डॉ. विकास मानव
_संसार में सभी धर्मों के आस्तिक दिखाई देंगे, फिर भी सच्चा आस्तिक मिलना मुश्किल है। अगर हमारे आपके भीतर आस्था है तो उसका आधार ‘मन’ है। हमारी आपकी आस्था के पीछे हमारा-आपका विचार, तर्क और हमारी-आपकी सोच होती है। लेकिन सोच, विचार और तर्क से कोई आस्तिक नहीं हो जाता। उसकी आस्तिकता झूठी ही होती है। क्योंकि माध्यम ही अपरिवर्तनीय को पकड़ने वाला नहीं है।_
अपने को धोखा दे दो तो अलग बात है। अपनी आस्तिकता पर गंभीरता से सोचें–आप परमात्मा को मानते हैं। लेकिन यह भी सोचें कि आपका मानना तर्क, अनुमान, विचार, शास्त्र, परम्परा और सिद्धान्त से निकला है।
परमात्मा के प्रति आपकी श्रद्धा, आपका विश्वास और आपकी भक्ति के मूल स्रोत ये ही हैं और इनसे आविर्भूत होने वाली परमात्मा की सत्ता वास्तविक नहीं होती क्योंकि आपके मन से परमात्मा निकल ही नहीं सका है।
हम जिन्हें आस्त्तिक समझते है–वे वास्तविकता में छिपे हुए नास्तिक हैं। वे नपुंसक हैं, निर्वीर्य हैं। जरा-सी चोट से उनकी सारी आस्तिकता समाप्त हो जाने वाली होती है। आस्त्तिक तो तभी कोई होता है जब मन को हटाकर संसार को देखता है। उस दशा में संसार दिखाई नहीं देता, क्योंकि संसार परिवर्तनशील है, हम भी परिवर्तनशील है, इसलिए परिवर्तनशील मन के हटते ही परिवर्तनशील संसार का न दिखाई देना स्वाभाविक है।
मन के अस्तित्व के हटते ही ‘चेतना’ सामने आ जाती है और जब चेतना देखती है तो संसार दिखाई नही देता। दिखाई देता है ‘वह’ जो ‘अपरिवर्तनीय’ है। चेतना शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है।
_चेतना से तात्पर्य हमारे ‘आत्मा-जागरण’ से है। आत्मा ही चेतना है। मन के हटते ही, स्व को विकास मिलते ही चेतना सामने आ जाती है। फिर आत्मा के द्वारा जो दिखाई देता है–वही है ‘परमात्मा’।_
*एकाग्रता का परमात्मा से सम्बन्ध :*
उपनिषद का कहना है कि चित्त में नाना प्रकार के विकल्प, द्वन्द्व, भेद, द्वैत आदि विद्यमान रहते हैं। इन सब का एकमात्र मूल ‘चित्त’ है। चित्त न हो तो कोई भेद नहीं, द्वन्द्व नही, कोई विकल्प भी नहीं। इसीलिये उपनिषदकार ने परमात्मा से चित्त को एकाग्र करने के लिए कहा है।
_परमात्मा का अस्तित्व है अथवा नहीं–यह महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात है चित्त की एकाग्रता। चित्त को किसी भी वस्तु पर एकाग्र किया जा सकता है, चाहे वह वस्तु वास्तविक हो या कल्पित। यह आवश्यक नहीं है कि आप जब वास्तविक वस्तु पर चित्त एकाग्र करेंगे तभी चित्त एकाग्र होगा।_
इसीलिए उपनिषद यह नहीं कहता कि आप पहले परमात्मा को खोजो, फिर चित्त को एकाग्र करो। परमात्मा की खोज तो जन्म-जन्मान्तर की खोज है, फिर भी परमात्मा नहीं मिल पाता तो क्या प्रयास भी बन्द रखा जाय ? प्रयास ही न किया जाय ? परमात्मा की सत्ता वास्तविक हो या कल्पित हो–इसकी चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
परमात्मा की सत्ता की बात परमात्मा जाने, हमें टेंशन लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर काल्पनिक वस्तु पर भी चित्त एकाग्र हो जाय और मन का अस्तित्व समाप्त हो जाय तो वास्तविकता का दर्शन स्वयम् ही हो जाएगा। यदि वास्तव में इस संसार में परमात्मा है तो मन के तिरोहित होते ही परमात्मा को प्रकट होना होगा, भले ही अपने अपने चित्त को काल्पनिक परमात्मा पर ही क्यों न एकाग्र किया हो। यह है चित्त की शक्ति और उसकी एकग्रता की महिमा।
_ध्यान के मार्ग में जो साधक अग्रसर होता है, उसके लिए परमात्मा भी एक कल्पित बिन्दु ही है, एक काल्पनिक वस्तु है, एक काल्पनिक आधार है। इसका मतलब यह नहीं है कि परमात्मा के अस्तित्व को अस्वीकार कर दिया जाय। ध्यानमार्गी साधक के लिए अभी परमात्मा के अस्तित्व का कोई अधिक महत्व नहीं है।_
हम चित्त को किस पर एकाग्र कर रहे हैं–इसका बिलकुल महत्व नहीं है, महत्व केवल इस बात का है कि हम चित्त एकाग्र कर रहे हैं। इसलिए इसमें धर्म भी आड़े नहीं आता।
हम किसी भी धर्म को मानने वाले हों, किसी भी पन्थ के अनुयायी हों, किसी भी सिद्धान्त को मानने वाले हों। सिद्धांतों, पंथों, धर्मो के मतभेद से एकाग्रता से कोई लेना-देना नहीं है। परमात्मा का कोई विग्रह हो, कोई चित्र हो, कोई प्रतीक हो, यदि कुछ भी उपलब्ध् नहीं है तो ‘अ व स् द’ को ही परमात्मा मान लें।
उसी पर मन को एकाग्र करने का उपक्रम करें। चित्त को एकाग्र करने की प्रक्रिया में ही मन का नाश हो जाता है। एक योगी साधक के लिए बड़ी क्रांतिकारी प्रक्रिया है यह। यह बात आज के तथाकथित धर्माधिकारी, धर्म के ठेकेदार, मठाधीश के न तो समझ में आने की है, न उनके मानने की है क्योंकि वे अपने ही बने बनाये कल्पना लोक में विचरण करते रहते हैं और धर्म के नाम पर मात्र उसकी मादकता में ही जीवन गुजारना ‘धर्मकर्म’ समझते हैं।
इससे बाहर यदि कोई उन्हें निकालने का प्रयास भी करे तो वे उसके ही पीछे सोटा लेकर और हाथ धोकर पड़ जाएंगे। उनकी मादकता में हस्तक्षेप करने का अपराध जो कर दिया किसी ने।
साधारण व्यक्ति की समझ में नहीं आने वाला कि उसके राम, उसके कृष्ण, उसके मन्दिर, उसकी मूर्तियां–सब काल्पनिक हैं। काल्पनिक का अर्थ झूठे नहीं है। काल्पनिक का अर्थ है –उनका आश्रय लेकर ध्यान की यात्रा की जा सकती है।
उनका आधार लेकर उपासना का मार्ग निश्चित किया जा सकता है। जब यात्रा समाप्त हो जाती है, जब साधना, उपासना का लक्ष्य पूर्ण हो जाता है तो उस दिन पता चलता है कि उनके बिना भी यात्रा शुरू की जा सकती थी, साधना की जा सकती थी।





