अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

इंदौर नगर निगम में संपत्ति कर घोटाला,एक ही खाते में 1.37करोड का गोलमाल

Share

नगर निगम इंदौर में नायक की खर्चीली जीवनशैली और सोने के गहनों से लदा शरीर खासा चर्चा का विषय रहता है…. विभाग में भी कई तरह की अटकलें हैं जिन्हें शीघ्र वरिष्ठों के सामने लाया जाएगा……

इंदौर ,पिछले महीनों नगर निगम के राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार की जो नई कहानी सामने आई थी, उसने अब नया मोड़ ले लिया है..

केस में शिकायत और आधी अधूरी चलती जांच के बीच में ही नायक को राजस्य मुख्यालय से हटाकर मार्केट विभाग में भेजा गया था लेकिन आरोप है कि लेनदेन और अधिकारियों की मिलीभगत की वजह से नायक पर एफआईआर दर्ज नहीं करवाई जा रही है. मामाने की शिकायत अब बड़े स्तर पर करने की तैयारी है.

कुछ पूर्व/रिटायर्ड अपर आयुक्त और उपायुक्त के भी शिकायत की जद में आने की अटकलें हैं.

यह पूरा मामला ARO अरविंद नायक व अग्रवाल पक्निक स्कूल के प्रॉपर्टी टैक्स का है… दावा है कि यह केवान एक संपत्ति का मामाला नहीं, बल्कि राजस्व विभाग में बड़े पैमाने पर घोटाले का संकेत देता है…

शहर के मॉल, होटल, बड़े स्कूल, कॉलोनाइजर और संस्थान भी इसी पैटर्न का मंजूरी हिस्सा हो सकते हैं..

यदि ऐसा ही हुआ है, तो निगम का कर राजस्व करोड़ों में प्रभावित हुआ है. सिस्टम में बड़े पैमाने पर एरिया घटाने, टैक्स कैटेगरी बयानने और डिजिटल बदलाव जैसी प्रक्रियाएं चल रही है. यह सब कुछ एक नियोजित नेटवर्क के तहत हुआ प्रतीत है… यह मामाला एक सिस्टमेटिक घोटाले का पैटर्न दिखाता है. यह सिर्फ एक स्कूल का मामाला नहीं है. इससे नगर निगम के राजस्व विभाग में चल रहे बल की तस्वीर उभरती है..

कैसे घटा टेक्स और कितनी चली गई

  • अग्रवाल पक्कि स्कूल की संपत्ति का टैक्स रिकॉर्ड था 3.19 करोड़,

जिये सिस्टम में संशोधन करके 1.82 करोड़ दिखा दिया गया

  • इसका मतलब हुआ कि नगर निगम की जेब से लगभग 1.37 करोड़ का नुकसान

संशोधन तकनीकी रूप से एरिया घटाकर और टैक्स स्लैब बदलकर किया गया यह कोई मामूली गलती नहीं थी, यह सिस्टम का जानबूझकर दुरुपयोग था…

डिजिटल ट्रेल और सिस्टम लॉग

इंदौर नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि “जीप में यह सामने आया कि टेकर संशोधन डिजिटल फिटम में सीधे दर्ज किया लगता है क्रिया को भी जानबूझकर दरकिनार किया गया है.”

तो अब बड़ा सवाल है कि कौन सी यूजर आईडी ने यह बदनाव किया था यह अकाले अधिकारी की स्वतंत्र कार्रवाई थी या एक नेटवर्क का हिस्सा था? यह डिजिटल लॉग ही अब सबूत और सुराग का सबसे बड़ा खोत बन गया है…

जोनल ऑफिसः निरीक्षण रिपोर्ट और प्रारंभिक पहले भेजते है…

-जोन ARO तकनीकी स्तर पर फाइल तैयार करते हैं, सिस्टम में एंट्री करते है.. मुख्यालय बड़े बदलावों के लिए अंतिम

आवश्यकतानुसार अंतिम आदेश

इसका भताब असली घोटाला सिर्फ सिस्टम और नेटवर्क तक फैला हुआ था…

हो कार्रवाई

मामाले की जांच के बाद ARO अरविंद नायक को निलंबित किया गया. उन्हें ARO से आग किसी अन्य पद पर भेजा गया. लेकिन यह केवल सतही कार्रवाई है असली सवाल यह है कि कितने और बड़े प्रोजेक्ट्‌स में यही पैटर्न दोहराया गया?

सनसनीखेज तथ्य

  1. सिस्टम के डिजिटल लांग में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि बदलाव सीधे ARO के द्वारा किया गया
  2. जोवान रिपोर्ट और निरीक्षण भी कभी मुख्यालय तक ही नहीं पहुंचती…. 3. बड़े संस्थानों के मामले में अक्सर मुख्यालय स्तर से ही अंतिम आदेश पास होते

हैं 4. अरबों के मूल्य वाली संपत्तियों का टैक्स

जब आम नागरिक अपने घर का टैक्स ठीक से चुका रहा था, उसी समय नगर निगम के राजस्व विभाग के ARO अरविंद नायक ने अग्रवाल पब्लिक स्कूल के करोड़ों के टैक्स को सिस्टम में संशोधन करके घटा दिया…. सिर्फ एक क्लिक, सिर्फ एक एंट्री, और निगम की जेब से 1.37 करोड़ गायब…. यह कोई मामूली चूक नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक घोटाले की शुरुआत थी, जो अब पूरे शहर की निगाहों के सामने आ चुका है…. पढ़ते ही लगता है कि राजस्व विभाण राजस्व विभाग के अफसर अब सिर्फ कर वसूलने वाले नहीं, बल्कि खेल-खेल में करोड़ों हजम करने वाला भी बन गए है….

