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उत्तर प्रदेश में फिर हिंदु-मुस्लिम करने की तैयारी

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सुसंस्कृति परिहार
तो साहिबान उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव से पूर्व भक्तों का कथित गौरव दिवस 6 दिसम्बर  करीब है ।वहीं जब संघ के अनुषंगी संगठन भाजपा ,विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे संगठनों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाया था। आज जहां राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण तीव्रगति से जारी है।वह सन् 1992 की बात थी। उसके बाद सरयू में बहुत पानी बह चुका है। 2014 से संघ पोषित सरकार केन्द्र में है और 2017 से उत्तरप्रदेश में भी वही सरकार है। जिसने राममंदिर के नाम पर हिंदू वोट हथियाकर सत्ता पाई है। लेकिन अब वह खेल ख़त्म हो गया।नरेंद्र खेल की तैयारी है।

आखिर मथुरा में कृष्ण जन्मस्थली को लेकर क्यों उठा है विवाद, जानिए इसके पीछे  की पूरी कहानी.. - Know about the controversy of the history of mathura  shrikrishna jan bhoomi - Latest


आज जब भाजपा का ग्राफ निरंतर नीचे गिर रहा है उनके झूठ की कलई खुलती जा रही है, मंहगाई चरम पर हैं, विकास का कहीं अता-पता नहीं है,गरीब और ग़रीब तथा अमीर और अमीर हो रहे हैं। अल्पसंख्यक देश में असुरक्षित हैं। दलितों और आदिवासियों का बराबर दमन जारी है। महिलाओं के हालात बदतर हैं। बेरोजगारी चरम पर है। जनता में आक्रोश उफान पर है। ऐसी स्थिति में एक बार फिर हिंदू मुस्लिम को लड़ाने की तैयारी मथुरा में शुरू हो चुकी है।लगता है चुनाव जीतने का अब यही एकमात्र विकल्प इनके पास शेष बचा है।

कहा जाता है कि मुगल शासन औरंगजेब ने 1669 में मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर की भव्यता से चिढ़कर उसे तुड़वा दिया था और इसके एक हिस्से में ईदगाह का निर्माण कराया गया था। जहां ईदगाह है वहां कंस की जेल थी जहां कृष्ण का जन्म हुआ और अब राम जन्मभूमि की तरह कृष्ण जन्मभूमि उन्हें चाहिए।ताकि वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके।

उत्तर प्रदेश के मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि को लेकर  विवाद जारी है। बता दें कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर में बने शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने के लिए पिछले साल मथुरा डिस्ट्रिक्ट सिविल कोर्ट में पिछले साल याचिका डाली गई थी। इस पूरे मामले में मथुरा कोर्ट ठाकुर केशव देव जी महाराज और इंतजामियां कमेटी के बीच इस विवाद पर सुनवाई करेगा। भगवान श्री कृष्ण की भूमि सभी हिंदू भक्तों के लिये पवित्र है. विवादित जमीन को लेकर 1968 में हुआ समझौता गलत था। कटरा केशवदेव की पूरी 13.37 एकड़ जमीन हिंदुओं की थी।

जबकि 1951 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर यह तय किया गया कि वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और ट्रस्ट उसका प्रबंधन करेगा। इसके बाद 1958 में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ नाम की संस्था का गठन किया गया था। कानूनी तौर पर इस संस्था को जमीन पर मालिकाना हक हासिल नहीं था, लेकिन इसने ट्रस्ट के लिए तय सारी भूमिकाएं निभानी शुरू कर दीं। इस संस्था ने 1964 में पूरी जमीन पर नियंत्रण के लिए एक सिविल केस दायर किया, लेकिन 1968 में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ समझौता कर लिया। इसके तहत मुस्लिम पक्ष ने मंदिर के लिए अपने कब्जे की कुछ जगह छोड़ी और उन्हें (मुस्लिम पक्ष को) उसके बदले पास की जगह दे दी गई।मामला परस्पर सौहार्द से खत्म हो चुका था।
ताज़ा ख़बर के मुताबिक़ श्री कृष्ण जन्मभूमि मामले में मथुरा की एक अदालत में सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे याचिकाकर्ताओं ने मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करने वाले विरोधी पक्षों को ब्रज क्षेत्र से कुछ दूरी पर डेढ़ गुना अधिक भूमि की पेशकश की है जहां मंदिर और मस्जिद कानूनी रूप से विषय हैं।इस विषय पर अभी निर्णय नहीं हुआ है क्योंकि कृष्ण जन्मभूमि पर धार्मिक अतिक्रमण के खिलाफ केस को लेकर सबसे बड़ी रुकावट Place of worship Act 1991 भी है. वर्ष 1991 में नरसिम्हा राव सरकार में पास हुए Place of worship Act 1991 में कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के समय धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता. यानी 15 अगस्त 1947 के दिन जिस धार्मिक स्थल पर जिस संप्रदाय का अधिकार था, आगे भी उसी का रहेगा।इस एक्ट से अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि को अलग रखा गया था।

यह मामला उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इस ट्वीट से उभरा जिसमें उन्होंने कहा था, ”अयोध्या काशी में भव्य मंदिर निर्माण जारी है, मथुरा की तैयारी है।”

पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की नेता मायावती ने इस पर बीजेपी पर ज़ोरदार हमला किया है। यह बीजेपी की हार की आम धारणा को पुख्ता करता है। इनके इस आख़िरी हथकंडे से अर्थात हिन्दू-मुसलिम राजनीति से भी जनता सावधान रहे।” वहीं पू्र्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने बुधवार को आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था ये बीजेपी का एजेंडा ग़रीबों को लूटने और अमीरों की जेब भरने का है। वे हमेशा अमीरों के लाभ के लिए काम करते रहे हैं।

लेकिन अब यह सब होना असम्भव लगता है क्योंकि राम जन्मभूमि मंदिर मस्जिद विवाद के बाद अब भाजपा की साम्प्रदायिकता की जो तस्वीर बन चुकी है उससे बहुसंख्यक वर्ग बुरी तरह हताश हुआ है। सदियों से मेल जोल से रहने वाले लोग अब सतर्क हुए हैं। मथुरा की अवाम ने भी कभी अपने क्षेत्र में कभी संघियों को कामयाब नहीं होने दिया।सद्भाव का टापू है मथुरा।आज तक कोई दंगा यहां नहीं हुआ। यहां के वाशिंदे आज भी अपनी बात पर अडिग हैं।हाल ही में तथाकथित नारायणी सेना ने जन्मभूमि के नाम पर जुलूस निकालने की कोशिश की जिसे नागरिकों की पहल पर कलेक्टर ने रोक लगाई।यह सुखद पहलू है।

अदालत में जो मामला चल रहा है उसे खारिज होना चाहिए क्योंकि एक बार किए गए समझौते और रजिस्ट्रेशन पर पुनः निर्णय उचित नहीं।फिर Place of worship Act 1991 भी है। जिसमें कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के समय धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता।यह कानून बाबरी मस्जिद कांड के बाद आया है इसलिए यह लागू होना चाहिए।

इस सबके बावजूद उत्तरप्रदेश सरकार यदि हठधर्मिता की कोशिश करती है तो सुको को तुरंत संज्ञान लेकर कठोर कार्रवाई का निर्णय लेना ही उचित होगा ताकि देश फिर फासिस्ट ताकतों के कारण अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को ख़तरे में ना डाल सके। उम्मीद है जनता और प्रशासनिक अमला इस अनहोनी को टालने चाक चौबंद रहेगा।

Ramswaroop Mantri

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