंडल बनाकर, पंजाब तथा नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में भेजा जाने लगा। प्रेमजी की इसमें लिखने की,
उसके बाद छापने तथा सफर कर दूसरी जगहो पर पहुंचाने की भी जिम्मेदारी थी। इसी क्रम में 28 जून 1941 को ये लाहौर में गिरफ्तार हो गए। बोल्शेविक के बारे में जानकारी के लिए पुलिस ने उनके साथ बेहद सख्ती का बर्ताव करते हुए जानकारी चाही, परंतु कुछ हासिल ना हो सका। इसके बाद इनको मौंटगुमरी केंद्रीय जेल भेज दिया गया। उस जेल में इसलिए भेजा जाता था ताकि उसके बाद देवली के नजर बंदी कैंप भेजना होता था। किसी तरह वहां इन्हें नहीं भेजा गया। जेल में प्रेम जी ने देवली नजर बंदी कैंप, जहां जयप्रकाश नारायण तथा अन्य बंदियो ने भूख हड़ताल कर रखी थी उनकी सहानुभूति में भूख हड़ताल कर दी। कुछ दिनो के बाद इनको गुजरात जेल भेज दिया गया। जेल में उनके साथ पंजाब के नामवर सोशलिस्ट नेता मुंशी अहमद दीन, तिलक राज चड्ढा भी बंद थे। वहां पर इन्होंने एक हस्तलिखित पर्चा ‘पैगाम’ के नाम से शुरू किया। फरवरी 1946 में उनकी रिहाई हुई। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी पर लगी बंदिश खत्म होने के बाद पार्टी का पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने पर इन्हे ‘पंजाब मजदूर पंचायत’ का अध्यक्ष तथा डीडी वशिष्ठ को महासचिव बनाया गया। इसके साथ ही इनको पंजाब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का संयुक्त मंत्री पद की जिम्मेदारी भी दी गई।
18 अक्टूबर 1948 में इनकी शादी, कमला भसीन से हुई। वधु के घर पैदल चलकर, बिना किसी बैंड बाजे, घोड़ी, बिना सेहरा बांधे हुए, खादी का कुर्ता सलवार पहने चार-पांच लोगों के साथ जाकर शादी कर ली। कोई स्वागत समारोह वगैरा नहीं मनाया गया।
शादी के तुरंत बाद सोशलिस्ट पार्टी के 1949 में हुए पटना सम्मेलन में आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में इनको तथा मधुलिमए को पार्टी का संयुक्त सचिव बना दिया गया। उसके बाद पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में संगठन संबंधी कार्यों की जिम्मेदारी ये निभाने लगे। जयप्रकाश नारायण की हिदायत पर यह मुल्क भर में दौरा कर पार्टी के कार्यों में मशगूल हो गए। पार्टी महासचिव जयप्रकाश नारायण के एक दुर्घटना में घायल होने के कारण उनके स्थान पर प्रेम जी को कार्यवाहक महासचिव पद की जिम्मेदारी सोंपी गई।
मंई1949 में डॉ राममनोहर लोहिया के साथ नेपाल दूतावास पर नेपाली कांग्रेस के नेता बीपी कोइराला जिन्होने नेपाल में राजशाही के जुल्म के विरुद्ध आमरण भूख हड़ताल कर रखी थी, उसके समर्थन में दिल्ली में नेपाली दूतावास पर प्रदर्शन किया गया, जिस पर पुलिस ने अश्रु गैस के गोले छोड़े, और इनको गिरफ्तार कर 6 महीने की सजा सुना दी गयी। 1951 में सोशलिस्टों ने ऐतिहासिक जनवाणी दिवस मनाया। इस समिति के अध्यक्ष डॉ रामनोहर लोहिया तथा प्रेम जी इसके सचिव बने। प्रदर्शन की तैयारी के लिए अथक परिश्रम किया। दिल्ली के रामलीला मैदान में डॉ राम मनोहर लोहिया की सदारत में एक लाख से ज्यादा हाजिरी के बीच पार्टी के संघर्षों, क्रियाकलापों की एक विस्तृत रिपोर्ट प्रेम जी ने पेश की। रंगून में एशियन सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस में सोशलिस्टों के प्रतिनिधि के रूप में इनको भेजा गया। जहां इन्होंने कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इस दौरे के क्रम में वे नॉर्वे, स्वीटजरलैंड, वेस्ट जर्मनी, ऑस्ट्रिया, युगोस्लाविया, इटली, इजरायल भी गए। दौरे के अपने तजुर्बे को इन्होंने ‘जनता वीकली’ में लगातार लिखा।
प्रेम जी से कई बार बड़े पदों को स्वीकार करने के लिए आग्रह किया गया। 1979 में जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर जी ने उन्हें नेपाल में भारत का राजदूत बनने का विशेष अनुरोध किया। परंतु उन्होंने विनम्रता के साथ इनकार कर दिया।
मैंने बहुत ही मुख्तसर रूप से यह दास्तान एक ऐसे इंसान की लिखी है, जो एक नामवर खानदान में पैदा हुआ। बड़ी तालीम हासिल करने के बावजूद, आजादी के जंग में लड़कपन से ही शामिल हो गया। सोशलिस्टो बन, तमाम उम्र सोशलिस्ट पार्टी के संघर्षों, उसके साहित्य, पत्र पत्रिकाओं, बुलेटिनो, अखबारों मे लिखने, सफर में खत लिखना, पार्टी की टेबल पर घंटो बैठकर खतो किताबत, पार्टी के प्रचार प्रसार, संगठन के काम में हर प्रकार की असुविधाओं को झेलता, पार्टी कार्यकर्ताओं के दुख सुख में हिस्सेदारी करता। पार्टी ने उनकी काबिलियत, समर्पण को देखकर पार्टी के बड़े से बड़े पद से उनको नवाजा। वह चाहते तो सत्ता के गलियारे में भी प्रवेश कर सकते थे। परंतु ये तो एक मिशनरी के रूप में कार्य करने को ही अपना ध्येय मानते थे।
