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*परिसीमन के ज़रिए 2029 में भाजपा की जय का रास्ता बनाने की तैयारी !*

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 -सुसंस्कृति परिहार 

आजकल चुनाव क्षेत्र परिसीमन की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। हालांकि यह सुविचारित रणनीति का ही मसला है।याद कीजिए कोरोना काल को जब लोगों का घर से निकलना बंद था उस दौरान माननीय प्रधानमंत्री जी सेंट्रल विस्टा का काम देखने जाते थे स्वाभाविक है मज़दूर भी बुलाए जाते होंगे।इस दौरान मोदीजी के मन में हरदम उन 888 सांसदों के बैठने की चिंता रहती होगी, जिनमें परिसीमन के बाद सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार से आए  भाजपा सांसदों की उपस्थिति होगी। लोगों ने पहले इसे हल्के में लिया। किंतु जब ये समझ आया कि यह तो सिर्फ भाजपा की जय का रास्ता बनाने के लिए है तब से दक्षिण के सभी राज्यों में खलबली है।जो स्वाभाविक है।

 ताज़ा स्थिति में दक्षिण भारत के पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं. जबकि उत्तर भारत के सिर्फ़ दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलाकर 120 लोकसभा सीटें है।यदि उनकी 80 सीट भी बढ़ जाती हैं तो यह भाजपा की जीत सुनिश्चित कर सकता,  लेकिन जैसे-जैसे साल 2026 क़रीब आ रहा है, दक्षिण भारत के नेता केंद्र सरकार पर ‘भेदभाव’ और दक्षिण राज्यों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए हमलावर हैं। वे जनसंख्या के आधार पर परिसीमन के लिए कतई तैयार नहीं है।

 फलस्वरूप परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विवाद गहरा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है। दक्षिण के राज्य 2050 तक परिसीमन रोकने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सीटें बढ़ाने का आधार जनसंख्या नहीं होना चाहिए अन्यथा उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो जाएगी।पिछले हफ्ते चेन्नई में हुई जॉइंट एक्शन कमिटी की बैठक से यह भी साफ हो गया कि उन्हें काफी समर्थन मिल रहा है। इस बैठक में तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, कर्नाटक के साथ ओडिशा और पंजाब के नेताओं ने हिस्सा लिया। ओडिशा और पंजाब जैसे दक्षिण के बाहर के राज्यों का इस मुद्दे पर साथ आना सकारात्मक है। वैसे भी  इंडिया गठबंधन के सभी घटक दलों ने इस मुहिम का समर्थन किया है। कांग्रेस का पूरा साथ मिल रहा है।क्योंकि कांग्रेस को खराब दिनों में  दक्षिण ने ही संभाला है।

हालांकि गृहमंत्री अमित शाह केंद्र सरकार की ओर से कह रहे हैं कि दक्षिण की सीटें कम नहीं होंगी, लेकिन स्टालिन और केरल के सीएम पिनराई विजयन को इस पर भरोसा नहीं। उनका सवाल है कि सीटें बढ़ाने का आधार जनसंख्या होगी या मौजूदा सीटों का अनुपात। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि परिसीमन सिर्फ जनसंख्या के आधार पर नहीं होता। लेकिन, यह साफ नहीं है कि अगर जनसंख्या आधार नहीं है, तो फिर फैसला किस तरह होगा। हिस्सा बढ़ाने की मांग को लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पहले की नीति को बनाए रखने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि राज्यों के भीतर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हो सकता है, लेकिन लोकसभा सीटों की कुल संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं होनी चाहिए। वह यह भी चाहते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटें बढ़ाई जाएं और महिलाओं को 33% आरक्षण दिया जाए।

 दक्षिण भारत में लोकसभा में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग भी जोर पकड़ रही है।अगर यह मांग विभिन्न दलों के गठबंधन एक जुट होकर उठाते हैं।तथा यहां के भाजपा गठबंधन में शामिल दल सरकार से अपना समर्थन वापसी की घोषणा करते हैं तो बात बन सकती है।वरना जो लोकसभा सदन में 888 सीट्स बनी हुई है उस पर आधिपत्य उत्तर भारत के साथ भाजपा शासित राजस्थान, मध्यप्रदेश,छग आदि प्रदेशों का होगा। दक्षिण शीर्ष पर नहीं होगा। मतलब दक्षिण को कमज़ोर कर भाजपा अपने प्रतिद्वंद्वियों की जीत के बाद भी 2029 में आसानी  से पुनर्स्थापित हो जाएगी। इसीलिए चुनावी जय के लिए भाजपा की यह बड़ी कोशिश है।जिसके लिए आयोग का गठन हो चुका है।

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Ramswaroop Mantri

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