अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

आजाद ही रहे हैं….., आजाद ही रहेंगे….!

Share

सुसंस्कृति परिहार ये भारत की स्वाधीनता के क्रांतिवीर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की शायरी की पंक्तियों के अंश हैं ।जो कह दिया तो फिर करके दिखाने वाले  चंद्रशेखर ‘आजाद’ को बचपन में एक बार अंग्रेजी सरकार ने 15 कोड़ों का दंड दिया तभी उन्होंने प्रण किया कि वे अब कभी पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। वे गुनगुनाया करते थे :- ‘दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे।आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।।’“मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूंगा” यह नारा था भारत की आजादी के लिए अपनी जान की कुर्बानी देने वाले देश के महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का। मात्र 24 साल की उम्र जो युवाओं के लिए जिंदगी के सपने देखने की होती है उसमें चन्द्रशेखर आजादअंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए शहादत दी ।आज  27फरवरी 1931 उनकी  पुण्यतिथि है सनद रहे कि ‘आजाद’ के अतिरिक्त काकोरी कांड के सभी क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया था। बस, ‘आजाद’ ही आजाद घूमते रहे। वे अपनी अंतिम सांस तक सरकार के हाथ नहीं  आए ।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक एवं लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। झाबुआ जिले में भील बालकों के साथ खेलते हुए चन्द्रशेखर आजाद ने धर्नुविद्या सीख ली थी और निशानेबाजी में वे अच्छी तरह पारंगत थे। 14 वर्ष की आयु में चन्द्रशेखर तिवारी ने बनारस में एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की।  उनका जन्मस्थान भाबरा अब ‘आजादनगर’ के रूप में जाना जाता है।   1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए। जहां उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को अपना निवास बताया।   इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए। जब क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ, तब आजाद उस तरफ खिंचे और ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी’ से जुड़े। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी षड्यंत्र (1925) में सक्रिय भाग लिया और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए।17 दिसंबर, 1928 को चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्यों ही जे.पी. साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकले तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी, जो साण्डर्स के माथे पर लग गई वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया।देश की आजादी के प्रति निष्ठावान आज़ाद ने स्वतंत्रता हेतु जो अभिनव योगदान दिया वह युगों युगों तक अमर रहेगा।        इसके अलावा आज़ाद के कार्य के तीन महत्‍वपूर्ण पहलु उन्‍हें विलक्षण बनाते हैं- पकड़े न जाने और मृत्‍यु तक ‘आज़ाद’ रहने की उनकी योग्‍यता, संभवत: सबसे महत्‍वपूर्ण पहलु है। उनका नाम-आज़ाद या मुक्‍त – स्‍वाधीनता के पश्‍चात के भारतीय का आभामंडल दर्शाता है। उनके इस नाम और पुलिस से परे उनके एक सेना होने के उनके कौशल ने उन्‍हें देश में हरदिल अजीज बना दिया। इलाहाबाद के कंपनी बाग या अल्‍फ्रेड पार्क- जो अब बिल्‍कुल उपयुक्‍त रूप से चंद्र शेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है, में पुलिसकर्मियों के दल के खिलाफ उनका मज़बूती से और अकेले डटे रहना- किसी इंसान की निर्भय और आज़ाद आत्‍मा को दर्शाता है- जो भावी पीढि़यों के लिए प्रेरणादायी है। अपने कुछ साथियों की धोखाधड़ी का शिकार होना उनकी रहस्‍यमयता को और गहरा देता है- इस तरह का विश्‍वासघात उन दिनों आम बात थी। उनकी मृत्‍यु में यह संदेश था : आज़ाद इंसान की तरह जीना और मरना जीवन का विलक्षण लक्ष्‍य है। उसके बाद से उनका अनुसरण करते हुए अनेक लोगों ने राष्‍ट्र की खातिर अपने प्राणों की आहूति दी है।

आज़ाद के व्‍यक्तित्‍व का दूसरा पहलु यह था कि वे एक प्रतिष्ठित हस्‍ती थे, जो अपनी जाति या धर्म की पहचान से ऊपर उठ चुके थे। उनका अपने उपनाम को बदलकर आज़ाद रख लेना उस प्रक्रिया का शुरूआती बिंदु था। कहते हैं कि 15 बरस की आयु में जब पुलिस ने उन्‍हें पहली बार हिरासत में लिया, तो उन्‍होंने अपना नाम आज़ाद और अपने पिता का नाम स्‍वतंत्रता बताया था। दरअसल, उनसे जुड़े सभी तथ्‍यों, किंवदंतियों और लोक कथाओं में कहीं भी उनका धर्म या जाति का उल्‍लेख नहीं मिलता। वे आदि से अंत तक भारतीय थे। यह उनके व्‍यक्तित्‍व का सबसे अनोखा पहलु था और है।

            आज़ाद का तीसरा पहलु, हिंदुस्‍तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) में उनके मित्रों के समान था, और यह इस बात का स्‍पष्‍ट विज़न था कि वे यह क्‍यों कर रहे थे, वे क्‍या कर रहे थे तथा वे आज़ाद भारत को किस रूप में देखना चाहते थे। उदाहरण के तौर पर, जब आज़ाद और उनके मित्र पैसा इकट्ठा करने के लिए सरकारी संपत्ति लूटते थे, तो यह इसके पीछे दोहरा विचार होता था- पहला, ब्रिटिश पुलिस के अधिकार को कमजोर बनाना तथा दूसरा, एक ऐसा संगठन बनाना, जो उपनिवेशी शासन के खिलाफ उठ खड़ा हो सके। न्‍यायसंगत और समान भारत की रचना करने के उनके उत्‍तम और निस्‍वार्थ आदर्शों के अनुरूप, इन डकैतियों को जनता ने – अपराध नहीं, बल्कि रॉबिन हुड की गतिविधियों की तरह माना, लेकिन इन्‍हें अन्‍याय के खिलाफ विद्रोह के रूप में देखा गया। वह लम्‍बा समय,  जो आज़ाद ने अधिकतर झांसी के समीप गुप्‍त रूप से बिताया था, उस दौरान उन्‍होंने शिक्षक की भूमिका निभाते हुए आसपास के गांवों के गरीब बच्‍चों को पढ़ाया-लिखाया।

        यकीनन चंद्रशेखर आज़ाद आज भी मौजूद हैं  हमारे दिलों में जीवित हैं। उन्‍हें प्रयागराज के चंद्र शेखर आज़ाद पार्क में सजीव और विश्‍वास से भरपूर, अपनी मूंछों पर ताव देते, अपने दौर के बाद लम्‍बा फासला तय कर आए भारत के बारे में संतोष के साथ विचारमग्‍न देखा जा सकता है। उन्हें शत शत नमन।यह भी सच है आज़ाद थे इसलिए हम आज़ाद है।अब हम सबकी जिम्मेदारी है कि उनकी पुण्यतिथि पर यह सबक याद रखें कि हम आज़ाद थे और आज़ाद रहेंगे।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें