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 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय ओंकार नाथ खरे को 98 वीं जयंती पर याद किया

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रीवा । विंध्य क्षेत्र के प्रख्यात ताम्रपत्रधारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय श्री ओंकार नाथ खरे को 98 वीं जयंती पर नेहरूनगर रीवा में विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए याद किया गया । 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में स्वर्गीय खरे की क्रांतिकारी भूमिका इतिहास के पन्नों के साथ जन स्मृतियों में दर्ज है । स्वर्गीय खरे को 17 वर्ष की अल्पायु में देश की आजादी के आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण 13 माह तक रीवा केंद्रीय जेल में रखा गया था वहीं उन्हें 21 बेतों की सजा भी दी गई थी । नंगे बदन लगाई जाने वाली हर बेंत पर विंध्य के वीर सपूत श्री खरे क्रांतिकारी उद्घोष करते रहे । सन 1947 में दरबार कालेज रीवा के छात्र संघ के चुनाव में वे अध्यक्ष निर्वाचित हुए । स्वर्गीय खरे ने विंध्य क्षेत्र में समाजवादी आंदोलन को गतिशील बनाने में अहम भूमिका अदा की थी । बाद में प्रशासनिक सेवा क्षेत्र में भी ईमानदारी से काम किया जिसके चलते वहां भी संघर्ष चलता रहा लेकिन मरणोपरांत भी न्याय नहीं मिला | 20 अक्टूबर 1990 को 65 वर्ष की आयु में स्वर्गीय खरे ने नश्वर संसार में अंतिम सांस ली | 

इस अवसर पर समाजसेवी दीपक गुप्ता एडवोकेट ने बताया कि जिलाध्यक्ष कार्यालय रीवा के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में नाम दर्ज होने के बावजूद राज्य शासन के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जयंती एवं पुण्यतिथि पर याद करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है । सरकार के प्रतिनिधि जिले के पांच स्वतंत्रता सेनानियों के नाम मुंह जबानी बताने की स्थिति में नहीं है । श्रद्धांजलि के रूप में दो फूल भी उपलब्ध नहीं है । स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों को संबंधित प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं । यह भारी विडंबना है कि आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष के दौरान भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों एवं उनके परिजनों के साथ अत्यंत भेदभावपूर्ण अपमान जनक रवैया देखने को मिल रहा है । 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय ओंकार नाथ खरे के ज्येष्ठ पुत्र लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि देश के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के बारे में लोगों की जानकारी और जिज्ञासा धीरे-धीरे खत्म हो रही है , जो किसी भी रुप में अच्छी बात नहीं है । श्री खरे ने कहा कि देश का लोकतंत्र भ्रष्ट चुनाव प्रणाली का शिकार बन चुका है , इसके चलते जहां नागरिक आजादी को गंभीर खतरा है , वहीं देश की आजादी को भी बड़ी चुनौती मिल रही है। महंगे और जातीय सांप्रदायिक आधार पर हो रहे चुनाव में योग्य एवं ईमानदार प्रत्याशियों का चयन काफी मुश्किल हो गया है । यह काफी चिंताजनक बात है कि आजादी के 75 सालों में भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सपनों का भारत नहीं बन सका है बल्कि हालत बद से बदतर होती जा रही है।

Ramswaroop Mantri

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