यह केस दिखाता है कि कैसे करप्रणाली में चूक और भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर संभव है… 5. ARO अरविंद नायक केस यह स्पष्ट करता है कि राजस्व विभाग में नामांतरण, एरिया संशोधन और टैक्स संशोधन के दौरान गयाघोटाले की पूरी संभावना है.

  1. निलंबन और पोस्टिंग बदलना केवल सातही कार्रवाई है, असली खेल मुख्यालय स्तर पर होता है…

विभागीय जांच के नाम पर लीपापोती,

कई जांच 10 साल बाद भी है जारी सरकारी नौकरी में गड़बड़ी पर विभागीय जांच की जाती है, ताकि दोषों पर उचित कर्मचाई हो सके, लेकिन नगर निगम में जांच के नाम पर जमकर लीपापोती होली है… कई अधिकारियों-कर्मचारियों की विभागीय जांच दस साल बाद भी पूरी नहीं हो सकी इस दौरान कुछ की मौत हो गई, लेकिन जांच अधूरी है. कई मामलों में अधिकारी और कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगे थे…

इन पर विभागीय जांच

हरीश भारद्वाज, गुरु दयाल सिंह चौहान, पीयूष सोनी, पवन पिरोडिया, गौतम मालवीय, जितेंद्र पांडे, प्रमोद बिरे, कैलाश कुमार, आशीष भारद्वाज, मुकेश कौशल, संतोष परमार, कैलाश कटारिया, मयंक जैन, मो. जावेद, राजेंद्र सिंह भाटी, विनोद पाण्डेय, राजकुमार कौशल, मुकुल शर्मा, अहमद बिलाल अंसारी, अपर तिवारी, रमेश यादव, अंकित शर्मा, अशोक पाटिल, आगृति बिठवरे, गोविंद राठौर, पदम सिंह राठौर, मयंक डोल, अतुल मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, राजकुमार कौशल, ज्ञानेंद्र सिंह जाहीन, पीसी जैन, आरसी दवे, प्रदीप माहेश्वरी, डीआर लोधी, पीसी जैन, आश्रित जवबंधु, दिलीप सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, अभय राठौर, धीरेंद्र बायस, शुभम बुनकर, प्रतीक मिहोरिया, प्रशांत खोले। इनके सहित कई ऐसे अधिकारी-कर्मचारी है जिनकी विभागीय जांच जारी है। कई की जांच के दौरान दूसरे विभाग में बड़ी जिम्मेदारी मिली।

कई पर लगे भ्रष्टाचार जैसे आरोप

,

विभागीय जांच के दौरान करीब दर्जन भर अधिकारी-कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं तो कुछ की मौत हो गई है। इसमें ऐसे अधिकारी भी शामिल है, जिन पर आर्थिक अनियमितता भ्रष्टाचार के आरोप है। – हरभजन सिंहः सिंह का कुछ समय पहाने निधन हुआ है। ये हनी ट्रैप मामाने में फरियादी थे। उनका तबादला इंदौर से रीवा हो गया था, लेकिन उनकी विभागीय जांच का निराकरण नहीं हुआ। निगम के रिकॉर्ड में यह जांच आज तक प्रचलित है।

अभय राठौर करोड़ों के फर्जीवाड़े का मास्टर माइंड अभय राठौर को ठहराया गया था। राठौर पर तीन विभागीय जांच प्रचलित है। इनका निराकरण नहीं हुआ है। राठौर फर्जी बिल के मामले में जेल में है। कहा जाता है कि यदि पहले ही विभागीय जांच में राठौर पर होता तो बड़ा फर्जीवाड़ा नहीं होता।

  • दिलीप सिंह चौहान चौहान करीब एक वर्ष पहले रिटायर हो चुके हैं, लेकिन विभागीय जांच जारी है।
  • ज्ञानेंद्र सिंह जादौन नारायण के बाद ये प्रतिनियुक्ति पर इंदौर विकास प्राधिकरण, फिर उज्जैन और ग्वालियर चले गए थे। इंदौर विकास प्राधिकरण से रिटायर हुए, लेकिन निगम में उनके खिलाफ विभागीय अष तक पूरी नहीं हुई। – नरेंद्र सिंह तोमर तोमर रिटायर हो चुके हैं. लेकिन जांच जारी है।
  • दिनेश गौड़ गौड पर लेनदेन संबंधी गंभीर आरोप लगे थे। पुलिस ने केस दर्ज किया, लेकिन निगम की जांच अधूरी है।

2015 के पातायात घोटाले में जांच जारी,

पर आरोप राजेंद्र वाघमारे, विजय सक्सेना अभय राठौर, ओमप्रकाश दुबे, दिलीप सिंह चौहान, अशोक राठौर, नरेंद्र सिंह तोमर।

“कई विभागीय जांच लंबे समय से लंबित हैं। हमने हाल ही में इनकी सूची तैयार करवाई है। सभी जांच अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि समय सीमा में जांच का निराकरण करें। यदि किसी जांचकारी अधिकारी की तरफ से देरी या लापरवाही की जाएगी तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”

Ramswaroop Mantri

Add comment

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें