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उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की तीसरी बरसी पर…..पीछे बचे बुजुर्ग मां-बाप, बेवा बीवियों और अनाथ बच्चों के सवाल

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तारिक अनवर

‘26 फरवरी 2020 का दिन था, 30 साल के आमिर खान और 19 साल का हाशिम अली यूपी से दिल्ली के पुराने मुस्तफाबाद अपने घर लौट रहे थे। 23 फरवरी से ही इलाके में दंगा भड़का हुआ था। शाम के 5 बजे घर पहुंचने से ठीक पहले ही उन्हें एक भीड़ ने घेर लिया। नंगा किया और पीट-पीटकर मार डाला। लाशों को उनकी बाइक समेत जलाया और पास ही नाले में फेंक दिया।’ हाशिम और आमिर के पिता बाबू खान ये बताते हुए फूट-फूट कर रो देते हैं। पूछते हैं, हमारी किस से क्या दुश्मनी थी? मेरे जवान बच्चों को क्यों मार डाला?

ये कोई अकेली कहानी नहीं है। कॉन्स्टेबल रतन लाल पथराव में फंसे, गोली लगी और मारे गए। मां, दो भाई, पत्नी और तीन बच्चे घर में इंतजार करते रह गए। 25 फरवरी को वीरभान खाना खाने घर लौट रहे थे। शिव विहार चौक पर भीड़ ने घेर लिया। फिर घरवालों को लाश मिली। उनके पीछे पत्नी और तीन बच्चे बचे। 25 फरवरी को ही 23 साल का महताब दूध लेने निकला, भीड़ ने उसे घेरकर जिंदा जला दिया।

25 फरवरी को ही भीड़ ने शाहिद को ऑटो से बाहर खींचा, पीटा और पेट में 2 गोली मार दीं। 24 साल के अशफाक का किसी ने दंगों में गला काट दिया था। विनोद कुमार को भी भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया था। हालात ये थे कि 85 साल की अकबरी को भी दंगाइयों ने नहीं बख्शा, उन्हें जिंदा जला दिया गया। अंकित शर्मा, दीपक और मोहम्मद फुरकान को समेट लें तो, दिल्ली दंगों में कत्ल और मौत की ऐसी 53 कहानियां हैं। दंगों को 3 साल गुजर चुके हैं, कुछ आरोपी जेल में हैं, कुछ जमानत पर बाहर हैं और कुछ बरी हो चुके हैं।

ऐसा कोई दिन नहीं जब मैं अपने बेटों को याद नहीं करता

पुलिस का दावा है कि 19 दिसंबर से ही जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट शरजील इमाम ने इन दंगों की प्लानिंग शुरू कर दी थी। CAA का विरोध कर रहे संगठनों का आरोप है कि 23 फरवरी की रात उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में बीजेपी नेता कपिल मिश्र ने भड़काऊ भाषण दिए जिसके बाद हिंसा भड़की। दिल्ली के जिन इलाकों में ये हिंसा भड़की थी वहां तीन साल बाद अब हालत सामान्य नजर आते हैं।

हालांकि, ऐसे ढेरों घर-परिवार हैं जिनकी 23 से 26 फरवरी 2020 के बीच हुई घटनाओं के बाद जिंदगी बदल गई। घर, परिवार, बिजनेस तबाह हुए। औरतें बेवा हुईं, बच्चे अनाथ हुए और बूढ़े मां-बाप ने अपने जवान बच्चों के जनाजों-अर्थियों को कंधा दिया। मुस्तफाबाद के बाबू खान आज भी अपने दोनों बेटों आमिर और हाशिम का नाम आते ही बिलखने लगते हैं। जब से उन्होंने अपने दोनों बेटों की लाशें देखीं वे सदमे में हैं। लगातार बीमार रहते हैं।

मैं कुछ हिचकते हुए उनसे सवाल करती हूं, तो वे आंखों में आंसू लिए कहते हैं- ‘जिंदगी में अब बचा ही क्या है, बस गुजर रही है। बस दम ही नहीं निकल रहा है। ऐसा कोई दिन नहीं जब मैं अपने बच्चों को याद नहीं करता। इस सदमे से कैसे उबर सकते हैं, समझ नहीं आता।’ बाबू खान ये कहते हुए बार-बार अपने खाली घर की तरफ देखते रहते हैं। फिर कुछ याद करते हुए कहते हैं- ‘मुझे हार्ट अटैक पड़ा था। मेरे बेटे ने मुझे बचाया। तुरंत कार में मुझे अस्पताल ले गया था। उसकी बदौलत जिंदा हूं।’

बाबू खान कुछ देर चुप रहते हैं, फिर कहते हैं- ‘जब से दंगे हुए, दोनों बच्चे चले गए, तभी से बीमार हूं। मेरे दो जवान बच्चों को नफरत के नाम पर मार दिया गया। काम-धंधा नहीं चल रहा है, रोजी रोटी के लिए परेशान हूं। हम मजदूर आदमी हैं, तबीयत सही रही तो काम कर लिया, नहीं तो भूखे पड़े रहो। घर में जो कमाने वाले थे, वो नफरत करने वालों ने छीन लिए।’

केजरीवाल सरकार के दिए मुआवजे का क्या हुआ…

दिल्ली सरकार ने दंगे में मारे गए लोगों के परिवार को दस-दस लाख रुपए की मदद दी थी। लेकिन, बाबू कहते हैं कि ये मदद नाकाफी है। बाबू खान कहते हैं, ‘जब दंगा हुआ था तब सरकार ने दस लाख रुपए की मदद दी थी। हमें मदद से ज्यादा इंसाफ चाहिए। जिन लोगों ने हमारे बच्चों का कत्ल किया उन्हें सजा मिलनी चाहिए। हमारे बेटों को तो बेवजह मार दिया गया। उन्हें घात लगाकर, पहचान करके मारा गया।’

बाबू खान आगे कहते हैं, ‘मेरी तीन बेटियां हैं, जिनमें से दो की शादी हो गई, एक की रह गई है। मुआवजे में से क्या ही बचता। एक भाई एक्सीडेंट में मर गया, तीन बेटियां वो छोड़ गया है। मेरे बड़े बेटे आमिर को दंगे ने मार दिया, तीन बेटियां उसकी भी हैं। अब ऊपर वाला ही मालिक है, उसके आगे ही रोना है। जो हालात चल रहे हैं उनमें सुनने वाला तो कोई है ही नहीं। सरकार गूंगी-बहरी है। उम्मीद है कि इंसाफ होगा। हमें तो सब्र करना सिखाया गया है, हम ये मानते हैं कि अगर यहां इंसाफ नहीं होगा तो अल्लाह के घर होगा। जो इन लोगों ने किया है, आज नहीं तो कल उन्हें सजा मिलेगी।’

आमिर और हाशिम की हत्या के मामले में दिल्ली पुलिस ने 20 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। पुलिस ने अपनी चार्जशीट में दावा किया था कि हत्या करने वाले युवक एक व्हाट्सग्रुप का हिस्सा थे और हत्या के बाद उस ग्रुप में मुसलमानों को मारने की डींगे हांकते हुए संदेश भी भेजे गए थे। पुलिस ने इस मामले में शुरुआत में 11 लोगों को गिरफ्तार किया था।

दुकान पहुंचा तो उसकी लाश देखी, हाथ-पैर तक काटकर ले गए थे

दिल्ली दंगे में 13 हिंदू भी मारे गए थे। इन्हीं में से एक थे उत्तराखंड के रहने वाले 22 साल के दिलबर नेगी। दिलबर दिल्ली के शिव विहार तिराहा इलाके में एक मिठाई की दुकान पर हेल्पर थे। 27 फरवरी को उसी मिठाई की दुकान में उनकी लाश मिली थी।

दुकान के मालिक अमित उस दिन को याद करके आज भी कांपने लगते हैं। कहते हैं- ‘ मैं दुकान में घुसा तो वो जल चुकी थी। 27 फरवरी का दिन था, मैं यहां पुलिस के साथ पहुंचा था। सामने उसकी लाश थी। कैसे लोग थे, लाश के हाथ-पैर तक काटकर ले गए थे, सिर्फ धड़ मिला था। काफी देर बाद पहचान पाए कि ये दिलबर नेगी ही है। 24 फरवरी को जब दुकान पर हमला हुआ तो दिलबर दुकान के ऊपर रेस्टरूम में आराम कर रहा था।’ अमित ये बताते हुए घृणा से भर जाते हैं। कहते हैं- ‘लाश की हालत याद आती है तो गुस्सा भी आता है और शर्म भी। हालत ऐसी थी कि परिवार को भी नहीं दिखा सके।’ मैं पूछती हूं, परिवार अब कहां है? अमित कहते हैं- ‘दिलबर नेगी का परिवार अब उत्तराखंड में रहता है। दिल्ली सरकार ने उनके परिवार को दस लाख रुपए दिए थे।’

अमित की मिठाई की दुकान में दिलबर नेगी काम करते थे। इसी दुकान में उनकी लाश मिली थी।

अमित आगे कहते हैं, ‘उत्तराखंड सरकार ने भी उनकी मदद की थी। हमारे जान-पहचान वाले लोगों ने भी परिवार की आर्थिक मदद की। 5-7 लाख रुपए उन्होंने भी दिए। इसके अलावा बजरंग दल और हिंदू संगठनों ने भी मदद की है।’ दिलबर नेगी की हत्या के मामले में गिरफ्तार छह दंगाइयों को अदालत ने जनवरी 2022 में जमानत दे दी थी। जमानत देते हुए जज ने कहा था कि अभियुक्तों के खिलाफ दिल्ली पुलिस सबूत नहीं पेश कर सकी।

अमित ने दुकान फिर से खोल ली है और अब भी उनके पास उत्तराखंड के कई कारीगर काम करते हैं। अमित कहते हैं, ‘दहशत सभी लोगों में थी, अब माहौल काफी बदल गया है। लोगों की सोच भी बदली है। 2020 के बाद माहौल कुछ तो बदला है लेकिन लोगों के जेहन में वो सोच अब भी है।’

वो तो चले गए, मैं तीन बच्चों को अकेले पाल रही हूं

न्यू मुस्तफाबाद के शक्ति विहार इलाके में रहने वाले आस मोहम्मद भी 25 फरवरी की शाम घर से बीड़ी लेने के लिए निकले। कुछ दिन बाद उनकी लाश दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में लावारिस हालत में मिली। पुलिस ने आस मोहम्मद की लाश जोहरीपुर-भागीरथी विहार पुलिया के नाले से बरामद की थी। यहां कम से कम आठ लोगों को बेरहमी से मारा गया था जिनकी लाशें नाले से मिली थीं।

आस मोहम्मद की पत्नी सायबा अब अकेले ही उनके तीन बच्चों को पाल रही हैं। एक छोटा सा कमरा है जिसमें मां और तीन बच्चे जिंदगी बिता रहे हैं। आंखों में आंसू लिए सायबा कहती हैं, ‘मैं अपने बच्चों की जिम्मेदारी भी ठीक से नहीं उठा पा रही हूं। जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। जब वो थे, तब वो सारी जिम्मेदारी संभालते थे। अब सब मुझे अकेले करना पड़ता है। मुझसे ये सब नहीं हो पा रहा।’

आस मोहम्मद की मौत के बाद दिल्ली सरकार ने उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने का वादा किया था। लेकिन, ये वादा पूरा नहीं हो सका। सायबा कहती हैं- ‘किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके बच्चों की फीस भर रही हूं और पेट पाल रही हूं। मेरी छोटी बेटी गूंगी-बहरी है, सरकार ने कोई मदद नहीं की। हमारे साथ जो हुआ, हमारा घर बर्बाद हुआ, उसकी जिम्मेदार भी सरकार ही है। ज्यादा नहीं मेरे बच्चों का ख्याल तो रख ही सकते हैं।’

