यमुनानगर में सोढ़ौरा ब्लॉक से 10 किमी दूर स्थित एक गांव। नाम है रामगढ़ माजरा। दो बाइकों पर सवार हम पत्रकारों का कारवां जब गांव की दहलीज पर पहुंचा तो देखा कि सफेद पत्थरों से निर्मित शहीद द्वार गांव की कुर्बानी और देश के निर्माण में उसकी भागीदारी की कहानी बयान कर रहा था। चमकीले हर्फों में किए गए स्वागत को वहां से लौटा शायद ही कोई शख्स कभी भुला पाए। 1300 की आबादी वाले इस गांव के 90 फीसदी लोग दलित समुदाय से आते हैं। साथ गए अजय के एक दोस्त के यहां चाय-पानी के बाद जब हम पड़ोस में स्थित गांव के सरपंच राजेश के दफ्तर पहुंचे तो देखा कि उनकी मेज पर बीसियों स्टांप पेपर पड़े थे।
पूछने पर उन्होंने बताया कि यह गांव वालों के घर की रजिस्ट्री के कागजात हैं जो उनके बीच वितरित किये जाने हैं। वैसे तो रामगढ़ माजरा स्मार्ट गांव में शुमार किया जाता है। और प्रधान के कमरे में मौजूद टीवी स्क्रीन पर सीसीटीवी कैमरों के लाइव फुटेज भी चल रहे थे। जो दिखा रहा था कि इन कैमरों द्वारा गांव की चौहद्दी पर बिल्कुल कड़ी नजर रखी जा रही है। लेकिन लगता है कि गांव वाले और गांव वाले ही क्या पूरा सूबा अपने साथ होने वाली धोखाधड़ी और बड़े स्तर पर रचे गए षड्यंत्र को शायद नहीं देख पा रहा है।

यह पूछे जाने पर कि आखिर पूरा माजरा क्या है? प्रधान राजेश ने विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि “कुछ दिनों पहले मेरे गांव की गलियों के दोनों तरफ आटा डालकर ड्रोन के कैमरों से वीडियोग्राफी करायी गयी। और इस तरह से गांव की नये सिरे से मैपिंग के साथ उसकी हदबंदी की गयी।” और फिर स्थानीय प्रशासन द्वारा कहा गया कि आपके घरों और आबादी की जमीनों की नये सिरे से रजिस्ट्री करायी जाएगी। आम तौर पर आबादी और उसकी जमीनें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी अपने आप स्थानांतरित होती रहती हैं। उसमें संबंधित शख्स को महज कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं।
उदाहरण के लिए किसी के पिता की मौत हो जाने पर बेटों को उसकी सूचना राजस्व विभाग के स्थानीय दफ्तर में देनी होती है और फिर अपने भाइयों की संख्या समेत कुछ दूसरी जानकारियां देनी होती हैं। उसके लिए न तो किसी तरह की रजिस्ट्री की जरूरत होती है और न ही कोई अतिरिक्त पैसा लगता है। लेकिन सरपंच राजेश के मुताबिक प्रशासन का कहना है कि वह कच्ची रजिस्ट्री थी लिहाजा अब पक्की रजिस्ट्री करके इसे लोगों को दिया जा रहा है।

और इसमें औपचारिक तौर पर लोगों से महज 300 रुपये लिए जा रहे हैं। इसके साथ ही प्रशासन ने यह घोषणा की है कि इस संपत्ति पर यानि घर या फिर आबादी की जमीन पर उसकी कीमत के मुताबिक कोई भी शख्स बैंकों से लोन ले सकता है। यह अपने आप में बिल्कुल अजूबा मामला है। और तमाम तरह के सवाल पैदा करता है। अभी तक देश के किसी भी सूबे में आबादी की जमीन पर सरकार का कोई सीधा दावा नहीं बनता है।
