अग्नि आलोक
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भूत-भूतनी की हकीकत की कहानी

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एक भारतीय स्त्री ने मरते समय अपने पति से कहा, ‘देखो ! तुम जानते ही हो कि मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ मैं तुम्हें छोड़कर जाना कतई नहीं चाहती,मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा सिर्फ मेरे ही बनकर रहो,इसलिए मेरे जाने के बाद भी तुम कभी भी दूसरी शादी हर्गिज मत करना ! अगर तुमने ऐसा किया तो मैं भूतनी बनकर आऊंगी और तुम्हें बहुत परेशान करूंगी ‘कुछ दिनों बाद उस युवा औरत की मृत्यु हो गई।     

       उसके पति ने 3 महीने तक अपनी मर चुकी पत्नी की अंतिम इच्छा का सम्मान रखा, परन्तु चार महीने बाद उसकी मुलाकात एक सुन्दर युवती से हुई और वह उससे प्यार करने लगा और जल्दी ही दोनों ने सगाई कर ली,पर सगाई की रात ही उसकी पत्नी की भूतनी प्रकट हुई और अपने पति पर वादा खिलाफी का आरोप लगाने लगी, उसके बाद रोज यही सिलसिला चल पड़ा । भूतनी रोज रात में आ जाती और अपने पति पर वादाखिलाफी का आरोप लगाती !     

   उसकी पत्नी की भूतनी रोज उससे अपने विगत् जीवन में गुजारे हुए सारे पलों की बातें करने लग जाती, आदमी को भी विश्वास हो गया कि ये उसकी पत्नी की ही भूतनी है क्योंकि उसे पति पत्नी के बीच हुई सारी बातें पता थी ।  कुछ दिनों में वो आदमी भूतनी से बहुत ही परेशान हो गया तो उसके किसी मित्र ने उसे अपनी समस्या को लेकर किसी अच्छे मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह दी ।     

वह व्यक्ति अपने शहर के एक नामी-गिरामी मनोचिकित्सक की शरण में जा पहुंचा,उसने अपनी सारी बात उस मनोचिकित्सक को बताई । मनोचिकित्सक ने उसकी पूरी बात को ध्यान से सुना और कहा  ‘अच्छा ! तो मसला यह है कि तुम्हें लगता है कि तुम्हारी पत्नी मरने के बाद भूतनी बन गई है !’           

मनोचिकित्सक ने उसकी पूरी समस्या को सुनकर कहा,इस बार जब भी वह भूतनी तुम्हारे पास आए तो उसके साथ कुछ सौदेबाजी करना, ताकि पता लग सके कि वो भूतनी वास्तव में है भी या नहीं,तुम उससे कहना कि ‘अगर तुम सब कुछ जानती हो तो बस मेरे एक सवाल का जवाब दे दो । अगर तुमने सही जवाब दे दिया तो मैं भी यह मान लूँगा की तुम वाकई में मेरी मरी हुई पत्नी की ही भूतनी हो और मैं अपनी सगाई तोड़ दूंगा और जिंदगी भर तुम्हारी याद के सहारे अकेला ही रह लूँगा ! ‘   

      उस आदमी ने मनोचिकित्सक से बेसब्री पूछा कि डॉक्टर साहब सवाल क्या रहेगा जो मैं उस भूतनी से पूछूंगा ? मनोचिकित्सक ने उसे बताया कि मटर की फलियों से निकले हुए मटर से एक बड़ी मुट्ठीभर मटर के दाने अपनी मुट्ठी में भर लेना और उस भूतनी से पूछना कि बताओ मेरे हाथ में कितने मटर के दाने है ?परन्तु इस बात का ध्यान रखना की उन मटर के दानों को तुम्हें पहले खुद भी नहीं गिनना है । अगर मुट्ठी में बंद मटर के दानों की संख्या को भूतनी बता नहीं पाई तो समझ जाना कि वह भूतनी कहीं नहीं है,क्योंकि भूतनी जब सब कुछ जान सकती है तो बन्द मुट्ठी में क्या है ये भी आसानी से जान सकती है,तब तुम समझ जाना कि यह सब तुम्हारी कल्पना की उपज है ! तुम्हारा डर है,उसके बाद वो भूतनी तुम्हारे आगे जिंदगी में कभी तुम्हें परेशान नहीं करेगी !           