आस मोहम्मद की लाश की फोटो अपने फोन में दिखातीं सायबा।

आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा को भी दिल्ली दंगों के दौरान बेरहमी से मार दिया गया था। अंकित के परिवार को दिल्ली सरकार ने एक करोड़ रुपए की मदद दी थी। एक सरकारी नौकरी भी परिवार को दी गई है।

IB अफसर अंकित शर्मा की हत्या और सवाल

दिल्ली दंगों में आईबी के अधिकारी अंकित शर्मा भी 25 फरवरी को शहीद हुए थे। दंगों के दौरान दिल्ली के चांदबाग इलाके में अंकित शर्मा को चाकूओं से गोदकर नाले में फेंक दिया गया था। दिल्ली पुलिस ने अंकित की हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी के पार्षद रहे ताहिर हुसैन, उनके भाई और तीन अन्य लोगों को गिरफ्तार किया था। बाद में 11 अक्टूबर 2022 को हत्या के मामले में मुख्य अभियुक्त मुंतजिम मूसा भी तेलंगाना से गिरफ्तार किया गया।

अंकित का परिवार अब दिल्ली छोड़कर गाजियाबाद शिफ्ट हो चुका है। अंकित के छोटे भाई अंकुर के मुताबिक- ‘वहां लोग बार-बार अंकित और उसकी हत्या का जिक्र करते थे। मां-पिता अब बूढ़े हो चुके हैं और ये सुन-सुनकर वे बीमार रहने लगे थे। इसलिए गाजियाबाद आ गए। फास्ट ट्रैक में लाकर दंगे के दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए. अभी केस स्लो चल रहा है।’

इस मामले में आरोपी ताहिर हुसैन 2017 के MCD चुनाव में AAP के टिकट पर जीता था। दिल्ली दंगों में नाम आने के बाद MCD ने 20 अगस्त 2020 को ताहिर की सदस्यता खत्म कर दी थी। अंकित शर्मा की हत्या में भी ताहिर हुसैन का नाम सामने आया है। पुलिस के मुताबिक ताहिर हुसैन ने अपने कबूलनामे में बताया कि कश्मीर में धारा-370 हटने के बाद खालिद सैफी मेरे पास आया और दोनों ने कुछ बड़ा कांड करने का प्लान किया।

पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक ताहिर हुसैन ने कहा, ‘PFI के दफ्तर में हमने प्लान बनाया कि दिल्ली में कुछ ऐसा करेंगे की यह सरकार हिल जाए और सरकार CAA विरोधी कानून वापस लेने को मजबूर हो जाए।’ ताहिर ने दिल्ली दंगों में पैसों से लेकर बम, गोली, बारूद,पेट्रोल, शीशे आदि सामान इकट्ठा करने में मदद दी थी। जिस भीड़ की ताहिर ने मदद की उन्हीं ने अंकित की हत्या की थी।

दंगों पर कई रिपोर्ट्स सामने आईं, पुलिस-नेता सब पर आरोप लगे

फरवरी 2022 तक दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में दिल्ली पुलिस ने 2450 लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें से 798 हिंदू थे और 812 मुसलमान थे। दिल्ली दंगों के बाद अलग-अलग स्वतंत्र नागरिक समूहों और पैनलों ने अपनी जांच रिपोर्ट पेश की थी।

‘अनसर्टेन जस्टिस:’ ए सिटीजन्स कमिटी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दिल्ली में दंगा जान बूझकर खराब किए गए माहौल, खासकर मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत की वजह से हुआ था। पूर्व जजों के समूह की इस रिपोर्ट में दावा किया गया था दिल्ली पुलिस हिंसा रोकने में नाकाम रही थी। इस रिपोर्ट में ये दावा भी किया गया था कई घटनाओं में पुलिस कई स्तर पर शामिल थी। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया था कि गृह मंत्रालय के पास अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजने का विकल्प था लेकिन हिंसा के शुरुआती दौर में ये कदम नहीं उठाया गया। अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा जैसे बीजेपी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई।

एक अन्य रिपोर्ट, दिल्ली रायट्स-2020 रिपोर्ट फ्राम ग्राउंड जीरो में दावा किया गया था कि दिल्ली दंगे वामपंथी-जिहादी क्रांति के मॉडल के तहत सुनियोजित साजिश थे। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अर्बन नक्सल जिहादी नेटवर्क दंगों के पीछे थे। हिंदुत्व-वादी संगठन वामपंथी और इस्लामी झुकाव वाले कार्यकर्ताओं के लिए इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।

इस रिपोर्ट में ये दावा किया गया था कि मुसलमानों में लंबे समय से कट्टरवादी सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसकी वजह से ये दंगे हुए। रिपोर्ट में इन दंगों को हिंदुओं पर सुनियोजित हमला बताया गया था। केंद्र सरकार ने जनवरी 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट में दिए हलफनामे में इन रिपोर्टों को पक्षपातपूर्ण और एजेंडे के तहत तैयार किया हुआ बताते हुए खारिज कर दिया था।

इन रिपोर्ट्स को खारिज करना गलत: हर्ष मंदर

वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर मानते हैं कि इस तरह की स्वतंत्र जांच रिपोर्ट नाइंसाफी को उजागर करने के लिए अहम होती हैं। हर्ष मंदर कहते हैं, ‘इन रिपोर्ट्स का काफी महत्व होता है। समाज में जब लोग नाइंसाफी महसूस करते हैं तो जरूरी हो जाता है कि समाज के लोग निष्पक्ष और स्वतंत्र तौर पर सच सबके सामने लाए। दिल्ली के दंगों पर एक सिटिजन रिपोर्ट बनी है, इसे जस्टिस मदन लोकुर जैसे जजों ने तैयार किया है। एक अन्य रिपोर्ट वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रोदय सिंह की अध्यक्षता में बनीं हैं। एक अधिकारिक रिपोर्ट भी है जो दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की अध्यक्षता में बनी हैं।’

हर्ष मंदर कहते हैं, “इन सभी रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पुलिस ने कार्रवाई करने में देरी की। दिल्ली पुलिस के पास हर तरह के संसाधन हैं, बावजूद इसके तीन दिन तक दंगा होता रहा। पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं। रिलीफ और रिहेबिलिटेशन के काम में भी पक्षपात के आरोप लगे हैं। सरकार ने इसी गंभीरता से लिया है। ये हमारी लोकतांत्रिक कमी रही है।’

वरिष्ठ वकील महमूद प्राचा दंगों में मारे गए कई मुसलमानों के परिवारों की तरफ से मुकदमों की पैरवी कर रहे हैं। महमूद प्राचा भी दिल्ली पुलिस पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं। महमूद प्राचा कहते हैं, ‘हमारे पास ऐसे कई पीड़ित हैं जिन्होंने आरोप लगाया है कि कपिल मिश्रा और बीजेपी नेताओं ने साजिश करके हमले कराए। हम ये मानते हैं कि ये दंगा नहीं था बल्कि हमले थे। हम ये भी मानते हैं कि पुलिस ने पक्षपात से काम किया। मुस्लिम पक्ष को डराया-धमकाया गया और शिकायतें तक नहीं ली गईं।’

प्राचा आगे कहते हैं, ‘सरकारी वकीलों की जगह दिल्ली पुलिस ने अपनी पसंद के वकीलों को रखा। ये एक तरह से पक्षपात है। सरकारी वकीलों की एसोसिएशन ने एक जनहित याचिका भी इसके खिलाफ दायर की है। एक के बाद एक जज बदले गए। जिन्होंने सही फैसले देने की कोशिश की उनके तबादले भी किए गए। नासिर के मामले में जज रिचामंद चंदा और जज विनोद यादव ने पुलिस पर पक्षपात पूर्ण जांच का आरोप भी लगाया और बीस हजार रुपए का जुर्माना लगाया।’

दिल्ली पुलिस ने बार-बार अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। दिल्ली पुलिस कहती रही है कि उसने बिना किसी पक्षपात या भेदभाव के अपनी जांच की है। मैंने भी दिल्ली पुलिस का पक्ष जानने के लिए DCP नॉर्थ-ईस्ट को कई बार फोन किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। महमूद प्राचा से बात करने के बाद मैंने अदालत में हिंदुओं का पक्ष रखने वाले वकील अमित प्रसाद को भी फोन किया लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर बात करने से इनकार कर दिया।

मैं लौटने लगती हूं तो कानों में बाबू खान, सायबा और उनके बच्चों और अंकित के भाई अंकुर के सवाल गूंजने लगते हैं। दंगे हुए, लोग मरे और घर बर्बाद हुए। लेकिन, बचे हुए लोगों की गुहार कौन सुनेगा?

विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान 23 फरवरी, 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। दंगे के उपरांत “उकसाने” के आरोप में लगभग तीन साल से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों के परिवारों के लिए  मीडिया से बात करना केवल ‘अन्यायपूर्ण’ व्यवस्था के खिलाफ अपना गुस्सा ज़ाहिर करने का ज़रिया बन रहा है ।

हिंसा की तीसरी बरसी पर, न्यूज़क्लिक ने हिंसा के पीड़ितों और ‘Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA)’ के तहत आरोपित कैदियों के परिवारों से संपर्क किया। ये परिवार न केवल सरकार से नाराज़ हैं, जिसने कथित तौर पर कानूनों और मानदंडों का पालन नहीं किया, बल्कि मीडिया से भी नाराज़ है जिन्होंने उनके खिलाफ ‘नफरती प्रचार’ भी किया और उत्पीड़ितों को ‘उत्पीड़कों’ और पीड़ितों को ‘अपराधियों’ के रूप में पेश किया।

इस हिंसा की जांच में सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकी (FIR) (59/2020) में “व्यापक साज़िश” के लिए UAPA और भारतीय दंड संहिता (IPC) की अन्य कठोर धाराओं के तहत 18 लोगों पर आरोप लगाए गए थे। इनमें एक्टविस्ट उमर खालिद, शरजील इमाम, मीरान हैदर, आसिफ इकबाल तन्हा, सफूरा जरगर, गुलफिशा फातिमा, अतहर खान, शादाब अहमद, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, शिफा-उर-रहमान, राजनेता इशरत जहां और ताहिर हुसैन, व्यवसायी सलीम खान शामिल हैं। इसके अलावा चार अन्य लोग भी हैं। (जिन्होंने UAPA लगने से पहले ही ज़मानत हासिल कर ली थी)। पांच आरोपियों (जरगर, जहां, नरवाल, कलिता और तन्हा) को भी ज़मानत मिल गई। जबकि अन्य 9 लोग आज भी UAPA के तहत जेल में बंद हैं। पुलिस ने इस पूरे मामले मे आरोप पत्र दाखिल कर दिया है और अभी ये पूरा मामला कोर्ट मे चल रहा है।

कई आरोपियों के परिवार के सदस्यों ने जेल में यातना, उत्पीड़न और चिकित्सा न उपलब्ध कराने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून का “दुरुपयोग” है और ये उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है जो हाल ही में देश के राजनीतिक परिदृश्य में उभरा है।

