डॉ. विकास मानव
तिब्बत अति दुर्गम देश है : इस सच को सब स्वीकार करते हैं। वहां के शासकों ने विदेशियों के लिए खासकर पाश्चात्य देशों के लिए तिब्बत में प्रवेश का मार्ग बन्द रखा। इसलिए तिब्बत की प्राचीन संस्कृति और साहित्य, योग-तंत्र से सम्बंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ पूर्णरूप से नष्ट नहीं हो पाए।
वर्तमान समय भी तिब्बत में तंत्र-मंत्र, टोना-टुटका व्यापक रूप से प्रचलित हैं। वहां का वायुमंडल भूत, प्रेत, पिशाच आदि अपदेवताओं से भरा पड़ा है।
तिब्बत के सांस्कृतिक और योग-तांत्रिक रहस्यों को समझने के लिए कई विदेशियों ने भगीरथ प्रयत्न किया–इसमें कोई संशय नही है। उन्हीं विदेशियों में एक थी–मैडम अलेक्जेंड्रा डेविड नील। वह एक फ्रांसीसी महिला थी।
वह किसी प्रकार अज्ञात ढंग से तिब्बत के रहस्यमय वातावरण में प्रवेश कर ही गई। लेकिन उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट झेलने पड़े। किस प्रकार अपने रूप-रंग को छिपाकर रहना पड़ा, किस प्रकार तिब्बत के तिमिराच्छन्न रहस्यों को उद्घाटित करना पड़ा। कहने की आवश्यकता नहीं– इन सभी बातों का सांगोपांग वर्णन मिस डेविड नील ने अपनी पुस्तक “माई जर्नी टू ल्हासा” (मेरी ल्हासा यात्रा) में किया है।
एक-दो नहीं, पांच बार तिब्बत की दुर्गम यात्रा की मिस डेविड नील ने और पन्द्रह वर्ष वहां रहकर लामाओं से योग का प्रशिक्षण लिया और अंत में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली उन्होंने। सबसे पहले वह भारत आयीं और वेदांत दर्शन का अध्ययन किया उन्होंने।
सन 1980 तक वे जीवित रहीं। अपने जीवन काल में पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी लेखन-कार्य किया था। सन 1971 ईसवी में प्रकाशित उनकी पुस्तक “With Mystics And Magicians In Tibbat” में विस्तार से लामाओं की सिद्धियों, उनके योगाभ्यास और तांत्रिक चमत्कारों का वर्णन किया है।
मिस डेविड नील जब दूसरी बार वाराणसी आयीं तो मानसमर्मज्ञ विजयानंद त्रिपाठी के माध्यम से मेरा उनसे परिचय हुआ। यह मेरे स्कूली जीवन का समय था. मिस डेविड नील उनका प्रवचन सुना करती थी।
तिब्बत के योग-तंत्र और जादू-टोना के प्रति शुरू से ही मेरे मन में आकर्षण था। एक बार अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए तिब्बती योग-तंत्र आदि के विषय में पूछने पर मिस डेविड नील ने विस्तार से बतलाते हुए कहा : तिब्बत में कई प्रकार के योगाभ्यास हैं जिन्हें तिब्बती भाषा में ‘लुगोम’ कहते हैं। वास्तव में ‘लुगोम’ का अर्थ है–तीव्र गति से अभ्यास करना। प्राचीन काल से ही तिब्बत में लुगोम की शिक्षा देने की परंपरा चली आ रही है। तिब्बत में एक प्रिसिद्ध मठ है जिसका नाम है– शालू मठ।