रोज की तरह अगली रात भी पत्नी की भूतनी उसके सामने प्रकट हुई तो उस आदमी ने उसको मस्का लगाते हुए कहा कि अब तो तुम भूतनी बन ही चुकी हो अब तुम तो सब जगह आसानी से जा सकती होगी और सब कुछ जानती हो !भूतनी ने जवाब दिया,हाँ बिल्कुल मैं सब जगह जा सकती हूँ,मैं तो यह भी जानती हूं कि तुम आज उस मनोचिकित्सक से भी मिले थे !          उस व्यक्ति ने उससे कहा अच्छा अब तुम इतना सब कुछ जानती ही हो तो चलो जरा यह बताओ कि मेरी इस मुट्ठी में कितने मटर के दाने हैं ? उस व्यक्ति द्वारा अचानक ये प्रश्न करते ही वह काल्पनिक भूतनी सवाली निगाहों से उसे देखते हुए उसके सामने से तुरंत गायब हो गई ! और वहाँ एक गजब सा सन्नाटा पसर गया !    

      अब वहां इस सवाल का जवाब देने के लिए कोई भूतनी मौजूद ही नहीं थी ! क्या आपको पता है कि आखिर वह भूतनी क्यों गायब हो गई ? इसका जबाब यह है कि अगर उस आदमी ने मटर के दाने खुद गिन लिये होते तो वह भूतनी भी आसानी से यह बात बता देती कि उस आदमी की मुट्ठी में मटर के कितने दाने हैं,क्योंकि वह काल्पनिक भूतनी उस व्यक्ति के मन की एक मनोवैज्ञानिक उपज थी । भूत या भूतनी तो सिर्फ उन्ही सवालों का जवाब दे सकते हैं,जिन सवालों के जवाब उस संबंधित आदमी के मन में पहले से ही मौजूद होते हैं ! जिन सवालों के जवाब उस निर्दिष्ट आदमी को ही नहीं पता होता है,तो उस स्थिति में जाहिर सी बात है उन सवालों के जवाब भूत या भूतनी भी कभी भी नहीं दे पाएंगे। वास्तव में सब कुछ उस आदमी के मन में चल रहा होता है न कि उसके जीवन में प्रत्यक्ष,भौतिक व वास्तविक रूप में !           

पत्नी की भूतनी की कल्पना उसके मन की ही एक उपज थी,क्योंकि उसकी पत्नी ने मरते समय उसे एक असरदार बात कह दी थी कि मैं मरने के बाद भी तुम्हारे साथ ही रहूंगी और पत्नी की यह बात उस व्यक्ति के मन में अंदर तक गहरे तक पैठ बनाकर असर कर गई थी । बस इसी बात का उस आदमी के अंतर्मन में लगातार अंतरदृद्व चल रहा था,जिससे उस आदमी को अपनी ही पत्नी की भूतनी नजर आने लग गई थी ! बहुत लोगों को यह गूढ़ और मनोवैज्ञानिक बात शायद ही समझ में आएगी या कभी भी नहीं आएगी,क्योंकि उनके अंतर्मन में भूत-प्रेतों वाली बातें बचपन से ही बहुत गहरे तक भरी हुईं हैं।         