आपको बता दें, ये हिंसा 27 फरवरी तक जारी रही जिसमें 53 लोग मारे गए, 700 से अधिक घायल हुए और लाखों की संपत्ति नष्ट हो गई। यह हिंसा कथित तौर पर भाजपा नेता कपिल मिश्रा द्वारा सीएए प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लोगों को भड़काने के बाद शुरू हुई। यह घटना तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत की पहली यात्रा के दौरान हुई।

हम आपके लिए कम से कम चार ऐसे अनजान चेहरों की कहानियां लेकर आए हैं, जिन्होंने मुश्किल ही मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।

“सर्दी बीत चुकी, अतहर को अभी तक गर्म पानी नहीं मिला है”

UAPA के तहत चांद बाग के 27 वर्षीय अतहर खान ढाई साल से जेल में बंद है और वो बवासीर (Piles) से पीड़ित हैं। उनके परिवार ने पिछले नवंबर में ट्रायल कोर्ट में एक आवेदन दिया था जिसमें उनके गुदा को आराम देने, दर्द, खुजली और जलन को कम करने के लिए गर्म पानी देने का अनुरोध किया गया था।

याचिकाकर्ता को विस्तार से सुनने के बाद भी कोर्ट ने अभी तक कोई फैसला नहीं सुनाया है।

अतहर खान के माता-पिता अफजल खान और उनकी पत्नी नूरजहां

उसके पिता अफजल खान(54) का कहना है, “एक जोड़ी जूते जेल में भेजने में तीन महीने लग गए। जेल में विचाराधीन कैदी को इस तरह से शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी जाती है।”

हिंसा में बेटे की कथित भूमिका के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, “अपना बचाव करने वाले लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। यह अन्याय है। अगर कोई मुझ पर हमला करता है, तो मैं कम से कम हमलावर को रोकूंगा। उन्होंने (हिंसक भीड़ ने) हमें मारने के लिए हमारे इलाकों पर हमला किया। हमने केवल उन्हें शारीरिक नुकसान पहुंचाने से रोका। क्या आत्मरक्षा अपराध है?”

शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए ऑन-कैमरा भीड़ को उकसाने वाले मिश्रा, रागिनी तिवारी और अन्य का नाम लिए बिना अफजल कहते हैं, “हर कोई हमलावरों को जानता था, लेकिन उन्हें आजतक कुछ नहीं हुआ।”

यह दावा करते हुए कि सभी आरोपी ‘निर्दोष’ हैं और उन पर लगाए गए आरोप ‘निराधार’ हैं, उनका मानना है कि वे सभी ‘बेगुनाह वापस आएंगे’। उन्होंने कहा, “शांतिपूर्ण विरोध हर किसी का संवैधानिक अधिकार है और मेरा बेटा व अन्य लोग इसका इस्तेमाल कर रहे थे।”

गिरफ्तारी के समय बीबीए अंतिम वर्ष का छात्र अतहर आम आदमी पार्टी (आप) का कार्यकर्ता था। उन्होंने कपिल मिश्रा के लिए काम भी किया था जब मिश्रा ने आप के टिकट पर करावल नगर से दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा था।

मिश्रा, जिन्हें मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2017 में भ्रष्टाचार को लेकर जल संसाधन मंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया था, वे बाद में 2019 में भाजपा में शामिल हो गए। कपिल मिश्रा ने अतहर की एक पुरानी तस्वीर साझा की थी जिसमें उन्हें दंगों के “मास्टरमाइंड” के रूप में बताया गया।

अतहर के परिवार के लिए पिछले कुछ साल बहुत कठिन रहे हैं, विशेष रूप से अतहर की मां नूरजहां (50) के लिए, जो हर दिन इस उम्मीद में बिताती हैं कि उनके बेटे को एक या दो महीने में रिहा कर दिया जाएगा।

वह घुटी हुई आवाज़ में कहती हैं, “लेकिन उम्मीद अब कम हो रही है क्योंकि उसे एक के बाद एक अदालत की तारीखें मिल रही हैं….मैंने अपने बेटे को पिछले ढाई साल में बमुश्किल देखा है, बस अदालत के गलियारे में अचानक सुनवाई के दौरान जब पुलिस उसे घसीट रही होती है, तब मैं उससे एक या दो मिनट दूर से ही बात कर लेती हूं।”

सभी आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं और हर 14 दिनों के बाद अदालत लाए जाते हैं। वो कहती है, “अतहर की झलक मेरे दिल को ठंडक पहुंचाती है। काश वह मेरे साथ रहता और वापस कभी जेल नहीं जाता। मुझे उसे देखकर बेहद खुशी होती है लेकिन जब वह चला जाता है तो उतना ही दुखी हो जाती हूं।” व्याकुल मां कहती हैं कि वो अपने आप को ज़िंदा रखने के लिए संघर्ष कर रही है।

वो बताती हैं , “पहले हम उससे (अतहर से) फोन पर रोज़ाना पांच मिनट बात करते थे, लेकिन कॉलिंग सुविधा पिछले नवंबर में बंद कर दी गई। अदालत के आदेश के बाद इसे 30 जनवरी से सप्ताह में तीन दिन के लिए फिर से शुरू किया गया है।” हालांकि अतहर को सप्ताह में दो बार वीडियो कॉल की अनुमति है, लेकिन उसके परिवार का आरोप है कि खराब नेटवर्क के कारण केवल एक बार ही वीडियो कॉल हो पाती है।

“एक मां के लिए अपने बच्चे के बिना एक दिन भी बिताना मुश्किल होता है। हम उसे हर पल याद करते हैं। मैं उसके सभी सामानों की देखभाल करती हूं और उसकी वापसी की उम्मीद में रोज़ाना उसकी पसंद का खाना बनाने के बारे में सोचती हूं। मैं उसके आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही हूं।” वह आगे कहती हैं कि, “वह इतनी लंबी कैद का हकदार नहीं क्योंकि उसने कोई अपराध नहीं किया है।”

