(फिर पूछा गया, अक्सर पूछा जाने वाला सदाबहार सवाल)
~ डॉ. विकास मानव
नहीं। यह मैं मानता नहीं हूं। यह मैं जानता हूं।
नहीं। मैं हर किसी को मैं कुछ नहीं दिखा सकता। पात्र व्यक्ति को मैं सब दिखा सकता हूँ।
मानने का मतलब है : किसी और ने कहा है और मैं मानता हूं। जानने का मतलब है : मैंने दर्शन और अनुभव से जाना है। वस्तुस्थिति मैं समझा सकता हूं : लेकिन समझाने से आप, मानने से ज्यादा नहीं जा सकेंगे।
दिखा सकता हू : वहां आप जानने के लोक में भी प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन आप ईमानदारी से चाहें तो ही।
*इसकी अपनी प्रक्रियाएं हैं :*
बिल्कुल साइंटिफिक प्रक्रिया है कि आप अपने पिछले जन्म का स्मरण कैसे करें, भावी जन्म का अवलोकन कैसे करें और मोक्ष की अवस्था का अनुभव कैसे करें?
फिजिकल साइंसेज और स्प्रिचुअल साइंसेज : बिल्कुल बैठ जाएगा सच आपके दिमाग में; क्योंकि~ जहां साइंस है, वहां ताल-मेल बैठ ही जाता है; अगर दोनों साइंस हैं।
मानने का और साइंस का मेल नहीं बैठेगा। जानने और सांइस का मेल बैठ जाएगा। उसके कारण हैं, क्योंकि चाहे कितनी भी भीतरी बात हो उसके पाने के उपाय अगर वैज्ञानिक हैं, तो बाहर का विज्ञान आज नहीं कल राजी हो जाएगा।
*ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की, दिलावार लेबोरेट्री का प्रयोग :*
यहां कुछ वैज्ञानिक अध्यात्म पर प्रयोग कर रहे हैं। कभी वे बहुत हैरान हो जाते हैं। एक फकीर ने यह कहा कि मैं कुछ बीजों के ऊपर प्रार्थना करके पानी छिड़क देता हूं, यह बीज तुम्हारें उन बीजों से जल्दी अंकुरित हो जाएंगे, जो मेरी प्रार्थना के पानी के बिना तुमने बोए हैं।
इस पर प्रयोग किया गया है। सैकड़ों प्रयोग किये गए हैं इस बात पर, और वह फकीर हर बार सही निकला।
एक ही पुड़िया के आधे बीज इस गमले में डाले गए, आधे इस गमले में। सारा खाद, सारी मिट्टी सब एक-सा और जो पानी छिड़का गया वह भी एक, पानी भी अलग नहीं।
लेकिन इस गमले पर डाले गए पानी के लिए उसने प्रार्थना की और डाला, और इस पर बिना प्रार्थना के डाला गया। हैरानी की बात है उसके हर प्रार्थना के सब बीज जल्दी अंकुरित हुए। बड़े पत्ते आए, बड़े फूल आए और उसकी गैर प्रार्थना के बीज पिछड़ गए।
दिलावार लेबोरेट्री ने अपनी इस साल की रिसर्च रिपोर्ट में कहा : हमारे लिए इंकार करना मुश्किल है सुपर पावर और उसके रहस्यमयी प्रभाव को।
इससे भी बड़ी जो घटना घटी, वह यह घटी कि उस फकीर ने एक बीज पर खड़े होकर प्रार्थना की, ईसाई फकीर है जो गले में एक क्राॅस लटकाए हुए है, और दोनों हाथ फैला कर वह आंख बंद करके खड़ा हुआ है, और इस बीज के लिए उसने प्रार्थना की।
जब उस बीज का फोटो लिया गया, तो बड़ी हैरानी की बात हुई, उस फोटो में क्राॅस का पूरा चिह्न है।
अब वह बड़ी मुश्किल में पड़ गए। कि इस बीज के फोटोग्राफ में क्या इतनी संवेदनशीलता हो सकती है कि फकीर का चित्र उसमें भीतर प्रवेश कर गया? उसकी छाती और उसके फैले हाथ, और क्राॅस उसमें पकड़ गया।
धर्म यह बहुत दिन से कह रहा है; लेकिन आम तौर पर धर्म “मानने वाले, यानी अन्धविस्वासी जानो” के हाथ में है। इसलिए हक़ीक़त और फ़साने में ताल-मेल नहीं बैठता।
धर्म आंतरिक विज्ञान है, और विज्ञान बाह्य धर्म : इन दोनों के सूत्र तो एक ही होने वाले हैं। आज देर लग सकती है, कि विज्ञान धीरे-धीरे बढ़ कर भीतर आ रहा है।
अगर धर्म भी धीरे-धीरे बढ़ कर थोड़ा बाहर आए, तो किसी जगह मिलन हो सकता है। वह मिलन आने वाली सदी में निश्चित ही हो जाएगा। हो सकता है इसी सदी में हो जाए।
*पिछले जन्म की स्मृति इस जन्म की स्मृति जितनी ही वैज्ञानिक :*
बस दोनों में थोड़े से फर्क हैं। अब जैसे अगर मैं आपसे अभी पूछूं कि उन्नीस सौ पचास एक जनवरी आप थे तो, लेकिन स्मरण है आपको? नहीं है।
अगर आपकी स्मृति से ही हमको मान कर चलना पड़े तो उन्नीस सौ पचास एक जनवरी हुई या नहीं हुई, और आपको कोई स्मरण नहीं और आप कहते हैं मैं था। आप किस आधार पर कहते है कि आप थे? क्योंकि आपको बिलकुल स्मरण नहीं कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास में क्या हुआ। आप सुबह कब उठे, कब सोए, क्या खाया, क्या पीआ? किससे क्या बात की आप कहते हैं, कुछ भी नहीं। अगर आप ही प्रमाण हैं, और कोई कैलेंडर नहीं बचे दुनिया में, तो आप सिद्ध न कर पाएंगे कि एक जनवरी, उन्नीस सौ पचास थी, क्योंकि पहली तो बात यह कि आपको स्मरण ही नहीं, जो बुनियादी चीज तो कट गई है।
लेकिन एक बड़े मजे की बात है कि आपको अगर हिप्नोटाइज्ड किया जाए, तो आपको एक जनवरी, उन्नीस सौ पचास की सब स्मृतियां लौट आती हैं : तत्काल।
तो कर्मफल- पुनर्जन्म और मोक्ष के सच का दर्शन व अनुभव करना है तो प्रयोग से गुजरना होगा।
हम आपको उस स्टेज तक लिए चल सकते हैं लेकिन लगन, जुनून और उत्कट अभीप्सा चाहिए। सबसे बड़ी बात, धैर्य। आपके पास अगर 2-3 माह भी नही हैं अपने लिए और आप चाहते हैं कि व्यापारी की दुकान पर पैसे दें, माल लेकर चलते बनें तो क्षमा करें। लेते तो हम वैसे भी कुछ नहीं।





