सुप्रीम कोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ न्यायमूर्ति जी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की खंड पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के दो सचिवों को हिरासत में लेने का, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सरकारी अधिकारियों को मनमाने ढंग से समन करना संविधान की भावना के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा की सरकारी अधिकारियों को हाईकोर्ट में तलब करने के नियम तय कर दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों के लिए जारी मानक पर इस बात पर जोर है, कि वह सरकारी अधिकारियों को अपमानित करने से बचे। उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि, पहनावे और सामाजिक स्थिति पर टिप्पणी करने से परहेज करें। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा ,कि अधिकारियों को हाईकोर्ट केवल इसलिए तलब नहीं कर सकता है, कि उनके विचार अलग हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आम जनता का भगवान ही मालिक है।
सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में हजारों अवमानना के प्रकरण दर्ज हैं। जिसमें हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश होने के बाद भी सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की। जो मामले हाईकोर्ट में चल रहे हैं सरकार उसमें लंबे समय तक अपना पक्ष भी नहीं रखती है। यदि यह कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों का पालन राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा नहीं किया जा रहा है। वर्षों तक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर कार्यवाही नहीं होती है। जो न्यायालय की शरण में गए।कई वर्षों तक मुकदमा लड़ा, हजारों लाखों रुपए खर्च किए। फैसला मिला लेकिन सरकार और उसके अधिकारियों ने उसका पालन नहीं किया। सरकार ने अधीनस्थ न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक तारीख पर तारीख की तरह, अपील पर अपील करते हुए, जब अदालत का फाइनल निर्णय आ भी जाता है।
उसके बाद भी सरकार और उसके अधिकारी निर्णय का पालन करने के स्थान पर, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की नई-नई मीसंसा कर निर्णय का पालन नहीं करते हैं। संबंधित पक्षकार बार-बार अदालत में अवमानना याचिका दायर करता है। उसके बाद भी जब अधिकारी और सरकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पालन नहीं करता है। तभी जाकर हाईकोर्ट, अमूमन अधिकारियों को बुलाती हैं। चेतावनी देती हैं, एक समय सीमा के अंदर निर्णय के पालन करने का हुकुम सुनाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और उसके अधिकारी न्यायालय के आदेशों को मान्य करेंगे?
जिस निर्णय को वह अपने अनुकूल पाएंगे। उनका तो पालन हो जाएगा बाकी सरकार के कार्यालय में फाइलों के रूप में दर्ज रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्षों में कई ऐसे आदेश जारी किए, जिनका पालन संबंधित विभाग संस्था या अधिकारियों द्वारा नहीं किया गया। कई मामलों में तो केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं मानने के लिए नए कानून ही बना दिए। ऐसी स्थिति में अब आम जनता के सामने एक ही विकल्प रह गया है, कि वह न्याय प्रक्रिया और संविधान पर जो विश्वास करती है। वह विश्वास करना बंद कर दे। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जिस तरह के निर्णय दिए हैं, उसे निराशा बढ़ी है। यदि जांच एजेंसियां सही जांच कर रही होती, और वह निष्पक्षता के साथ काम करती ,तो लोगों को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की शरण में नहीं जाना पड़ता।
जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट , जांच एजेंसियों और सरकार के ऊपर आंख बंद करके, भरोसा करते हुए यह मान लिया है, कि यह जो करेंगे वह सब ठीक है। हम सरकार और जांच एजेंसियों एवं संस्था प्रमुख के निर्णय पर हस्तक्षेप नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को संविधान ने जो शक्तियां दी हैं, उसका भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा।संविधान ने जो मौलिक अधिकार नागरिकों के लिए तय किए हैं। वह संविधान की किताब तक सीमित रह जाएंगे। जिस तरीके से जांच एजेंसियां मनमाने ढंग से काम कर रही हैं। आम आदमी की सुनवाई नहीं हो रही है। सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जो कहती है, वही जांच एजेंसियां और सरकारी अधिकारी काम कर रहे हैं।जिससे आम नागरिक लगातार प्रताड़ित हो रहा है। हाल ही में हिट एंड रन कानून में संसद ने बिना बहस के कानून पास हो गया। लोकसभा और राज्यसभा की आसंदी ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। सरकार ने बहुमत के आधार पर बिना चर्चा के कानून बना दिया। संसदीय एवं संवैधानिक नियमों का पालन नहीं किया गया। करोड़ों नागरिकों के ऊपर इस तरह के कानूनो का असर होता है। किसी प्रकिया का पालन ना तो सरकार कर रही है। नाही जांच एजेंसी कर रही है। सभी मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं। हाईकोर्ट ,सुप्रीम कोर्ट यह सब देख भी रहे हैं, जान भी रहे हैं। इसके बाद भी बेबस बने हुए हैं।
महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की जिस तरह से अवहेलना की है। उसे सारा देश देख रहा है। उसके बाद से न्यायपालिका के प्रति आम जनमानस का विश्वास भी खत्म हो रहा है। लाखों रुपए खर्च करने, कई वर्षों तक इंतजार करने, न्याय मिल जाने के बाद भी सरकारों और संबंधित विभागों द्वारा उसका पालन नहीं किए जाने से, इस तरह के निर्णय अर्थहीन है। सुप्रीम कोर्ट को इस और भी ध्यान देने की आवश्यकता है। अन्यथा जन मानस का विश्वास, न्यायपालिका के प्रति कायम रख पाना बहुत मुश्किल होगा। बहुमत के आधार पर सरकार फैसला करती है। बहुमत के आधार पर कानून बनाती है।यहां यह भी देखना होगा कि सरकार के पास कुछ चुने हुए निर्वाचित प्रतिनिधियों का ही बहुमत होता है। लेकिन जब इस तरह की स्थिति बनने लगती है, तो जनता स्वयं निर्णय करने लगती है। जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कहीं से भी अच्छे हालात नहीं कहे जा सकते हैं। अधिकारी अपने अधिकार के बल पर मनमानी कर रहे हैं।
आम आदमी न्यायालय की शरण में जा रहा है। उसे न्यायालय से न्याय होने के बाद भी न्याय नहीं मिल पा रहा है। हाईकोर्ट के जज अवमानना के प्रकरणों में वर्षों वर्षों तक निर्देश देते रहते हैं। उसके बाद भी जब कोई कार्यवाही सरकारी अधिकारी और सरकार नहीं करती है। यह सबसे बड़ा चिंता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ,अपने निर्णय का पालन किस तरह से करा पाएंगे। इस तरह के मामले में सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी और वर्तमान स्थिति को देखते हुए न्यायपालिका से न्याय पाना आम आदमी के लिए मुश्किल हो गया है। अधीनस्थ न्यायालय भी सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद और भी असहाय हो जाएगी।