वह बताती हैं, “लगभग तीन साल सलाखों के पीछे बिताने और सत्र अदालत द्वारा ज़मानत ख़ारिज करने के बाद भी, अतहर ‘बहुत मजबूत’ है। वह हमेशा मुस्कुराते हुए बात करता हैं। जब वह मुझसे चिंता न करने के लिए कहता है तो यह मुझे ‘साहस’ देता है। वह अपनी दिनचर्या हमसे साझा करता है, जिसमें तनाव से बचने के लिए वॉलीबॉल खेलना भी शामिल है। वह अपनी ‘तकलीफ’ का ज़िक्र नहीं करता है, शायद वह नहीं चाहता कि मैं परेशान हो जाऊं। वह अपने भाई-बहनों और उनकी पढ़ाई के बारे में भी पूछता है।”

यह पूछे जाने पर कि जब वह उन्हें सबसे ज़्यादा याद करती हैं तो खुद को कैसे काबू कर पाती हैं, उनके चेहरे पर आंसू आ जाते हैं, वह कहती हैं, “सब्र रखा है और इस इम्तेहान के खत्म होने का इंतज़ार करने के अलावा, मैं और क्या कर सकती हूं?”

पुलिस के दावे के विपरीत कि उसे घर से गिरफ्तार किया गया था, उसके परिवार का कहना है कि अतहर को 2 जुलाई, 2020 को पूछताछ के लिए बुलाया गया और हिरासत में ले लिया गया।

उन्होंने आरोप लगाया, “अतहर को 1 जुलाई की शाम को पुलिस का फोन आया। वह अगली सुबह थाने गया। दो से तीन घंटे के बाद, पुलिस ने हमें उसकी गिरफ्तारी की सूचना दी।”

अतहर की क़ैद से उसके परिवार को आर्थिक समस्याएँ पैदा हो गई हैं। वह चार भाई-बहनों में सबसे बड़ा है और वह पढ़ाई के साथ-साथ मसालों के कारोबार से परिवार की इनकम में भी योगदान दे रहा था। लेकिन उसकी गिरफ्तारी के बाद, उनका व्यवसाय चौपट हो गया और पिता के व्यवसाय पर भी असर पड़ा।

मुस्कराते हुए अफजल ने कहा, “मेरे ज़्यादातर ग्राहक हिंदू थे, जिनमे से एक आधा को छोड़कर सभी ने मुझसे बात करना बंद कर दिया। व्यावसायिक संबंधों के बारे में तो भूल ही जाइए, उन्होंने मुझसे बात करना भी बंद कर दिया है। लोग हमारे साथ बातचीत करने से डरते हैं क्योंकि हमारे  परिवार को पुलिस द्वारा ‘टारगेट और ब्रांडेड’ किया गया है।”

दिल्ली की एक अदालत ने 13 अक्टूबर, 2022 को कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के साथ अतहर की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी, जिसमें कहा गया था कि चार्जशीट और संलग्न दस्तावेजों के आधार पर उनके खिलाफ आरोप, “प्रथम दृष्टया सच” हैं।

संरक्षित गवाहों का हवाला देते हुए, अभियोजन पक्ष ने चार्जशीट में आरोप लगाया कि अतहर दंगों के प्रमुख ‘षड्यंत्रकारियों’ में से एक था, जिसने दिल्ली को ‘जलाने’ के लिए लोगों को ‘उकसाया’ और वो डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता राहुल रॉय के संपर्क में था, जिसने उसे ट्रांस यमुना क्षेत्र में हिंसा को अंजाम देने के लिए ‘तैयारियों’ से अवगत कराया।

अपने आरोपों का समर्थन करते हुए (कि अतहर भड़काऊ भाषण दे रहा था), अभियोजन पक्ष हेड कांस्टेबल सुनील, कांस्टेबल ज्ञान और सुनील और दो स्वतंत्र गवाह गोल्ड और वेणु जैसे कुछ गवाहों के कथित बयानों पर निर्भर था।

हालांकि, वीडियो में आरोपी भड़काऊ भाषण दे रहे हैं। अभियोजन पक्ष ने ऐसा कोई वीडियो या सीसीटीवी फुटेज भी पेश नहीं किया है, जिसमें अतहर को हमला करते हुए या किसी हथियार को ले जाते हुए या किसी आतंकवादी गतिविधि के प्रति कोई संदेह पैदा करने वाली हरकत करते हुए देखा जा सके।

चार्जशीट के अनुसार, यह तर्क भी दिया गया था कि अतहर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मौजूद था, और “षड्यंत्र” का हिस्सा था। चार्जशीट पर लगे आरोपों का जवाब देते हुए जांचकर्ताओं ने अदालत से कहा, “यह ज़रूरी नहीं है कि किसी साज़िश के मामले में प्रत्येक आरोपी साज़िश के हर पहलू में शामिल हो।”

वर्तमान मे न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और रजनीश भटनागर की विशेष पीठ के समक्ष अतहर की ज़मानत याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय (HC) में लंबित है।

‘मेरी बेटी फौलाद है’

जेल में शीशे की दीवार के पीछे अपनी बेटी गुलफिशा फातिमा (30) को देखना (जो जाफराबाद में महिलाओं के चौबीसों घंटे के धरने का नेतृत्व करती थीं), सैयद तस्नीफ हुसैन के लिए सबसे बुरा सपना था। इसलिए उन्होंने उससे मिलना बंद कर दिया है।

गुलफिशा फातिमा के माता-पिता सैयद तस्नीफ हुसैन और उनकी पत्नी शाकरा फातिमा

जाफराबाद की वर्किंग क्लास (कामकाजी वर्ग) बस्ती में रहने वाले तस्नीफ (58), जो अपनी किराने की दुकान से गुज़ारा करते है, वे चाहते थे कि फातिमा हायर एजुकेशन के लिए जाए और अपने सपनों को पूरा करे। उन्होंने कभी भी उस पर शादी करने का दबाव नहीं डाला और इसके बजाय उसे MBA करने दिया और फिर PHD की तैयारी भी करने दी।

