अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

राम भरोसा टूटा अब गोरखपुर ही ठिकाना

Share

सुसंस्कृति परिहार
उत्तर प्रदेश अपने सी एम के मामले में हमेशा कमज़ोर रहा है पिछले अठारह साल बाद योगी आदित्यनाथ ने ही विधानसभा चुनाव लड़ने की ताल ठोंकी है वह स्वागतेय है। इससे पहले मायावती ,अखिलेश और आदित्यनाथ योगी विधानसभा परिषद से आकर मुख्यमंत्री रहे हैं।  भाजपा की ताज़ा चुनाव सूची में आदित्यनाथ योगी का नाम गोरखपुर शहर सीट से आना इस बात को पुख्ता कर रहा है कि वे चुनाव लड़ने जा रहे हैं ।हालांकि इससे पूर्व अयोध्या में उनका चुनाव प्रचार शुरू हो चुका था लेकिन किन विपरीतताओं ने उन्हें गोरखपुर भेजा है वह किसी से छुपी हुई नहीं हैं ।पहली बात तो यह है कि अयोध्या में 80,000से ब्राह्मण वोट हैं और वे आदित्यनाथ से ख़फ़ा हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये कि राम मंदिर निर्माण की जो कवायद विश्वहिंदू परिषद और भाजपा ने 1992 छै दिसंबर से की थी उसका मसला हल हो चुका है मंदिर निर्माण तीव्रता गति से चल रहा है इसलिए अब वह कोई मुद्दा नहीं रहा बल्कि अब यह मुद्दा है कि मंदिर निर्माण में सरकारी संरक्षण में भारी लूट मची है।

How rebellion in Yogi govt signals a scramble for non-Yadav OBC votes in UP  polls - Elections News