सिद्ध लामा ‘वुस्तोन’ द्वारा स्थापित वह मठ लुगोम की शिक्षा के लिए विख्यात है।
लुगोम योगविद्या की साधना है। इसका साधक पहले एक मोटे गद्दे पर पद्मासन की मुद्रा में बैठता है, फिर वह प्राणायाम की पूरक विधि से अपना शरीर प्राणवायु से भरता है, फिर कुम्भक की अवस्था में आसनबद्ध ही वह ऊपर की ओर उछलने का अभ्यास करता है। यह अभ्यास वर्षों चलता है। स्त्रियां भी इसकी शिक्षा लेती हैं।
इस साधना के अभ्यास से शरीर बहुत हल्का हो जाता है। आकाश में उड़ने तक की सामर्थ्य आ जाती है।
शालू मठ में पहले साधक के शरीर के बराबर भूमि में एक गड्ढा खोदा जाता है, फिर उस पर उतना ही बड़ा एक गुम्बद बनाया जाता है जिसमें ऊपर की ओर एक छेद रहता है। साधक की ऊँचाई यदि 5 फ़ीट 5 इंच है तो छेद 10 फीट 10 इंच गड्ढे की तह से होगा। साधक गड्ढे में बैठकर अभ्यास करता है। साधक को इसमें 3 वर्ष तक रहना पड़ता है। वह बराबर कुम्भक की अवस्था में उछलता रहता है। जब उसमें इतनी सामर्थ्य आ जाती है कि उछलकर वह छेद से बाहर निकल जाए, तब उसे सफल मान लिया जाता है और उसे ‘मेसे'(महे-के-तंत्र) की उपाधि से विभूषित किया जाता है।
परंतु इसके पहले साधक को आसन, प्राणायाम और मन्त्र-जप का अभ्यास करना पड़ता है। इसमें जब सफलता मिल जाती है, तब ही लुगोम की शिक्षा प्रारंभ होती है। आजकल दौड़ने की प्रतियोगिता होती है। इसमें लोग दौड़ने का अभ्यास करते हैं, पर शीघ्रगमन की विद्या दूसरे प्रकार की है। इसमें दौड़कर नहीं, आसन जमाकर बैठने के साथ अभ्यास करना पड़ता है।
मिस डेविड नील ने बताया–जब यह सिद्धि प्राप्त हो जाती है तो साधक की गति अति तीव्र हो जाती है। वह दौड़ता नहीं, एक प्रकार से वह उछलता हुआ चलता है। उसके हाथ में एक मन्त्रपूरित कटार रहती है जिसे तिब्बती भाषा में ‘फुर्व’ कहते हैं। साधक उसी कटार पर जोर देकर चलता है। श्वास-प्रश्वास के साथ मंत्रजप चलता रहता है। वह न किसी से बोलता है और न तो किसी की ओर देखता ही है।
मार्ग में उसे कोई देखता भी नहीं। टोक देने पर दोनों का अनिष्ट होने की आशंका रहती है। उसे गुजरते हुए देखकर लोग प्रणाम कर चुपचाप खड़े रहते हैं। ऐसा लगता है कि वह समाधि की अवस्था में चल रहा है। योग की ‘लघिमा सिद्धि’ के अंतर्गत इसकी गणना होती है। मिस डेविड नील ने बतलाया–उन्होंने तिब्बत प्रवास में ऐसे तीन लामाओं को देखा था।
समय के कम होने से उस दिन मिस डेविड नील से अधिक चर्चा न हो सकी। लगभग एक सप्ताह बाद अचानक गंगा-तट पर बैठी मिल गईं वह मुझको। मेरी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उनके समीप जाकर बैठ गया। मुस्कराकर एक बार देखा उन्होंने मेरी ओर फिर बोली–कुछ साधना करते हो ?