 वास्तव में भूत,प्रेत,स्वर्ग,नरक,जन्नत, दोजख,हैवन,हेल,वरदान,मोक्ष,वैतरणी,दान, पुण्य,भगवान,खुदा,गॉड आदि बिल्कुल भ्रामक,कल्पना,पाखंड और अंधविश्वासी बातें हमारे मनमस्तिष्क में विद्यमान डर,भय,कल्पना और वहम की ही उपज होते हैं इसके अलावा कुछ भी नहीं है,ऐसी बातें हमारी मानसिक सोच के आधार से जुड़ी हुई होतीं हैं,हमें बस वही चीजें और बातें नजर आतीं रहतीं हैं और हमारे अवचेतन मन में स्थाई तौर पर घर कर जातीं हैं जो हमने अपने विगत् जीवन में कभी न कभी किस्से कहानियों में पढा़ होता है,सुना होता है,कल्पना में सोचा होता है,तस्वीरों में देखा होता है या कभी विचार किया होता है !आपने देखा होगा और इस बात को परखा भी होगा कि अंधविश्वासी भारतीयों को अंग्रेज,रशियन,चाइनीज भूत कभी भी नहीं दिखते,क्योंकि हमारा उन देशों के लोगों के साथ इतना गहरा वास्ता कभी पड़ता ही नहीं है ! इसलिए हमारा मन उनके बारे बिल्कुल अनभिज्ञ होता है,हमें हमारे अवचेतन मन-मस्तिष्क और सपने में वही दिखाई देता है जिसका हमसे कोई न कोई वास्ता होता है या रहा होता है ।     

       वैसे भारत में आजकल बच्चों को एनाबेल नामक विदेशी भूत भी दिखाई देना शुरू हो गया है क्योंकि अब टीवी और इंटरनेट पर भी काल्पनिक भूतों वाली कहानियों को इन आधुनिकतम् माध्यमों से विदेशी भी दिखाने लगे हैं इसके कारण उन कहानियों के इन काल्पनिक भूतों वाले कुछ पात्र भारतीय किशोरों और लोगों के मन में अब गहराई तक बैठ चुके हैं । जिससे लोगों को अब विदेशी भूत भी नजर आने लग गए हैं । अब अपनी मोबाइल और टीवी पर दिन-दिन भर भूतों वाले सीरियल और प्रोग्राम वाले वीडियो देख-देख कर कच्चे मानसिकता के बच्चों और अंधविश्वासी लोगों के मन पर गहरी छाप पड़ती जा रही है कि कोई एनाबेल नामक विदेशी भूत भी है,पर असल मे वो आपकी जिंदगी में सुने सुनाए, कहीं पढ़े,कहीं देखे या कल्पना में सोचे हुए दृश्य की ही उपज है ।           ये भूत,प्रेत,पिशाच आदि अंधविश्वासों का सारा खेल मन की कल्पना की ही उपज है, आपका मन आपके साथ बहुत बड़ा खेल खेलता रहता है,बाकी आप पर निर्भर करता है कि आप उस मन के खेल को खेल ही समझते हैं या फिर अंधविश्वास के जाल में फंसकर उलझते चले जाते हैं !       

   अंत में बस इतना समझ लीजिए कि मानव मन है कि तमाम तरह की कल्पनाएं भी बुन लेता है,वही मन उन भूत-प्रेतों वाली कल्पनाओं का सहारा लेकर भ्रम,भय,वहम,डर,शंका आदि की स्थिति पैदा कर देता है और अगर आप नहीं समझते तो आपके शरीर में यह एक भयंकरतम् मानसिक बीमारी का भी रूप ले लेता है ! इसलिए सत्य को जानिये,तर्क शक्ति का भरपूर उपयोग कीजिए और अंधविश्वास मुक्त होकर,निडर होकर एक चैतन्य व जागरूक नागरिक बनकर खुशहाली के साथ अपना मनुष्य जीवन व्यतीत कीजिए

प्रस्तुकर्ता – हार्दिक वर्मा, संपर्क – 7599245858

  संकलन – निर्मल कुमार शर्मा, ‘समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अंधविश्वास,पाखंड आदि के खिलाफ,सशक्त व निर्भीक लेखन ‘,गाजियाबाद 

Ramswaroop Mantri

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