गोपाल अग्रवाल
सिविल सोसाइटी की अहमियत राजनीतिक दलों से ऊपर है। अन्य देशों में इसे प्रेशर ग्रुप के नाम से लोकतंत्र का सबसे प्रभावशाली टूल माना गया है। राजनीतिक दल अपनी नीतियां घोषित करते हैं तथा सरकार मिलने पर उन नीतियों को लागू करते हैं, जबकि नागरिक समितियां सभी सरकारों पर अंकुश की तरह कार्य करती हैं तथा समयानुकूल सुझाव भी देती हैं। महात्मा गांधी, आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये आदि ऐसे राजनेता हुए जो सीधे राजनीति में रहते हुए भी कभी सरकार से नहीं जुड़े। उन्होंने सक्रिय राजनीति में रहते हुए सुझाव और आलोचना तक अपने को सीमित रखा। सरकारें जब बहरी होकर पक्षपातपूर्ण काम करती हैं तब ऐसे राजनेता तथा नागरिक समितियां जनता के बीच जाकर आइना दिखा, सरकार को चेताया करती हैं।
इसी विचारधारा के अंतर्गत गांधी जी ने स्वयं के शिष्यों की सरकार की आलोचना की। डॉ. लोहिया ने केरल में अपनी पार्टी की सरकार से इस्तीफा मांगा। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 1977 में जनता पार्टी की छीना-छपटी के खिलाफ खुलकर नाराजगी दिखाई। इससे भी अधिक आचार्य नरेन्द्र देव को नेहरू जी ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का निवेदन किया तो उन्होंने अस्वीकार करते हुए कह दिया कि जहां काम करने का माहौल न हो तो मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे। कैलाश नाथ काटजू ने मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का नेहरू जी का अनुरोध अस्वीकार कर दिया था तब तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने मुश्किल से कैलाश नाथ काटजू को राजी किया था। भारत के लोकतंत्र को विश्व में ऐसी ही कारणों से महान माना जाता रहा है।
राजनीति वह नहीं है जो पत्ते पर रख कर चाटी जाये। जिन बातों को कक्षा में विद्यार्थियों को पढ़ाया जाना चाहिए, उन बातों को उपरोक्त नेताओं के दलों के नामधारी उत्तराधिकारी अपने ही कार्यकर्ताओं से छिपाते हैं।
ऐसा नहीं कि वर्तमान के बड़े नेता इन बातों को नहीं जानते। यदि नहीं जानते तो छुपाते क्यों ? छिपाने की बात इसलिए भी कि हर दल के नागरिक समितियों को अपने दल के प्रकोष्ठों में तब्दील कर दिया और बता दिया है कि उन्हें केवल पार्टी का झुनझुना बजाना है, चाहे बिना ताल के बजाए, इससे लोकतंत्र कमजोर होता है।
गांधी ने कांग्रेस से अलग भी नागरिक समितियों को स्वतंत्रता आन्दोलन की ओर आकर्षित किया। वकील, टीचर, छात्र, किसान एवं सरकारी सेवक आदि जहां थे, छोड़ कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। डॉ. लोहिया ने पार्टी से अलग किसान संगठन को मजबूत कर कांग्रेसी सरकार के खिलाफ आबपाशी (सिंचाई शुल्क) नहीं देने का आंदोलन सिविल नाफरमानी की हद तक चलाया। याद कीजिए, गांधी का चंपारण आंदोलन कांग्रेस का आंदोलन नहीं था। डॉ. लोहिया के प्रयासों से छठे दशक में उत्तर प्रदेश में छात्र संगठन इतिहास के सबसे मजबूत दौर में रहे। नये नेताओं को खासतौर पर छात्र राजनीति की हुंकार जब भरते हैं, उन्हें श्री श्याम कृष्ण पांडेय के छात्र आंदोलन के इतिहास के दोनों खंडों को अवश्य पढ़ना चाहिए। राजनीति करें तो ज्ञान और बौद्धिकता पूर्ण होनी चाहिए। जार्ज फर्नांडीज ने सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख राष्ट्रीय नेता रहते हुए एशिया का सबसे बड़ा, श्रमिक संगठन खड़ा कर दिया, परंतु यह श्रमिक संगठन सोशलिस्ट पार्टी का पिछलग्गू नहीं था।
भारत की राजनीति में ऐसे सुनहरे उदाहरण भरे पड़े हैं फिर भी राजनीति गंदी कहलाती है क्यों?
आम आदमी बाजार, दुकान, शादी-ब्याह या अन्य बैठकों में नाक और होंठ भींच कर राजनीति पर लानत मार रहा है। महिलाएं खेत से लेकर किट्टी पार्टी तक राजनीति को नाले की तरह गंदा बता रही हैं। किंतु राजनीति तो गंगा की तरह पवित्र है जो हमारी दिनचर्या में नित्य सुधार के नियम बनाती है।
गंगा अपने उद्गम पर गंदी नहीं है। नीचे उतर कर उसमें नहाने वालों ने अपना मल छोड़ दिया है। कारखानों ने उसे गटर समझ निकासी का पाइप उसमें डाल दिया है और अवसरवादियों ने अवसर देख इसकी सफाई के बजट साफ कर दिए हैं। यही हाल राजनीति का है।
135 करोड़ की आबादी में कुछ तो होंगे जो राजनीति को चाट का पत्ता न समझ केवल राजनीति के लिए उतरना चाहेंगे। पद, प्रतिष्ठा, धन न मिले वही राजनीति करनी है। मंत्री बनने से बेहतर है पथ प्रदर्शक बनें।
भारत का इतिहास महानता के किस्सों से भरा पड़ा है। इन पर पूर्ण विराम नहीं लगने देना है। यह क्रम जारी रहे और आगे का इतिहास बने।
(गोपाल अग्रवाल समाजवादी चिंतक हैं। )