हालांकि, अप्रैल 2020 में फातिमा की गिरफ्तारी ने बेहतर जीवन की उसकी तलाश को खत्म कर दिया। तस्नीफ का दावा है कि उनकी बेटी उनके परिवार में सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी है। वे कहते हैं, “मेरे परिवार में उसके अलावा किसी ने मास्टर डिग्री नहीं की है।” उसकी एक चचेरी बहन ने NEET पास करने के बाद अब MBBS में प्रवेश लिया है।

उन्होंने उसे सीएए विरोधी प्रदर्शन में शामिल होने से कभी नहीं रोका क्योंकि वह हमेशा उस पर विश्वास करते थे। वे कहते हैं, “चूंकि उसके पास यह समझने के लिए पर्याप्त जानकारी है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है, मैंने फैसला उस पर छोड़ दिया।”

गौरांवित पिता ने उसकी काबिलियत को एक-एक कर बताना शुरू किया। वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “पढ़ाई के अलावा, वह सिलाई, खाना पकाने और कविता में भी उस्ताद है। वह कभी बेकार नहीं बैठती। यहां तक कि जेल में भी वह लोगों को वैसे ही पढ़ाती हैं जैसे आंदोलन स्थल पर छोटे बच्चों को पढ़ा रही थीं।”

तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी फातिमा की गिरफ्तारी ने उनके(तस्नीफ) डिप्रेशन(अवसाद) और बढ़ा दिया है। हालांकि गिरफ्तारी के पहले से ही वे डिप्रेशन से जूझ रहे थे लेकिन अब उनका शुगर लेवल अक्सर बिगड़ जाता है, और वह अक्सर बेहोश हो जाते हैं। वह दवाओं का एक बंडल दिखाते हुए कहते हैं, “मैं एंटी-डिप्रेसेंट और इंसुलिन की हाई डोज़ पर ज़िंदा हूं। कई बार मेरा दिमाग काम करना बंद कर देता है। मैं पहले से ज़्यादा बेहोश हो जाता हूं।”

तस्नीफ हाल ही में पागलपन के शिकार भी हो गए थे। “मेमोरी लैप्स भी बहुत बार हो गया है। जब भी मैं बाहर निकलता हूं, मैं अक्सर भूल जाता हूं कि मैं क्यों और कहां जा रहा हूं।” उदाहरण के लिए वे बताते हैं कि वे नहटौर, बिजनौर में अपने ससुराल के रास्ते में, घर का पता याद नहीं रख पाए जहां वह पिछले 30 वर्षों से जा रहे हैं। वे कहते है कि सड़क और घर की ओर जाने वाली गलियां मेरी याददाश्त में फीकी पड़ गईं।

वह खुद को संभालते हुए कहते हैं, “कभी-कभी, मैं उसे (गुलफिशन) फिर से देखने की उम्मीद खो देता हूं। मैं नताशा के पिता की तरह ही उसकी रिहाई से पहले मर सकता हूं।”

यह पूछे जाने पर कि तीन साल जेल में रहने के बाद फातिमा कितनी मजबूत हैं, तस्नीफ कहते हैं, “वह फौलाद की तरह है। कम होती उम्मीदों के बीच लगभग तीन साल जेल में बिताने के बाद भी वह कभी परेशान नहीं दिखती हैं। वह एक मुस्कान के साथ हमारा स्वागत करती है और हमें चिंता न करने के लिए कहती है।”

लेकिन साथ ही, माता पिता के लिए अपनी बेटी को जेल में ‘अमानवीय’ स्थितियों में रहते देखना परेशान करता है। ईद और बकरीद उनके लिए उतनी ही नीरस हैं, जितना नमक बिना खाना।

तस्नीफ की पत्नी शाकरा फातिमा का कहना है कि गिरफ्तारी के तीन महीने बाद पहली बार वे फातिमा से बात कर सके थे। “मुझे नहीं पता कि पुलिस रिमांड के दौरान उसके साथ क्या हुआ। न तो हमने उससे पूछा और न ही उसने इसकी चर्चा की।”

यह पूछे जाने पर कि वह फातिमा की ज़मानत अर्जी पर हाईकोर्ट के फैसले को लेकर वे कितनी आशांवित हैं, वह कहती हैं, “इस रात के बाद सुबह कभी तो होगी।”

पिछले मार्च में दंगों को आयोजित करने के लिए “बड़ी साज़िश” के मामले में ट्रायल कोर्ट से अपनी ज़मानत ख़ारिज होने के बाद फातिमा ने आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जिसमें सोमवार को हाई कोर्ट ने कहा, “तर्क सुन लिए गए; आदेश सुरक्षित है।”

राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के प्रति केंद्र सरकार की उदासीनता के परिणामस्वरूप, भारत बंद का आह्वान किया गया था। इसी के तहत जाफराबाद के प्रदर्शनकारियों ने 22 फरवरी की शाम को मुख्य मार्ग को बंद करते हुए, जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर अपना धरना स्थल शिफ्ट कर दिया।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के साथ, कपिल मिश्रा ने 23 फरवरी को मौजपुर के एक चौराहे पर भीड़ का नेतृत्व किया और मुस्लिम विरोधी ज़हर उगलना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को मेट्रो स्टेशन वाली सड़क से बेदखल करने की धमकी दी। उनके जाने के तुरंत बाद, प्रदर्शनकारियों पर पथराव किया गया, जिससे कथित तौर पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा भड़क गई।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, जो इस मामले की जांच कर रही है, उसने फातिमा पर सीएए के बारे में ‘गलत सूचना’ फैलाने के लिए ‘साज़िश’ और ‘योजना’ में लगातार शामिल होने का आरोप लगाया।

