मीना राजपूत
_असरदार डायलॉग और उनकी यूनिक डिलीवरी, मस्त चाल-ढाल और ऑफ-स्क्रीन मुंहफट कमेंट्स के लिए मशहूर कोई रहा है तो उसका नाम ‘जानी’ राजकुमार है._
जानी नाम की पहचान उन्हें बीआर चोपड़ा की ‘वक़्त’ (1965) से मिली. राजकुमार रातों-रात लाखों के दिल पर राज करने लगे. इसकी कामयाबी में बहुत बड़ा हाथ राजकुमार के संवादों का रहा. इसने एक और फिल्मफेयर अवार्ड उनकी झोली में डाला. इससे पहले वो ‘दिल एक मंदिर’ में भी इसे वो हासिल कर चुके थे. ‘काजल’, ‘मेरे हुज़ूर’, ‘लाल पत्थर’ और ‘पाकीज़ा’ ने उन्हें एक्टिंग की दुनिया में नयी ऊंचाई दी. मगर वो मशहूर हुए अपनी संवाद अदायगी की स्टाइल की बदौलत.
‘वक़्त’ के बाद राजकुमार की संवाद अदायगी फिल्म को लिफ्ट करने का सबब बनने लगी. कुछ मशहूर संवाद हैं – जिनके अपने घर शीशे के हों वो दूसरो पर पत्थर नहीं फेंका करते चिनाय सेठ… छुरी बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं होती, हाथ कट जाए तो खून निकलता है (वक़्त), लखनऊ में वो कौन सी फ़िरदौस है जिसे हम नहीं जानते (मेरे हुज़ूर), न तलवार की धार से, न गोलियों की बौछार से, बंदा डरता है सिर्फ परवरदिगार से (तिरंगा).
आपके पांव बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा, मैले हो जाएंगे (पाकीज़ा), जानी, हम तुम्हें मारेंगे, पर बन्दूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी और वक़्त भी हमारा होगा (सौदागर), तुम्हारी हैसियत के ज़मींदार हमारी हवेली पे रोज़ सलाम करने आते हैं (सूर्या). एक नहीं पूरी तीन पीढियां उनके संवादों की दीवानी रहीं. दो राय नहीं हो सकतीं कि फ्रंट बेंचर्स और उस दौर की नौजवान पीढ़ी उनके डायलॉग्स पर फ़िदा हो जाते थे. सिनेमा हाल वाह वाह और तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता था.
एक प्रसंग याद आता है. पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया. लेकिन मीना कुमारी से धर्मेंद्र की नज़दीकियां कमाल अमरोही को पसंद नहीं आयीं. उन्होंने धर्मेंद्र को हटा कर राजकुमार को ले लिया.
अंदाज़ा लगाईये कि अगर राजकुमार की जगह धर्मेंद्र ये डायलॉग बोलते तो कैसे लगते – आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं. इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा, मैले हो जाएंगे…
8 अक्टूबर 1926 को बलूचिस्तान के लोरलाई में जन्मे राजकुमार का असली नाम कुलभूषण पंडित था. रोज़ी रोटी की तलाश उन्हें मुंबई ले आई. पुलिस में सब-इंसपेक्टर भर्ती हुए. सोहराब मोदी उनके व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि फिल्म ऑफर की.
उन्होंने मना कर दिया. लेकिन बहुत दिन तक सिनेमा से दूर नहीं रह सके. नौकरी छोड़ दी. रंगीली (1952)) की. चली नही. कुछ और फिल्में की. किसी ने ध्यान नहीं दिया. एक दिन सोहराब मोदी फिर मिल गए. उन्हें ‘नौशेरवाने आदिल’ (1957) दी. फिल्म चली और राजकुमार को लोग पहचानने भी लगे.
इसका ये गाना बहुत मशहूर हुआ था – यह हसरत थी के इस दुनिया में बस दो काम कर जाते, तुम्हारी याद में जीते, तुम्हारे ग़म में मर जाते…इसमें उनके हीरोइन माला सिन्हा थी. फूल बने अंगारे (1963) में माला सिन्हा थी. इसका ये गाना बहुत मशहूर हुआ – चाँद आहें भरेगा, तारे दिल थाम लेंगे, हुस्न की जब बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे… ऑस्कर के लिए नामांकित महबूब ख़ान की ‘मदर इंडिया’ (1957) से राजकुमार स्थापित कलाकार की श्रेणी में आ गए.
दिलीप कुमार के ज़बरदस्त फैन रहे हैं राजकुमार. दोनों ने ‘पैगाम’ (1959) की थी. हालांकि उम्र में वो दिलीप कुमार से छोटे थे, लेकिन फिल्म में बड़े भाई का रोल किया.
एचएस रवैल ने कोशिश की थी दोनों को साथ लाने की, लेकिन बात नहीं बनी. फिर 32 साल बाद सुभाष घई ‘सौदागर’ में कामयाब हुए. ये उस समय तक का सबसे बड़ा और सनसनीखेज़ Casting Coup बना. ज्यादातर लोगों का ख्याल था कि फुटबाल साइज ईगो वाले साथ आ तो गए हैं मगर फिल्म का पूरा होना मुमकिन नहीं है.
लेकिन अंदेशे गलत हुए. फिल्म बनी और ठीक-ठाक चली भी. दिलीप कुमार की शादी के रिसेप्शन पर राजकुमार अपनी पत्नी को लेकर गए. उन्हें सपत्नीक बहुत कम देखा गया था. वहां बहुत भीड़ थी, स्टेज तक पहुंचना भी बहुत मुश्किल था.
राजकुमार एक तोहफ़ा छोड़ लौट गए. बाद में जब तोहफ़े देखे गए तो उस पर लिखा था – लाले और उसकी जान के लिए.
राजकुमार का फ़िल्मी सफर कुल चालीस साल चला और इस दौरान उन्होंने लगभग पिछत्तर फ़िल्में कीं. जिनमें ज्यादातर में वो भले हीरो न रहे हों लेकिन आकर्षण का केंद्र वही रहे. उनकी कुछ यादगार फ़िल्में हैं – फूल बने अंगारे, गोदान, दिल अपना और प्रीत पराई, ज़िंदगी, घराना, उजाला, ऊंचे लोग, हमराज़, काजल, हीर रांझा, 36 घंटे, लाल पत्थर, मेरे हुज़ूर, पाकीज़ा, कुदरत, एक नई पहेली, नई रोशनी, बुलंदी, मरते दम तक, जंगबाज़, महावीरा, नीलकमल, मर्यादा, हिंदुस्तान की कसम, वासना, कर्मयोगी, धर्मकांटा, गलियों का बादशाह, साज़िश, एक था राजा आदि.
राजकुमार ने एक एंग्लो इंडियन विमान परिचारिका जेनिफर से प्रेम विवाह किया था. बाद में उनका नाम गायत्री हो गया. राज कुमार उर्दू के बहुत अच्छे ज्ञाता होने के साथ-साथ डिज़ाइनर कपडे पहनने के भी शौक़ीन थे.
बताया जाता है, जब राजकुमार की बीमारी के बारे में दिलीप कुमार को पता चला तो उन्होंने फ़ोन पर खैर-सल्लाह पूछी. राजकुमार ने उस गंभीर स्टेज पर भी अपनी यूनिक स्टाइल नहीं छोड़ी – जानी, हम राजकुमार हैं. सर्दी-ज़ुकाम थोड़े ही होगा. हमें कैंसर हुआ है, कैंसर…इसके कुछ ही दिनों बाद 03 जुलाई 1996 को वो परलोक सिधार गए. उन्हें मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था.
उस रात उन्होंने सबको घर भेज दिया. वो नहीं चाहते थे कि उनके चेहरे पर आया मौत का भयानक मंज़र उनके परिवारीजन देखें. ‘दिल एक मंदिर’ में वो इसका अहसास कर चुके थे.
(चेतना विकास मिशन)