हाँ ! प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करता हूँ।
बहुत ठीक–बोली वे–योग के साधक को द्वंद्वातीत होना चाहिए। अति आवश्यक है यह। स्थूल रूप से इसके लिए पहले शीत और फिर गर्मी सहन करने की शक्ति होनी चाहिए।
मिस डेविड नील ने आगे बतलाया : सागर की सतह से तिब्बत की ऊंचाई लगभग ग्यारह हजार से अठारह हज़ार फीट तक है। ऐसे में निर्वस्त्र रहना अथवा साधारण कपड़े पहन कर घूमना सहज बात नहीं है। फिर भी कितने लामा ऐसा करते हैं।
तिब्बती भाषा में यह अभ्यास ‘तूमो’ कहलाता है जिसका मतलब है–तेज। शरीर में गर्मी पैदा करने की यह विद्या बहुत गोपनीय रखी जाती है। इसकी शिक्षा प्राप्त करने के पहले प्राणायाम, चित्त की एकाग्रता और समाधि का कुछ अभ्यास आवश्यक है। इसकी शिक्षा निर्जन एकांत में बर्फ की पहाड़ियों पर दी जाती है।
शिक्षा देते समय केवल गुरु ही पास रहता है। इसका समय सूर्योदय से पहले होता है। साधक को या तो नग्न रहना पड़ता है या केवल एक साधारण सूती वस्त्र धारण करना पड़ता है। वह चटाई पर पद्मासन लगाकर बैठ जाता है। फिर वह कई प्रकार के प्राणायाम के अभ्यास और कुछेक मंत्रों का जप करता है।
शरीर में वैसे तो हज़ारों नाड़ियां है पर उनमें से तीन नाड़ियां मुख्य हैं–इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इनमें ‘पिंगला’ सूर्य नाड़ी है। उसे जाग्रत करना पड़ता है। इसकी शिक्षा के 10 स्तर होते हैं जिनको पूरा करने में पर्याप्त समय लग जाता है। विशेषकर इसमें हठयोग की प्रक्रियाएं हैं।
ऐसा कहा जाता है कि इसे तिब्बतियों ने भारत के गुरु ‘नरोपा’ (नरोत्तम्पाद) से प्राप्त किया था। इसमें सूर्य और अग्नि की कल्पनाएं करनी पड़ती हैं और वे सारे शरीर में व्याप्त हैं–ऐसी कल्पना भी करनी पड़ती है और ऐसा ही अनुभव भी करना पड़ता है।
इस विद्या को सीखने के बाद इसकी परीक्षा होती है। शीतकाल की रात्रि में जब तीव्र वायु चल रही हो तब साधक को किसी नदी या सरोवर के किनारे ले जाया जाता है। बर्फ यदि जम गई है तो उसमें एक गड्ढा खोदकर उसी में बैठा दिया जाता है। साधक बिल्कुल नग्न होकर उसमें बैठ जाता है। फिर एक सूती चादर को वर्फ के पानी में भिगोकर उसे ओढ़ा दिया जाता है। जब वह चादर सूख जाती है तब उसे दूसरी चादर ओढ़ा दी जाती है।
जो साधक इस तरह सबसे अधिक चादरें सुखा देता है, वही परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कहा जाता है कि कम-से-कम तीन चादरें सुखाना तो बहुत ही आवश्यक है। ऐसे ही साधक को ‘रेस्पा’ कहते हैं। कुछ विरले लोग तो 40-40 चादरें सुखा डालते हैं।
दूसरी परीक्षा यह होती है कि जो साधक बैठकर सबसे अधिक बर्फ पिघला दे, वह प्रथम माना जाता है। अभ्यास पूर्ण होने पर उच्च श्रेणी के साधकों को कभी भी किसी ऊनी या सूती वस्त्र न पहनने की प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है। तिब्बती लामाओं को अपनी इस विशेष सिद्धि पर बड़ा गर्व है।
मिस डेविड नील ने कहा : मैंने स्वयं इस ‘तुल्य’ की सिद्धि प्राप्त की थी। मैंने एकांत में रहकर एक महंत की भावना की थी। मेरा ध्यान उसी पर केंद्रित रहता था। कुछ दिनों में वह भावना मूर्तिमयी हो गयी। वह महंत मूर्तिमान होकर मेरे साथ रहने लगा। मैं उससे काम भी लिया करती थी। पहले मुझे संदेह हुआ यह मेरे मन का मात्र भ्रम है।
पर कुछ लोग जो इस बात को जानते तक नहीं थे–उन्होंने बतलाया कि डेरे में मेरे साथ एक ऐसा महंत बैठा रहता है कि ठीक जैसा मैंने कल्पना में सोचा था। मेरी कल्पना साकार हो गयी थी। मैंने अपनी आंखों से कुछ लामाओं को सहसा गायब और प्रकट होते भी देखा है। लामाओं को आकाश में उड़ते हुए, उन्हें गमन करते हुए भी देखा है।
परकाया प्रवेश विद्या भी अभी तक लामाओं में पाई जाती है। ऐसी विद्याएं सीखने के लिए कठोर अभ्यास किया जाता है। इसके लिए एकांतवास अति आवश्यक है।
इसके कई नियम भी हैं। जिन स्थानों में निवास किया जाता है, उनको ‘सम्स’ कहते हैं। इनके अनेक प्रकार होते हैं। अभ्यास साधारण से उत्तरोत्तर कठोर होते जाते हैं। पहले इसके लिए लामा एक कोठरी में अपने को बन्द रखता है। निश्चित समय पर कुछ समय के लिए वह कोठरी के बाहर आता है। धीरे-धीरे वह इसे कम करता जाता है।
यदि कोई उससे मिलने आता है तो पर्दे के आड़ में रहकर वह बात करता है। थोड़े दिन बाद वह साधक केवल एक व्यक्ति से ही कुछ बात कर सकता है और अंत में वह पूर्णरूप से मौन हो जाता है। कोठरी की खिड़कियां और दरवाजे वह धीरे-धीरे बन्द कर देता है। केवल एक छिद्र में से आकाश का दर्शन करता है। कुछ दिनों के बाद इससे भी अपने को वंचित कर लेता है। उसके लिए दिन और रात एक समान होते हैं।
उसके लिए केवल भोजन पहुंचा दिया जाता है। इस प्रकार के तपोमय एकांत जीवन को व्यतीत करने की अवधि निश्चित रहती है। कोई-कोई तो इसका आजीवन व्रत ले लेते हैं। इस साधना के लिए कोठरी या गुफा किसी एकांत स्थान में बनाई जाती है। इसमें रहकर उसको कठोर तपस्या करनी पड़ती है। उंसका पूरा समय आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारणा, जप आदि में ही व्यतीत होता है, इसलिए उसे अकेलापन नहीं अखरता।
गुरुओं द्वारा उसकी कठोर परीक्षा भी होती है। सिर पर दीपक रखकर चित्त की एकाग्रता की परीक्षा होती है।
इसी संदर्भ में मिस डेविड नील ने आगे बतलाया कि जितने प्रकार के तिब्बती योग हैं, उनमें ‘तुम मो’ अति महत्वपूर्ण है। ‘तुम मो’ का अर्थ है–शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उष्णता। यह तिब्बती ध्यान की एक विशेष प्रक्रिया है।
तिब्बती योग-तांत्रिक साधना से सम्बंधित जितने भी प्राचीन विज्ञान हैं, उनमें से बहुत-से तो लुप्तप्राय हो चुके हैं और जो बचे भी हैं, वे अपनी मुमुर्षु अवस्था में हैं। जो मुमुर्षु अवस्था में हैं, उनमें एक परम विज्ञान है–‘नेत्र विज्ञान’। इस परम विज्ञान ‘नेत्र विज्ञान’ के ज्ञाता अब बहुत ही कम रह गए हैं तिब्बत में।
जो हैं भी वे इस विज्ञान के सम्बन्ध में कुछ भी बतलाने के लिए तैयार नहीं होते। नेत्र विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है–‘तीसरा नेत्र’ जिसका सम्बन्ध ‘आज्ञाचक्र’ से है। आज्ञाचक्र के भेदन का अर्थ है–तीसरे नेत्र का खुलना।
ऐतिहासिक गणना की दृष्टि से योग का इतिहास लगभग 20 हज़ार वर्ष पुराना है और अपने 20 हज़ार वर्ष के जीवन-काल में वह निरंतर यही कहता आ रहा है कि आज्ञाचक्र से सम्बंधित मस्तिष्क का कम-से-कम आधा भाग निष्क्रिय और प्रसुप्त पड़ा रहता है।
