अग्नि आलोक
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राम तेरा नाम एक साँचा दूजा न कोई

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शशिकांत गुप्ते

आज मुझे बहुत ही आश्चर्य हो रहा है। आज सुबह जब मैं मेरे व्यंग्यकार मित्र सीतारामजी से मिलने उनके घर गया तो क्या देखा,सीतारामजी बहुत तल्लीन होकर भजन गा रहे थे।
राम को नाम लेत मुख से,
भवसागर तर जाई।
राम नाम भज ले मन मूर्‌ख,
बनत बनत बन जाई॥
भजो रे मन
राम नाम सुखदाई।

मैने उन्हें नमस्ते कहा तो उन्होंने अनसुना कर दिया।
उसी समय भाभीजी बाहर आई और भाभीजी ने जोर से कहा अजी सुनते हो आपके मित्र आएं हैं।
भाभीजी की आवाज सुनकर सीतारामजी ने अपनी आँखें खोली और मुझसे नमस्ते कहा।
मैने कौतूहलवश पूछा यह क्या होगया है? आपको आप भी राम नाम का भजन कर रहे हो?
सीतारामजी ने मुझसे पूछा आप भी का क्या मतलब है? राम भगवान है,वह तो सभी के हैं।
यह कहतें हुए सीतारामजी ने संत कबीरसाहब का दोहा सुना दिया।
राम राम सब कोई कहे ठग,ठाकुर और चोर
जिस राम से ध्रुव,प्रह्लाद और मीरा तरे वह राम कोई और

सीतारामजी आज पूर्ण रूप से दार्शनिक अंदाज में हैं।
अपनी बात जारी रखते हुए सीतारामजी,कहने लगे मै राम को अपने अंतरचक्षु से देखने की कोशिश कर रहा हूँ।
मै राम का नाम श्रद्धा से लेने का प्रयास कर रहा हूँ।
मैं इस लोकोक्ति के विरुद्ध हूँ।
राम राम जपना पराया माल अपना
इस लोकोक्ति का वाक्य में प्रयोग इस प्रकार है – वह साधु नहीं कपटी और छली है। इसका तो एक ही काम है – ‘राम राम जपना, पराया माल अपना
मै राम के व्यापक स्वरूप को अंतरचक्षु से देखना चाहता हूँ।
बाह्य चक्षु से मुझे तो राम कहीं नजर नहीं आतें हैं। बाह्य चक्ष से रामजी का दिव्यभव्य मंदिर का नक्शा जरूर दिखाई देता है।
बाह्य कर्ण मंदिर निर्माण की लागत सुनकर बधिर हो जातें हैं? मंदिर निर्माण की लागत आस्थावान लोगों के द्वारा दिए जाने वाले मुक्तहस्त के दान से पूरी होगी। यह देख सुन और पढ़कर मै भावविभोर हो जाता हूँ। मुझे यह सोचकर गर्व का अनुभव होने लगता है कि, मेरे अपने देश में इतने दानवीर हैं?
मुझे देश की गरीबी,भुखमरी, बेकारी सब मिथ्या लगने लगती है। रामजी के दिव्यभव्य मंदिर निर्माण की प्रगति के समाचार पढ़,सुन,देखकर मेरा सिर अभिमान से ऊंचा हो जाता है।
मै यह सब देख,सुन कर भक्ति में इतना लीन हो जाता हूँ कि, देश के बहुत से कलकारखानो की मशीनों में आर्थिक तंगी से लग रहे जंग की खबरों को सुन कर मेरे मन में कोई मलाल नहीं होता है
मुझे विश्वास हो जाता है कि, रामजी भगवान है,अंतर्यामी हैं।रामजी को सब दिखाई देता है।रामजी सब ठीक कर देंगे।
भजन की ये पंक्तियां तो सीतारामजी बहुत ही श्रद्धा से गाने लगे
भजो रे मन, राम नाम सुखदाई।
राम नाम के दो अक्षर में.
सब सुख शान्ति समाई॥

सीतारामजी यह पंक्तिया सुना ही रहे थे,उसी समय भाभीजी चाय लेकर आई।
जैसे ही चाय के कुछ घुट हलक में उतरे सीतारामजी आपनी वास्तविकता में मतलब औक़ात में आ गए।
मैने पूछा आप एकदम दार्शनिक कैसे हो गए हो?
सीतारामजी कहने लगे राम का नाम लेना गलत तो नहीं है।
निःस्वार्थ भक्ति करना भी गलत नहीं है। हमेशा निंदा,आलोचना और व्यंग्य नहीं करना चाहिए।
स्तुति भी करना चाहिए।
इतंजार है मंदिर निर्माण का।आस्थावान लोगों के हाथों शासन की बागडोर है। निश्चित ही राम मंदिर के दर्शनार्थ मुफ्त यात्रा करने को मिलेगी ही।
इस भौतिकवादी युग में भक्ति करना कितना सरल ही गया है।
मुफ्त में तीर्थयात्रा मुफ्त में मंदिर दर्शन। वाह क्या बात है।
हींग लगे फिटकरी रंग चौखा।
यह कहते हुए सीतारामजी मुझसे कहने लगे तुम भी गावों मेरे साथ भजन।
भजो रे मन
राम नाम सुखदाई।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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