आरोपियों के बीच आदान-प्रदान की गई कुछ ‘आपत्तिजनक’ व्हाट्सएप चैट का ज़िक्र करते हुए, पुलिस ने अदालत को बताया कि 16 फरवरी, 2020 की रात चांद बाग में एक ‘गुप्त’ बैठक हुई, जिसमें विरोध प्रदर्शन की स्थिरता और समन्वय पर चर्चा की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि बैठक सभी के लिए नहीं थी और केवल आमंत्रित लोग ही इसमें शामिल हो सकते थे।

व्हाट्सअप ग्रुप चैट के चुनिंदा हिस्से को पढ़ते हुए, पुलिस ने कहा कि आरोपी “कुछ ऐसा करने की योजना बना रहे थे जिसका खुलासा नहीं किया जा सकता”। उन्होंने आरोप लगाया कि फातिमा की संलिप्तता लगातार और हर माध्यम से थी।

पुलिस ने प्रस्तुत किया कि वह वारियर्स नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा थी और “रोडब्लॉक” आयोजित करने के लिए ‘चांद रात’ या ‘कल ईद है’, ‘कल नैनीताल जाना है’ जैसे कोडवर्ड में बोलती थी। वह पिंजरा तोड़ समूह की लड़कियों के साथ शामिल थीं, जिन्होने तय किया कि सड़क कब ब्लॉक होगी।

पुलिस ने संरक्षित गवाह ‘सैटर्न’ के एक बयान का हवाला दिया, जिसने कथित तौर पर दावा किया था कि उसने आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को फातिमा को नकदी का एक बंडल देते हुए देखा था और सुना था कि, “इस पैसे का इस्तेमाल दंगों के लिए किया जा सकता है।”

फातिमा के वकील अधिवक्ता सुशील बजाज ने पहले ये प्रस्तुत किया था कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान मनगढ़ंत हैं और सब सुनी सुनाई बात है। वो विरोध सभाओं में उपस्थित नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया कि साक्ष्य की पुष्टि करना पहला कदम होना चाहिए। बजाज ने यह भी आरोप लगाया था कि हर गवाह पहले इस केस का एक आरोपी था लकिन उन्हें माफ कर दिया और अब उन्हें उनके मुवक्किल के खिलाफ गवाहों के रूप में ‘मुखौटा बनाकर’ पेश किया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, अर्थशास्त्री जयति घोष, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और कार्यकर्ता अपूर्वानंद और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता राहुल रॉय का नाम भी चार्जशीट में शामिल है।

‘ख्वाबों में उससे मुलाकात करता रहता हूं’

शमशाद अहमद अक्सर सपने में अपने बेटे शादाब अहमद से मिलते हैं जब वह उसके गले लगने के करीब जाता है तभी एक झटके में वे जाग जाते हैं।

शमशाद अहमद और उनकी पत्नी अपने बेटे शादाब अहमद की तस्वीर के साथ

“जींस और ब्लेज़र पहने हुए एक्जीक्यूटिव लैदर बैग उसके दाहिने कंधे पर लटका हुआ है, मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि वह मेरे कमरे में कदम रख रहा है, जहां उसके लिए एक अलग बिस्तर है। वह ‘सलाम’ कहता हैं। लेकिन जैसे ही मैं उसे गले लगाने की कोशिश करता हूं, मुझे एहसास होता है कि यह महज़ एक सपना था।” ये बात 70साल के लंबी दाढ़ी वाले शमशाद मुस्कराते हुए कहते हैं।

शादाब को कथित साज़िश के तहत UAPA के तहत 6 अप्रैल, 2020 को गिरफ्तार किया गया था।

BCA पूरा करने के बाद, वह दिल्ली के जगतपुरी में एक आईटी कंपनी में कार्यरत थे और अपने पिता की मदद करते थे। पिता बश्टा, बिजनौर में बेकरी (बिस्कुट और ब्रेड आदि) उत्पादों के फेरीवाले हैं, जहां उनका चार सदस्यीय परिवार रहता है।

शमशाद कहते हैं, “मेरे बेटे ने संविधान विरोधी सीएए के खिलाफ आवाज़ उठाई, जो एक हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन या पारसी (पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से) को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने का रास्ता देता है, लेकिन मुस्लिम को नहीं।”

वो कहते है कि उसने कुछ भी असंवैधानिक नहीं किया; उसने केवल लोकतंत्र को बचाने के लिए विरोध दर्ज किया। लेकिन दुख की बात है कि वह UAPA के तहत पिछले तीन सालों से जेल में बंद है।

दंगों के एक महीने बाद शादाब को पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया था। पूछताछ के बाद जांचकर्ता उसे जाने देते थे। लेकिन जब उसे पांचवीं बार बुलाया गया, तो उसे हिरासत में ले लिया गया और उसपर ‘साज़िश’ के मामले सहित अन्य कई मामलों में मामला दर्ज किया गया।

साज़िश के आरोप को ख़ारिज करते हुए शमशाद का कहना है कि, “समझौता किए गए गवाहों के कथित बयानों को छोड़कर, पुलिस ने किसी भी आरोपी के खिलाफ आरोप सिद्ध करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया है।”

अपने सेल फोन में विरोध के दौरान शूट किए गए शादाब के वीडियो दिखाते हुए वे कहते हैं, “किसी भी वीडियो में वो (शादाब) भड़काऊ बयान देता हुआ नहीं दिखता है। उसने केवल संविधान के दायरे में रहकर बात की थी।”

हालांकि शमशाद को न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। आत्मविश्वास से भरे पिता कहते हैं, “हम उसकी गैर-मौजूदगी को महसूस करते हैं और दर्द में हैं। अल्लाह हमारे सब्र की परीक्षा ले रहा है लेकिन हमें इस हालात से उबारेगा। मेरा बेटा बेकसूर है। वह सभी आरोपों से बाहर आ जाएगा और पाक-साफ निकलेगा।”

Ramswaroop Mantri

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