राणा सांगा की पत्नी, हुमायूँ की बहन
पद्मश्री सम्मानित अग्रज Babulal Dahiya जी ने लिखा है – उस काल खंड में राजा चाहे राजपूत मुस्लिम या पेशवा किसी भी वंश के रहे हों पर उनकी दृष्टि छोटे राजाओं के ऊपर उसी तरह बनी रहती थी जैसे छोटी चिड़ियों के ऊपर बाज की। यही कारण था कि छोटे राजा 60-65 वर्ष के बूढ़े खूसट राजाओं तक को अपनी षोड़सी कन्या ब्याह उनसे रिश्तेदारी कर लेते थे। और एक-एक राजा के 10– 10, 15-15 तक रानियां होती थीं।
जिस समय का इतिहास दोहराया जाता है उस समय दिल्ली में इब्राहीम लोदी का शासन था। और बाबर उस कालखंड में समरकंद का राजा था। बाबर वहां कई युद्ध लड़ा, कई बार हारा और जीता भी। इसलिए युध्द का उसे अच्छा खासा अनुभव था। इधर मेवाड़ के राजा राणासांगा ( संग्राम सिंह ) लोदी सल्तनत से अकेले नही जीत सकते थे अस्तु कूटनीति के तहद बाबर को चिट्ठी भेजकर बुलाया की “तुम लाहौर की ओर से दिल्ली में आक्रमण करो और हम आगरे की तरफ से।” बाबर के पास उतनी फौज नही थी इसलिए राणा सांगा का अनुमान रहा होगा कि दोनों लड़कर कमजोर हो जांय गे और बाद में हम आराम से दिल्ली जीत लेंगे। पर उनका अनुमान उन्ही के गले पड़ गया।
बाबर तो चिट्ठी में लिखी बात पर विश्वास कर अपने हम बिरादर इब्राहीम लोदी से लड़ने आगया पर राणा सांगा वायदे के अनुसार आगरे के तरफ से आक्रमण नही किए। लेकिन फिर भी अपने सूझ बूझ तथा युध्द अनुभव के कारण उसने इब्राहीम को पराजित कर दिया। बाबर के जीतते ही समस्त राजे महाराजे भेंट उपहार लेकर उसके पास पहुँचने लगे। बाबर खुद इतिहासकार था उसने लिखा है कि राजे महाराजे इतना उपहार लेकर आये जिससे बिछी हुई कालीन के ऊपर ढेर लग गया। राणा सांगा भी भेंट लेकर पहुँचे पर बाबर ने व्यंग कसते हुए कहा कि ” आइए राणा साहब ! वैसे युध्द के बाद तो चील्ह कौए और शियार आते हैं। बहादुर तो युद्ध के पहले आकर मिलते हैं?”
बाद में यही खुन्नस राणा सांगा से युध्य का कारण बनी। उस युद्ध में राणा सांगा की बहुत बड़ी सेना थी पर हार का कारण यह बना कि राणा सांगा खुद ही राजपूतों की विशाल सेना लेकर अग्रिम मोर्चे पर थे। लेकिन बाबर सूझ बूझ के साथ एक पहाड़ी की ओट से युद्ध संचालित कर रहा था। जब पहाड़ी के एक ओर से उसकी सेना लड़ने के लिए आती दिखी तो राजपूत उस ओर ही पूरी शक्ति के साथ टूट पड़े। लेकिन बाबर की तो वह रणनीति थी। क्योंकि उसकी दूसरी बड़ी टुकड़ी ने पीछे की ओर से आक्रमण कर दिया। इस तरह बाबर के युद्ध कौशल के आंगे राणा सांगा को अस्सी घाव के साथ पराजय का मुंह देखना पड़ा। पर दूसरी ओर बाबर के शरीर में एक खरोंच तक नही आई। कहते हैं बाद में राणा सांगा को अपने ही सरदारों द्वारा जहर देकर मार डाला गया। तो यह है एक ऐतिहासिक सच्चाई।

#चित्र हुमायूं और जौहर के लिए तैयार मुँह बोली बहन कर्णावती।
बाबर के मरने के पश्चात उसका पुत्र हुमायूं दिल्ली की गद्दी में बैठा। इतिहास कारों के अनुसार राणा सांगा की 7 पत्नियां थीं जिनमें एक रानी कर्णावती भी थीं जो राणा सांगा के मरने के बाद शासक बनी । यह वही रानी कर्णावती थीं जिन्होंने बाबर के बेटे हुमायूं को ‘राखी’ भेजा था। कहते हैं मेवाड़ की सैन्य शक्ति कमजोर पड़ते देख उसे जीतने के लिए नजर गड़ाए बैठा गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह मेवाड़ में चढ़ाई कर दिया था।
यही कारण था जब कर्णावती ने अपने पति के शरीर में 80 घाव देने वाले के बेटे को ही राखी के साथ एक संदेश भेजा जिसमें हुमायूं से राज्य की सुरक्षा करने का अनुरोध था। हुमायूं उस समय बंगाल में था। लेकिन पुरानी बातें भूल कर्णावती को बहन का दर्जा दे वह अपने हम बिरादर से लड़ने चल पड़ा। वह बंगाल से सैन्य दल लेकर मेवाड़ तक आ पाता उसके पहले ही अपनी पराजय सन्मुख देख उसकी मुँहबोली बहन जौहर करचुकी थीं। फिर भी हुमायूं ने यह नही सोचा कि कर्णावती उसके पिता के दुश्मन की पत्नी हैं। वह राखी की लाज़ रखने मेवाड़ पहुंचा और कर्णावती को न बचा पाने का अफसोस जताते उसने सुल्तान को युद्ध में पराजित किया और मेवाड़ का राज्य कर्णावती के नाबालिग पुत्र को सौंप मुँह बोला भाई होने का कर्तव्य निभाया।
महाराणा प्रताप सिंह उन्ही कर्णावती के बेटे उदय सिंह के पुत्र थे। जिस प्रकार हुमायूं ने गुजरात के सुल्तान को पराजित कर उनके पिता उदयसिंह को गद्दी में बिठाया उस दृष्टि से हुमायूं के बेटे अकबर से महाराणा प्रताप की भला क्या दुश्मनी ? क्योकि दादी के मुँह बोले भैया के बेटे के नाते अकबर भी उनका मुंह बोला चाचा ही हुआ। पर अकबर से लड़ाई का कारण सिर्फ मनसबदारी थी। क्योकि अकबर ने जो दर्जा अपने साले मान सिंह को दे रखा था वह महाराणा प्रताप को देने को राजी नही था। जिसके कारण उन्हें दर दर भटकते घास की रोटी खानी पड़ी।
56 साल की उम्र में धनुष में डोरी चढ़ाते समय धनुष के टूट कर छाती में लगने से महाराणा प्रताप का निधन हो गया। परम्परा के अनुसार उनके बेटे अमर सिंह राजा बने तो उनने अकबर की शर्त मंजूर करली। और जब छोटे मनसबदार बन गए तो वे भी अकबर को सातवार झुककर कोर्निश करते (दिल्लीश्वरव जगदीश्वरव) कहने लगे।
यह है ऐतिहासिक सच्चाई। इसलिए इतिहास को आज के नजरिये से नही बल्कि सोलमी सदी की घटनाओं के नजरिये से देखना चाहिए जिसमें वे ऐतिहासिक घटनाएं घटी। न तो इतिहास में कहीं हिन्दू है न मुस्लिम। बस अपने -अपने दाव घात एवं सत्ता में बने रहने के तरीके हैं।
बाबूलाल दाहिया
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