जोती जमीन यानि खेती वाली जमीन में सरकार हर तरीके से हस्तक्षेप कर सकती है। लेकिन आबादी की जमीन में उसे चकरोड (सार्वजनिक रास्ता) तक काटने का अधिकार नहीं होता है। वहां कोई भी काम गांव के बाशिंदों और सरपंच की सहमति से ही संभव है। कृषि मामले के एक जानकार का कहना है कि आबादी भूमि, भूमि के उस हिस्से को संदर्भित करती है जो कानूनों के अनुसार गांव के निवासियों के लिए नामित है। इसे बेचा, गिरवी या पंचायत/गांव के बाहर किसी को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। इसे “आबादी देह” के रूप में भी जाना जाता है। आबादी भूमि का उपयोग खेती या फसलों की खेती के लिए नहीं किया जाता है। इसका मुख्य रूप से आवासीय उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। आबादी की जमीन को कारोबार के लिए भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

इस बात से समझा जा सकता है कि आबादी की जमीन की क्या हैसियत होती है। और उसे किसी भी तरह से खरीदा और बेचा नहीं जा सकता है। यहां तक कि उस पर किसी तरह का लोन भी नहीं लिया जा सकता है। क्योंकि सरकार लोगों को आवास देने का काम करती है। न कि वह ऐसा कोई रास्ता अपनाती है जिससे लोग अपने घरों से उजड़ जाएं। लेकिन हरियाणा सरकार उल्टी गंगा बहा रही है।
सरपंच राजेश ने बताया कि उनके गांव में अब तक तकरीबन 20 लोग अपनी आबादी की रजिस्ट्री पर लोन ले चुके हैं। और लोन की राशि 4-5 लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक है। और इस पर लगने वाला ब्याज 12 फीसदी से ऊपर बताया जा रहा है। वैसे भी गांव के दलितों के पास अपनी कोई ज्यादा जमीन नहीं है। और आय के स्रोत भी उनके बेहद सीमित हैं। जिससे उनके लिए अपने परिवार का पेट भर पाना भी मुश्किल होता है।
ऐसे में उनका आबादी की इस जमीन पर लिया गया कर्ज चुकाना किसी दिन में देखे गए सपने से कम नहीं होगा। और आखिर में घर की नीलामी या फिर कुर्की होगी और पूरी संपत्ति कर्जा देने वालों के हाथ में चली जाएगी। सरपंच राजेश इस बात को समझते हैं। उन्होंने माना कि “एक समय ऐसा आएगा जब लोग लोन चुकाने के लिए लोन लेंगे। कर्ज में फंसेंगे। घर भी जाएगा।
मेहनत-मजदूरी से जमीन बनी थी। न उसको उतार सकते हैं। लोन लेने के बाद कोई बिजनस में नहीं जा रहा है। घर पर ही खर्च हो रहा है। घर से निकलना पड़ जाएगा। जिसने साइन किये हैं, उन लोगों को ये नहीं पता किस चीज पर वो हस्ताक्षर कर रहे हैं। प्राइवेट कंपनियां लोन दे रही हैं। उसमें भ्रष्टाचार भी है। उज्जीवन जैसी कंपनियां हैं। लोन जितना मिलता है उसका कुछ प्रतिशत हिस्सा तुरंत देना पड़ता है”।
स्थानीय लोगों का कहना था कि इलाके में ऐसी कई कंपनियां घूम रही हैं जो लोगों को आसान शर्तों पर कर्जा देने के लिए तैयार हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या इनके पीछे बड़ी कंपनियों का भी कोई हाथ हो सकता है। तो पास बैठे एक शख्स ने कहा कि जिस तरह से हरियाणा और पंजाब में अडानी और अंबानी अपनी रुचि दिखा रहे हैं उससे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। जींद वाले इलाके में तो अडानी ने अपने साइलोज बना रखे हैं जिसका किसान आंदोलन के दौरान ही खुलासा हो गया था।
यह पूछने पर कि प्रधान होने के नाते क्या आपने लोगों को समझाने की कोशिश नहीं की। तो राजेश का कहना था कि “नशा बंद किया, तो मेरे ऊपर केस डलवा दिये। मेरे खिलाफ 6 अलग-अलग केस किए गए हैं। दारु बेचने वालों ने फंसा दिया। खुद नहीं कभी फंसा। बीएसपी वालों ने उनका साथ दिया”।