तीसरी बात यह कि हिंदू बाहुल्य लगभग 93%हिंदू होने के बावजूद यहां किसी विशेष जाति के प्रत्याशी नहीं जीते। यहां बृजकिशोर अग्रवाल, वेदप्रकाश, जयशंकर पांडेय,निर्मल खत्री, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, वेदप्रकाश गुप्ता विधायक रहे हैं । लगातार किसी एक दल का भी दो बार से ज्यादा दबदबा नहीं रहा।आज की स्थिति में वहां सपा का बर्चस्व बना हुआ है।ऐसी स्थिति में आदित्यनाथ का भागना मज़बूरी ही कहा जायेगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि राम का जादू अयोध्या में कभी नहीं चला अब तो राम भरोसे रहना और मंहगा पड़ता। किए कराए पर पानी फिरना कहावत यूं ही नहीं बनी कहां तो तय था राम जी करायेंगें यू पी का बेड़ा पार और अब तो बेड़ा गर्क होने की कगार पर है। हिंदुत्ववादी ताकतों का सारा मजा धरा रह गया।काशी से मोदी अयोध्या से योगी नारा भी धरा रह गया।
इसलिए अब गोरखपुर की ओर रुख किए हैंयोगी आदित्यनाथ।गोरखनाथ पंथियों पर उनका पूरा विश्वास है।वे यह समझ रहे हैं कि गोरखनाथ मंदिर के महंत पीठाधीश्वर होने के कारण वे सहजता से चुनाव जीत लेंगे।गोरखपुर सदर सीट पर गोरक्षपीठ मठ का प्रभाव माना जाता है। इस कारण यहां पर हमेशा मठ की ओर से सुझाए जाने वाले उम्मीदवारों को ही चुनावी मैदान में उतारा जाता है। वर्ष 2002 में यहां से भाजपा के सीनियर नेता शिव प्रताप शुक्ला चुनावी मैदान में उतरे थे। उनसे योगी आदित्यनाथ की पट नहीं रही थी। ऐसे में योगी ने तब भारतीय हिंदू महासभा के उम्मीदवार के तौर पर राधामोहन दास अग्रवाल को चुनावी मैदान में उतार दिया। योगी आदित्यनाथ का प्रभाव ऐसा रहा कि शिव प्रताप शुक्ला तीसरे स्थान पर चले गए। वर्ष 2002 से लगातार चार बार राधामोहन दास यहां से विधायक चुनकर आते रहे हैं।वे कहां जाएंगे यह भी एक बड़ा सवाल है यहां।गोरखपुर शहर सीट से योगी आदित्यनाथ के उम्मीदवार बनने के बाद भाजपा के विधायक राधामोहन दास के भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया है। दास को भले ही योगी ने राजनीति में आगे बढ़ाया हो, लेकिन पिछले कुछ समय से वे लगातार मुख्यमंत्री से नाराज चल रहे थे। इसके अलावा उनके विवादित बयान चर्चा में आए। इसके बाद से ही वे भाजपा आलाकमान की नजर में आ गए थे। अब माना जा रहा है कि उन्हें साइडलाइन किया जा सकता है।
गोरखनाथ शहर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की अन्य वजहें भी है कहा ये भी जा रहा है कि इससे 17 विधानसभा सीटों पर असर पड़ेगा यदि आदित्यनाथ गोरखपुर नहीं आते हैं तो गोरखपुर ग्रामीण के साथ ही पिपराइच ,चौरी चौरा, सीट भी उलझन में है कुशीनगर का हाल वैसे भी स्वामी प्रसाद मौर्य ने जब से अलग होने की घोषणा की है और सपा में शामिल हुए हैं तब से यह कहा जा रहा है पडरौना,तुमकुहीराज फाजिलनगर सीट पर सपा का कब्जा नहीं रोका जा सकता ।कांग्रेस और मौर्य समाज दोनों के ज़ोर के कारण कबीर नगर में भी 3 विधानसभा सीटों में से खलीलाबाद सीट जाती हुई नजर आ रही है।ऐसी संगीन हालत में आदित्यनाथ कहीं के ना रहें ऐसा भी हो सकता है लोग कह रहे हैं योगी की युवा हिन्दू वाहिनी पर रोक लग जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।कहा तो यह भी जा रहा है गोरखनाथ पीठ के नाथपंथियों में भी हलचल है आदित्यनाथ की क्रूर और हिंसक राजनीति से भी परेशानी बढ़ने वाली है क्योंकि उनकी जीत अब आसान नहीं रही।गंगा में बहुत पानी बह चुका है।गोरखपुर शहर सीट योगी के लिए सुरक्षित सीट मानी जा रही है कहते हैं यहां पर उन्हें अधिक समय नहीं देना पड़ेगा। इससे वे बचने वाले समय का उपयोग प्रदेश के अन्य हिस्सों में चुनावी प्रचार में लगा सकते हैं। साथ ही, पिछले पांच साल में जो उन पर बैकडोर पॉलिटिक्स का आरोप लगा है उससे बरी भी हो जायेंगे।

पूर्वांचल में 130 विधानसभा सीटों पर पिछले चुनावों में भाजपा काफी मजबूत रही हैं। इस बार के चुनाव में पार्टी को समाजवादी पार्टी से कड़ी टक्कर मिलती दिख रही है। तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भाजपा की सीटें इस इलाके में कम होने की आशंका जताई गई है। इस क्षेत्र से मुख्यमंत्री योगी के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चुनकर गए हैं। वाराणसी से जिस प्रकार का माहौल पीएम मोदी ने बनाया था, उसी प्रकार से गोरखपुर विधानसभा चुनाव 2022 में पूर्वांचल की राजनीति का केंद्रबिंदु बनने जा रहा है।देखना यह महत्वपूर्ण होगा कि अभेद्य दुर्ग इस बार टूटता है या नहीं । लगता है जैसे कांग्रेस के इंडीकेट और सिंडीकेट बीच लड़़ाई में यूं पी के एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री  श्री त्रिभुवन नारायण सिंह को 1970 में बलि का बकरा बनाया गया था उसी तरह मुख्यमंत्री आदित्यनाथ संघ और भाजपा के द्वंद के बीच गोरखनाथ में बलि का बकरा बनने जा रहे हैं। लोगों की मानें ये सीट अब सुरक्षित नहीं रही।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें