रिबॉर्न मनीष
अच्छा हुआ, कि राहुल ने अलग तरह की कांग्रेस बनाई। आज उनकी कांग्रेस के क्षत्रप अखिलेश, तेजस्वी, स्टालिन, हेमंत सोरेन हैं। जिसके बूते वे मोदी सत्ता के मदमत्त बैल को नाथने में सफल हो पाए हैं।
पार्टी में थोड़ा परिणाम, डीके शिवकुमार, गहलोत, सचिन पायलट से मिला है। मगर सेंट्रल इंडिया में स्थानीय लीडरशिप, यूजलेस निकली।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से 40 सीटे होती हैं।
कांग्रेस सिरे से हारी। कारण- दिशाहीन संगठन,
और ऐसे लीडर, जो राहुल से ज्यादा मोदी शैली से प्रभावित हैं।
जिन नेताओ को मौका मिला,वे पार्टी खड़ा करने की जगह, अपना पर्सनालिटी कल्ट खड़ा करने में लग गए।
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2018 में कांग्रेस जीती, तो कमलनाथ ने वन मैन शो चलाया। जाने क्यो, व्यापम सहित तमाम करप्शन, जिसमे भाजपा को छिन्न भिन्न किया जा सकता था, ताक पर रख दिया।
सेटिंग और वेटिंग की राजनीति के बीच, उनकी गुरुर और गर्मी, भाजपाइयो से ज्यादा अपनी पार्टी के लोगो को चाक करती।
आखिर, इस तोपचन्द प्रबंधक और महाचतुर रणनीतिकार को, ऊंघता पाकर, कल के छोकरे ज्योतिरादित्य ने पटक दिया।
50 साल का अनुभवी पॉलिटिशियन??
माई फुट!!!
राहुल जब देश मे मोहब्बत की दुकान खोल रहे थे, कमलनाथ, एमपी में सॉफ्ट हिंदुत्व के बागेश्वर बने थे।
जिस पत्रकार को हाईकमान ने बैन किया, उसके साथ चॉपर की सैर की। सपने क्रेश हो गए, तो बीजेपी में लैंड करने की कोशिश की।
आज तो घर की सीट भी खो चुके।
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भूपेश बघेल 5 साल, सीएम हाउस से सरकार चलाते रहे। वही सॉफ्ट हिंदुत्व, वही पर्सनालिटी कल्ट-
“भूपेश है, तो भरोसा है” – जगह जगह भूपेश की फोटो, भूपेश की योजना, भूपेश महान।
कैबिनेट के तमाम मंत्रियों की औकात दो कौड़ी की नही। कोई अपने विधानसभा से ज्यादा पांव न पसारे। कोई लीडरशिप को नर्चर नही की।
मगर फिर भी जीत जाते। मगर जो पुराने जनाधार वाले कद्दावर नेता थे, सबको अंडरमाइन किया। अपमानित किया।
वे घर बैठ गए।
गांव गांव में कांग्रेसी भरे पड़े हैं, कार्यकर्ता हैं, कसमसा रहे हैं कुछ करने को- लेकिन कोई डायरेक्शन नही,
कोऑर्डिनेशन नही, ट्रेनिंग नही, आइडियोलॉजी का बेस नही। नतीजा, 5 साल सत्ता भोगने के बाद 11 लोकसभा क्षेत्र में 11 जिताऊ चेहरे न दे सके। विधानसभा हार गए, लोकसभा हार गए। खुद भी सांसदी हार गए।
अरे, लानत है 5 साल तुम्हारे मुख्यमंत्री रहने पर।
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एमपी के नये नवेले खेवनहार, जीतू पटवारी मोदी की सस्ती कॉपी क्रमांक 3 हैं। वही निजत्व की राजनीति है। खुद का पर्सनालिटी कल्ट चाहते है।
अपना गुट, अपने विधायक, अपने सांसद, अपना रूतबा चाहते हैं। अब 29 में से 29 हार की लंबी माला पहनकर दांत चियार रहे हैं।
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ये ऐसे बोनसाई बरगद हैं, जो अपने नीचे घास उगने की इजाजत भी नहीं देते। दल को, अपने कद से ऊपर बढ़ने की इजाजत नही देते।
महत्वाकांक्षी हैं, पर वोट पाने की औकात नही। राहुल वोट मांग दे, सरकार बनवा दे, सत्ता देकर भूल जाये। और कांग्रेस, प्रदेश में इनकी निजी, रीजनल पार्टी हो जाये।
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उड़ीसा अब, एक नई सम्भावनाओ का प्रदेश है। एक खुला मैदान, यहां बीजेडी के पास, न स्वस्थ नेतृत्व है, न नेतृत्व के पास सत्ता।
तो अगले पांच साल, वह विपक्ष का स्थान भर नही पाएगी। ऐसे में जरा मेहनत से पूरा बीजेडी कैडर खिसक कर कांग्रेस के पास आ सकता है, (जो मूलतः कभी कांग्रेस का ही था)।
मगर यह प्रदेश पूरी तरह उपेक्षित है। एक लीडर, जो झुके, मुस्कुराए, मिले.. संगठन जोड़े, लोगो को लीडर बनाये, पांव पांव पूरा प्रदेश चले।
पांच साल बाद, जब बीजेपी इंकमबेन्ट होगी, डिफेंडर होगी। कांग्रेस यहां तेलंगाना दोहरा सकती है।
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गुजरात का तिलस्म 2017 में राहुल तोड़ चुके थे। जरा सी कसर, जरा फाइनल मैनेजमेंट में कमी रह गयी थी।
कुछ दिन उन्हें गुजरात मे, पोरबन्दर में, दांडी में, सौराष्ट्र, और कच्छ में गुजारने चाहिए। वहां के कांग्रेस वर्कर्स को सलाम करना चाहिए।
उनके साथ रहना, खाना, बैठना चाहिए। जो
देश मे कांग्रेस के सबसे रेजीलिएन्ट वर्कर हैं। 30 साल सत्ता से दूर, खौफ में रहकर भी झंडा उठाये रखा है।
नेता मिला, तो किला तोड़ देंगे।
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राहुल ने सड़क का स्वाद चख लिया है। दिल्ली वो मजा न देगी। जिस प्यार, जिस स्पर्श, जिन दुआओं ने राहुल के चेहरे का नूर लौटा दिया है। उसकी खुराक, दिल्ली से दूर, गांवगुरबों में मिलती है।
फिर जिस सांप का फन पकड़कर, वे बोतल में कैद कर चुके हैं, अब उसकी बांबी फोड़ने का वक्त है। उन्हें शीघ्र एमपी, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गुजरात में उतरना चाहिए।
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और इन सत्ता के दलालों को किनारे करना चाहिए। देश उन पर पूरा भरोसा करता है।
मोदी छाप कांग्रेसियों का नही।