अगर मनुष्य को इस लौकिक जगत से परे पारलौकिक जगत या अन्य किसी जगत के विषय में कुछ जानना-समझना है तो उस निष्क्रिय और प्रसुप्त पड़े भाग को सक्रिय और जाग्रत करना आवश्यक है।
योग के अनुसार आज्ञाचक्र के मध्य में एक बिंदु है। वही बिंदु है–“तीसरा नेत्र”। वह बिंदु मस्तिष्क में लगभग डेढ़ इंच भीतर होता है। वास्तव में वह रहस्यमय बिंदु अतीत या ‘भावातीत जगत’ की ओर खुलने वाला महत्वपूर्ण द्वार है।
यहां यह बतला देना आवश्यक है कि नेत्र की बहुत-सी संभावनाएँ हैं जो सुप्त हैं। सच बात तो यह है कि मनुष्य की प्रत्येक इन्द्रिय की बहुत-सी संभावनाएं होती हैं जो सब सुप्तावस्था में पड़ी हुई होती हैं। इस संसार में मनुष्य को जो भी अविश्वसनीय चमत्कार दिखलाई पड़ते हैं, वे वास्तव में सुप्त पड़ी संभावनाओं की एक साधारण-सी झलक मात्र होते हैं।
परामनोविज्ञान का कहना है कि सुप्त संभावनाएं कहीं से और किसी रूप में कभी भी प्रकट हो सकती हैं जिन्हें देखकर मनुष्य एकबारगी चमत्कृत हो उठता है। ज्ञात होना चाहिए कि वे संभावनाएं मनुष्य के भीतर ही हैं, बाहर नहीं। लेकिन उनका बाहर निकलने का मार्ग बन्द है।
जैसे आधे मस्तिष्क के सक्रिय होने की बात है, यह योग की दृष्टि है और जैसा कि ऊपर कहा गया है कि योग की दृष्टि सौ-दो सौ वर्षों की धारणा नहीं है, बल्कि पूरे 20 हज़ार वर्षों की परिपुष्ट अवधारणा है। आज के विज्ञान का तो कोई भरोसा नहीं। उसकी धारणा आज कुछ है तो कल कुछ और है। लेकिन योग की यह परिपुष्ट दृष्टि जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है और न ही हो सकता है।
आज्ञाचक्र योग-तंत्र के षट्चक्रों में अपना एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके भेदन का अर्थ है–तीसरे नेत्र का खुलना और आन्तर जगत से सम्बन्ध स्थापित होना। लेकिन यह सब तभी सम्भव है जब प्रसुप्त और निष्क्रिय आधा मस्तिष्क जाग्रत और सक्रिय हो।
तिब्बत ने इसी के लिए एक विशेष प्रकार की शल्यक्रिया का अविष्कार किया। सच पूछा जाय तो यह अविष्कार तिब्बत ही कर सकता था क्योंकि तीसरे नेत्र पर तिब्बत ने जितना परिश्रम किया है, उतना और किसी देश की सभ्यता ने नहीं किया है।
यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो तिब्बत का सम्पूर्ण विज्ञान मानव जीवन के अनेक आयामों का विज्ञान है जो तीसरे नेत्र के विज्ञान पर ही आधारित है।
हज़ार साल पहले योगी मिलरेप ने ‘तुम मो’ को सिद्ध कर लिया था, जीवन में आयत्त कर लिया था। उसी की सहायता से वे महीनों नग्न अवस्था में रहते थे–शीतोष्ण के कष्टों से बिल्कुल मुक्त।
अब तक मिस डेविड नील ने तिब्बत के सम्बन्ध में, वहां के लामाओं के सम्बन्ध में और उनकी विलक्षण व अविश्वसनीय साधनाओं के सम्बन्ध में जो कुछ बतलाया; उसे सुनकर उसी समय मेरे मस्तिष्क के किसी कोने में एक लालसा जाग उठी थी तिब्बत यात्रा की। उनका एक-एक शब्द प्रेरणादायी हुआ मेरे लिए।
अधिकांश लोगों को तिब्बत की आध्यात्मिकता, दिव्यदृष्टि और सुदूर स्थित व्यक्ति के मन को प्रभावित करने की क्षमता में विश्वास नहीं होगा लेकिन ये बातें उतनी ही सत्य हैं जितना सूर्य और सूर्य-प्रकाश।
निश्चित ही तिब्बत में ऐसे सिद्ध लामाओं की कमी नहीं है जो हिमशिला पर निर्वसन बैठकर अपने शरीर का तापमान इतना अधिक बढ़ा लेते हैं जिससे वर्फ गल जाती है। तिब्बत में ऐसे भी लामाओं का अभाव नहीं है जो ज़मीन से उठकर शून्य में अवस्थित रहते हैं।
लेकिन ये सब सामान्य सिद्धियां हैं और जो वास्तव में सिद्ध पुरुष हैं वे इस तरह के चमत्कारों से दूर रहते हैं।
हमारी मान्यता है कि शरीर आत्मा को धारण करने वाला एक ‘पिंजरा’ मात्र है। आवश्यकता केवल सीखने की होती है कि उस पिंजरे के द्वार से बाहर कैसे आया-जाया जाय। ऐसा हो जाने पर शरीर से सम्बन्ध टूट जाते हैं। विचारों की गति के सहारे मनुष्य स्वेच्छा से सर्वत्र भ्रमण कर सकता है।
विचार-शक्ति की अपनी तरंगें हैं और पदार्थ घनीभूत शक्ति है। विचारों पर नियंत्रण हो जाने पर कितनी भी दूर अवस्थित किसी भी व्यक्ति को अपनी मनःशक्ति से प्रभावित करना कठिन नहीं है।
हम मानते हैं कि मनुष्य अमर है शरीर का परिवर्तन उसी प्रकार होता है जिस प्रकार वस्त्र बदले जाते हैं। मनुष्य के विभिन्न शरीर यात्रा में मिलने वाले भिन्न-भिन्न वाहन मात्र हैं। एक को छोड़ा, दूसरा पकड़ लिया, दूसरा छोड़ा, तीसरा पकड़ लिया।
लेकिन मनुष्यात्मा की यात्रा निरंतर जारी रहती है और जारी रहता है उंसका जीवन भी। जीवन कभी समाप्त नहीं होता। जीवन का अंत मुक्ति में होता है, मोक्ष में होता है।
फिर न संसार में आवागमन है और न ही है शेष कोई कर्म-भोग। कर्म-भोग से मुक्ति ही आवागमन से मुक्ति है, मोक्ष है।
जन्म और मृत्यु परस्पर अवलंबित हैं। जन्म हुआ है तो मृत्यु ध्रुव सत्य है और मृत्यु हुई है तो पुनर्जन्म भी निश्चित है। जीवन एक चक्र के समान निरंतर घूमता रहता है। आत्मा को विश्राम नहीं मिलता। आत्मा को विश्राम मोक्ष में मिलता है।
आत्मा एक प्रकार की ज्योति है जो शरीर-भेदन कर प्रकाशित होती है। वह ज्योति मृत्यु के समय मंद पड़ जाती है। शरीर से निकलने के बाद अपनी स्वतंत्र सत्ता और उसकी प्रकृति के अनुसार आत्मा कुछ समय के लिए वासना-क्षीण होने तक प्रेतयोनि में चली जाती है. प्रेत का रूप धारणकर अनेक प्रलोभनों के चलते भटकती रहती है।
हमें ऐसी अनेक धार्मिक क्रियाओं का ज्ञान है जिनके द्वारा इस प्रकार के प्रेतों का मार्गदर्शन किया जा सकता है।
पुनर्जन्म पर मेरा विश्वास है किंतु यह आवश्यक नहीं है अगला जन्म इसी पृथ्वी पर होगा। ऐसी अनंत पृथ्वियां हैं जहाँ प्राणियों के निवास हैं। कुछ पृथ्वियों के निवासी हम से भी अधिक उन्नत स्थिति में हैं।
तिब्बत में ऐसे भी कई लामा हैं जिन्होंने उन पृथ्वियों से सम्बन्ध स्थापित किया है। उनका कहना है कि वे हमें अजायबघरों के जीव-जंतुओं के समान देखते हैं। हम उनके लिए कौतूहल के विषय हैं।
मुझसे एक ऐसे लामा से भेंट हुई थी जिसका पिछला जन्म किसी अन्य पृथ्वी पर हुआ था। बाद में उंसका पुनर्जन्म हुआ हमारी इसी धरती पर। उंसका कहना था कि इस धरती से उस धरती में काफी अंतर है। यहां और वहां के समय में भी काफी अंतर है। वहां आयु अधिक है और कर्म की भी यहां की तरह स्वतंत्रता है। मगर वहां छल, प्रपंच, ईर्ष्या, द्वेष आदि नहीं हैं। वहां का जीवन आनंदमय है।