हमारी टीम का एक दूसरे गांव ईस्माइलपुर में जाना हुआ जहां की कुल आबादी 1800 है। यह गांव दो हिस्सों में बंटा है। ईस्माइलपुर की आबादी 1300 और बाकी 500 लोग सुल्तानपुर में रहते हैं। गांव में दलितों की संख्या 450 है जबकि मुसलमान 200 के आस-पास हैं और कश्यप तथा गुर्जर दोनों अलग-अलग 70-80 के करीब हैं। खत्री सिखों के 25 घर हैं और एक घर पंडित का है। प्रधान खैराती लाल ने बताया कि अभी उनके पास अपने गांव वालों की रजिस्ट्री के कागज नहीं आए हैं। लिहाजा वह लोगों के बीच वितरित नहीं हो पाए हैं। उनका कहना था कि इस बीच गांव के दो लोग जो नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, उनसे कई बार उसके बारे में पूछने आ चुके हैं।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार की इस नीति के कितने बड़े खतरे हैं। और नशे के आदी किसी शख्स को क्या कोई अपने घर के एवज में लोन लेने से रोक सकता है? और एकबारगी अगर वह लोन ले लिया और उसकी राशि शराब, चरस और गाजे की भेंट चढ़ गयी तो क्या फिर उसकी लौटाने की स्थिति रहेगी? कोई सामान्य दिमाग का आदमी भी इन प्रश्नों का उत्तर जानता है। गांव वाले भी इन खतरों को लेकर आशंकित हैं। अजय का कहना था कि “मुझे लगता है कि लोगों की जगहें पीढ़ियों से बनी हुई हैं। वह छीनी नहीं जा सकती थीं। अब रजिस्ट्री से लोगों को पैसे मिल जाएंगे। लोग भी उसको लेना शुरू कर देंगे।”
गांव के एक शख्स ने बताया कि खाली जमीन पर लोग अपने उपले डालते थे या फिर उनका कचरा डालने जैसे अपने दूसरे कामों में इस्तेमाल करते थे लेकिन मैपिंग के बाद अब हमारा उन पर कोई अधिकार नहीं रहेगा। यहां एक और दिलचस्प बात देखने को मिली। सरकार ग्रामीणों से चूल्हा टैक्स के नाम से टैक्स वसूलती है जिसे हाउस टैक्स भी कहा जाता है। जो शायद ही दूसरे सूबों के किसी गांव में होता हो।
राजवीर ने कहा कि सरकार इसके जरिये लोगों को फंसाना चाहती है। यह बिल्कुल गलत है। लोगों के पास अपने सीमित मकान हैं सीमित जगह है। जैसा भी था वह बिल्कुल ठीक था। इसकी कोई जरूरत ही नहीं थी। नया नियम लागू करके सरकार ने बिल्कुल गलत किया है।
अजय ने कहा कि सरकार जो पालिसी लेकर आती है आमतौर पर जनता के खिलाफ होती है। इसलिए वह नहीं चाहती है कि आम जनता को इसकी जानकारी हो। क्योंकि अगर जनता को उसकी जानकारी हो जाएगी और यह भी पता चल जाएगा कि वह उसके खिलाफ है फिर तो बगावत हो जाएगी। लेकिन सच्चाई यही है कि सरकार की जो पालिसी आ रही है वह आम जनता के खिलाफ है। सरकार चाहती है कि यह किसी को पता ही नहीं चले।
एक सज्जन ने कहा कि गरीब आदमी तो लोन चुका ही नहीं पाएगा। दूसरे ने कहा कि यह सरकार की साजिश है। वह पहले लोन दे रही है और फिर लोन न चुका पाने की स्थिति में हमारे घरों पर कब्जा होगा।ये है सरकार का पूरा खेल।

प्रधान खैरातीलाल ने बताया कि मेरे पास दो आदमी आए थे। वे जानना चाहते थे कि रजिस्ट्री हुई है या नहीं? प्रधान ने उनको बताया कि आनलाइन होनी बाकी है और जैसे ही हो जाएगी उनको पेपर मिल जाएंगे। दोनों गांव वालों का कहना था कि उन्हें लोन चाहिए। प्रधान खैरातीलाल ने बताया कि दोनों नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं।
