शशिकांत गुप्ते
आमजन के दिन की शुरुआत राम राम के साथ होती है।समाचार पढतें और सुनतें ही मुँह से निकलता है हे राम
बहुत उम्मीद थी,अबकी बार खुशी खुशी राम का नाम लेंगे।उम्मीद पर पानी फिर गया।अब कहराते हुए मुँह से निकलता है, हे राम
अब तो दाल और सब्जी को बधार लगाना भी आमजन के लिए दुष्वार हो रहा है।यह हक़ीक़त है।
कहानी लिखने वाले अभी भी अपनी शान बघार ने में कोई कमी नहीं कर रहें हैं।
पुरानी फ़िल्म First love के गीत की पंक्ति बीते दिनों की याद दिला देती है।
बीते हुते दिन कुछ ऐसे ही हैं
याद आतें ही दिल मचल जाएं
अब तो आने वाले दिनों कैसे होंगे,यह सोचकर मन मसोस कर रहना पड़ता है।
किसीने बहुत ही सच्ची बात कही है।
एक बात हमेशा याद रखना दोस्तो।ढूंढने पर वही मिलेंगे जो खो गएं हैं।वो कभी नहीं मिलते जो बदल गएं हैं।
आवाम के दिन तो नहीं बदले,लेकिन सियासतदान बदल गएं हैं।
राहत इंदौरीजी का एक शेर है।
कहकर तो गए थे कि कपड़े बदलकर आतें हैं
लेकिन सब चेहरें बदल कर आगए
अब की बार तो सियासत भी फिल्मी हो गई है।आए दिन धर्मेद्रपाजी के संवाद सुनने पढ़ने को मिल रहें हैं।
एक एक को चुन चुन के मारूंगा।मानव की तुलना श्वानों (कुत्तों) से करते हुए उसमें कमीनों शब्द का विशेषण लगाकर संवाद बोला जाता है।यह सब बनावटीपन फिल्मों में दर्शकों के मनोरंजन के लिए किया जाता है।
वर्तमान में राजनीति में धनबल,बाहुबल,और सत्ता का समन्वय हो गया है।
इसीलिए राजनेता जनता की मूल मुद्दों से भटक गए हैं।राजनेताओं को जनता की मूलभूत समस्याओं कोई लेना देना नहीं है।चाहे वो पक्ष के हो या विपक्ष के नेता, सभी सुविधाभोगी हो गए हैं।
जाके पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई
अपने आराध्य देव गणपतिजी विराजमान होने वाले हैं।दुर्गाजी का भी आगमन होगा।
हर गली हर चौराहे, हर नगर,हर डगर पर बुराई के प्रतीक के रूप में रावणों के पुतलों को जलाया जाएगा।
महंगाई के कारण रावण के पुतले भी निश्चित ही महंगे ही बनेंगे?दिन-ब-दिन रावण के भाव भी बढ़ रहें हैं।
जो भी होरहा है होने दो। हमें तो अपनी धार्मिक परम्पराओं का निर्वाह अपना परम कर्तव्य समझकर करना है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