विनम्रता, सादगी, साथीपन की भावना से भरे प्रेम जी का पार्टी कार्यकर्ताओं से रिश्ता घर के बुजुर्ग का बना रहता था।
प्रेमजी ने 84 सोशलिस्ट नेताओं, कार्यकर्ताओं को सिराज- ए -अकीदत पेश करते हुए जो प्रोफाइल लिखा, उस पर बनी उनकी किताब ‘डेमोक्रेटिक सोशलिज्म, प्रोफाइल इन करेज एंड कनविक्शन’ को पढ़कर सोशलिस्टो लिए उनकी आस्था, लगाव, साथीपन का एहसास तो होता ही है, साथ ही उससे सोशलिस्ट तहरीक का आंखों देखा, साथ जिया, गमी- खुशी के लम्हों के साथ-साथ आंदोलन के संघर्षो, संगठन का एक इतिहास भी कलमबंद हो गया।
1जनवरी के सोशलिस्ट मिलन में, दिल्ली मे रहने पर वह जरूर शिरकत करते थे। हंसमुख प्रेम जी कई रोचक किस्से सुना कर कार्यकर्ताओं को लोटपोट कर देते थे। सोशलिस्ट पार्टी के दो धडो प्रजा समाजवादी पार्टी तथा संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनने के बाद बड़ा कटुता का वातावरण था। मैं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता था, उसके बावजूद प्रेम भसीन तथा सुरेंद्र मोहन जी से जरूर मिलता था। काफी हाउस में ब्रजमोहन तूफान सूरजभान गुप्ताजी से रोजमर्रा बातचीत होती थी। इन लोगों के खुलूस मोहब्बत साथीपन की भावना तथा व्यवहार से कटुता की जगह एकता की चाहत जगने लगती थी। मुझे तमाम उम्र इस बात का अफसोस रहेगा की जो जिम्मेदारी मधुलिमए, प्रेम जी ने मुझे दी थी, कि एक दिन मुझे सोशलिस्टों के इन दो आदर्श महापुरुषों को सोशलिस्ट तहरीक पर तस्करा, विश्लेषण, मूल्यांकन करने के लिए मिलवाना था, वह पूरा ना हो सका। प्रेम जी ने अपने एक लेख में उस पर अफसोस भी जाहिर किया है।
एक बार दिल्ली में प्रेम जी के जन्म दिवस पर सोशलिस्टों ने चंदा इकट्ठा कर, प्रेम जी को 22 लाख की थैली भेंट की थी, जिसको उन्होंने जब ही जनता ट्रस्ट को भेंट कर दिया था। उस सभा में मैंने भावावेग में कह दिया था की प्रेम जी, हम सोशलिस्टों ने आपके कर्ज को नहीं चुकाया। अपने भाषण में उत्तर देते हुए प्रेम जी ने कहा, ‘राजकुमार तुम मुझे क्या देना चाहते थे, मत भूलो, मैंने आचार्य नरेंद्रदेव, जयप्रकाश नारायण, युसूफ मेहर अली, डॉ राममनोहर लोहिया के साथ काम किया है उनका मुझ पर यकीन था। अब तुम मुझे किसके मातहद, पद पर बैठाना चाहते हो? फिर हंस कर एक किस्सा सुनाया। कि मैं पार्टी का महामंत्री था।पार्टी के काम से मुझे अनारकली (अब पाकिस्तान में) जाना था। वहां पर हमारी पार्टी के कार्यकर्ता सरदार नत्था सिंह का घर में जानता था। मैं स्टेशन से एक तांगे पर उनके घर जाने के लिए निकल पड़ा। उनके घर पर पहुंचकर दरवाजे पर खड़े एक लड़के को कहा, अंदर जाकर नत्था सिंह को खबर कर दो, कि प्रेम भसीन आए हैं। कुछ ही सैंकड के बाद घर के अंदर से भागते हुए, एक हाथ से पगड़ी बांधते, और दूसरे हाथ से पूरी ताकत से नारा लगाते हुए, हिंद का नेता प्रेम भसीन जिंदाबाद, सोशलिस्ट रहबर प्रेम भसीन जिंदाबाद,
आवाज सुनकर आस पड़ोस वाले इकट्ठे हो गए। अकेला नत्था सिंह जिंदाबाद का नारा बुलंद करता रहा। फिर मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, वे नत्था सिंह, जिंदाबाद मुर्दाबाद बाद विच कर लेना,
पहले तांगे वाले नू किराया तो दे। थोड़ी देर के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं का जमावड़ा शुरू होकर, जिंदाबाद करता रहा। यह किस्सा सुना कर प्रेम जी ने कहा ‘कहो,’राजकुमार तुम्हारे पास इससे बड़ा देने को कुछ है, तो बताओ?
सत्ता के बड़े पदों, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, गवर्नर, एम्बेसडर, एमपी एमएलए न जाने कौन-कौन से पदों पर रहने वाले, जिंदा जी नजरअंदाज, तथा इतिहास के कूड़ेदान में अपने को पाते हैं। जो लोग उनकी कदमबोशी करते थे, सत्ता से हटते ही वे न केवल नजरअंदाज करते हैं, बल्कि बेज्जती करने पर भी उतारू हो जाते हैं। परंतु मधुलिमए, प्रेम भसीन जैसे सोशलिस्ट, हमेशा याद मे बने रहेंगे, जब तक सोशलिस्ट तंजीम की आखिरी निशानी रहेगी।