मोदी सरकार से कोई पूछ सकता है कि आप तो प्रधानमंत्री आवास योजना के जरिये लोगों के सिर पर पक्का छत देने की बात करते हैं। लेकिन आपकी हरियाणा सरकार लोगों को उजाड़ने में लगी हुई है। आखिर इसके पीछे असली वजह क्या है? कहां तो बात हो रही थी कि कैसे भूमिहीनों को कुछ अतिरिक्त जमीनें मुहैया करायी जाएं। और उनके नाम पर पट्टे दिलवाए जाएं। जिससे वह उन पर खेती करके अपने परिवार का पेट पाल सकें। लेकिन यहां पट्टे और जमीन देने की बात कौन करे सरकार एक ऐसी नीति लेकर आ गयी है जिसमें उनको अपने घरों तक से बेदखल होना पड़ सकता है।
इस सिलसिले में जब कुछ जानकार लोगों से बात हुई तो उन्होंने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दरअसल पंजाब और हरियाणा की जमीनों पर अडानी और अंबानी की नजर लग गयी है। यहां की जमीनें सबसे ज्यादा उपजाऊ हैं लिहाजा पैदावार और मुनाफा भी यहीं सबसे ज्यादा होगा। अनायास नहीं किसानों ने इस आशंका को बहुत पहले ही जाहिर कर दिया था और उन्होंने 22 महीने तक धरना दिया और आखिर में सरकार को अपने तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। लेकिन सरकार अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए एक नहीं बल्कि कई अलग-अलग रास्तों का प्रयोग कर रही है।

उसी में से एक है हरियाणा सरकार का यह नया फैसला। क्योंकि इलाके में जब कारपोरेट के हजारों एकड़ के लंबे-लंबे प्लॉट बनेंगे तो उनकी राह में छोटे-छोटे गांव सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़े हो जाएंगे। लिहाजा उनको कैसे रास्ते से हटा दिया जाए और वह भी बगैर किसी बल और ताकत के इस्तेमाल के। उसके लिए सूबे की बीजेपी सरकार ने यह रास्ता अपनाया है।
बढ़ती महंगाई और जीवन का चौतरफा संकट तमाम गरीबों को एक दिन अगर अपना मकान गिरवी रखने या फिर उन पर लोन लेने के लिए मजबूर कर दे तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। ऐसे में गांवों के बड़े हिस्से इसी तरह से लोन की भेंट चढ़कर लोन देने वाली संस्थाओं के कब्जे में चले जाएंगे। किसी गांव में अगर कुछ घर बचे भी तो फिर उनको अपना घर सरेंडर कर किसी और जगह विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा। जिसके पीछे तर्क यह होगा कि हजारों एकड़ के प्लाट में भला आपका अकेला मकान क्या करेगा? और वैसे भी वह विकास के रास्ते में बाधक बन रहा है! और फिर उसके साथ ही प्रशासन उसे छोड़ने के लिए मजबूर कर देगा।
इस तरह से रोपड़ से लेकर यमुनानगर तक अगर किसी कॉरपोरेट का अकेला प्लाट बन जाए तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। चीजें उसी दिशा में आगे बढ़ायी जा रही हैं। अगर समय रहते जनता नहीं चेती तो वह अपना सब कुछ खोकर मजदूर बनने के लिए अभिशप्त हो जाएगी। कोई शख्स अपने ही इलाके में कारपोरेट का कृषि मजदूर बनकर संतुष्ट रहेगा या फिर शहरों में सर्वहारा जीवन जीना चाहेगा फैसला उसको करना होगा। इसके अलावा उसके पास तीसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
(यमुनानगर से लौटकर जनचौक के संस्थापक संपादक महेंद्र मिश्र की रिपोर्ट।)
जनचौक से साभार