शरीर का बन्धन टूट जाने पर आत्मा इस बात के लिए स्वतंत्र हो जाती है कि जैसे भूत, वर्तमान और भविष्य में वह विचरण करती है, वैसे ही लोक-लोकान्तरों में भी समान रूप से विचरण कर सके।
शरीर के बन्धन टूटने से मिलने वाली स्वतंत्रता कठिन साधना द्वारा जीवित अवस्था में ही प्राप्त की जा सकती है। अनेक सिद्ध पुरुषों ने वैसी सिद्धियां प्राप्त की हैं। मेरे तिब्बत भ्रमण-काल में ऐसे सिद्ध महापुरुषों से मेरी भेंट हुई थी।
उनमें हज़ारों वर्ष पीछे अतीत में प्रवेश की क्षमता थी और इसी प्रकार हज़ारों वर्ष भविष्य में प्रवेश करने की भी।
निद्रावस्था में जब आत्मा शरीर से अलग होकर बाहर विचरण करती है तो एक अदृश्य रुपहले तार से शरीर और आत्मा का सम्बन्ध बना रहता है। इस तार के टूटने को ही ‘मृत्यु’ कहते हैं। ये साधनाएं और सिद्धियां अत्यन्त दुष्कर हैं। लेकिन उन्हें प्राप्त करने वाले योगियों और तिब्बती लामाओं की कमी नहीं है आज भी।
हाँ, यह अवश्य है कि लाखों में से विरला ही कोई ऐसी सिद्धि पाने का अधिकारी बनता है।
यह सब पढ़-सुनकर यह प्रश्न उठता है कि लामाओं में जब ऐसी सिद्धियां हैं तो उनके देश “तिब्बत” की इतनी दुर्दशा क्यों हो रही है ?
इसके उत्तर में उनका कहना है–जो बात पूर्व निश्चित है–वह अवश्य होगी। होनी को कभी भी किसी हालात में टाला नहीं जा सकता।
यह निश्चित है कि तिब्बत में योग-तंत्र का विपुल भंडार है, उसे समय-समय पर भारत ने ही भरा है। यह भी सत्य है कि विदेशियों के आक्रमण से भारत की जितनी हानि हुई, उनमें भारत से आध्यात्मिक विद्याओं का लुप्त हो जाना भी एक प्रबल हानि है।
लेकिन अभी भी योग-तंत्र जैसी आध्यात्मिक विद्याएं कुछ सीमा तक अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित हैं तिब्बत में–इसमें संदेह नहीं।
ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय के ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ की उपाधि से विभूषित इवान्स वेट्स ने तिब्बती योग का अच्छा अध्ययन किया है।
स्वर्गीय लामा ‘दवा सन्दूप’ की सहायता से जो कुछ काल तक कलकत्ता विश्वविद्यालय में तिब्बती भाषा के प्राध्यापक थे, उन्होंने योग-तंत्र आदि की कई तिब्बती पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। इन पुस्तकों की भूमिका और टिप्पणियों में उन्होंने बड़ी विद्वता के साथ इन जटिल विषयों की चर्चा की है।
पहली पुस्तक ‘तिब्बतन बुक ऑफ द डेड’ (तिब्बती मृतक शास्त्र) है जिसमें मृत्यु के बाद जीव किस लोक में रहता है और किस तरह दूसरे शरीर में उसका जन्म होता है, यह बतलाया गया है। दूसरी पुस्तक में वहां के प्रसिद्ध योगी ‘मिलरेप’ जिसका जन्म 1052 में हुआ था, का जीवन-चरित्र है। तीसरी पुस्तक में तिब्बती योग है जिसमें वहां के योग तथा तंत्र की सात पुस्तकों का संग्रह है।
योग-तंत्र आदि की सिद्धियों के अलावा वहां भौतिक विज्ञान के भी ऐसे चमत्कार देखने को मिलते हैं जिनसे आजकल के वैज्ञानिकों की बुद्धि चकरा जाती है। इस पर बीद अवर्ने ने प्रकाश डाला है।
उन्होंने तिब्बत जाकर बड़े परिश्रम से खोज की है और अपने अनुभवों का वर्णन एक लेख में किया है जो सन 1940 में ‘विहार उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी जरनल’ में प्रकाशित हुआ है।
सन 1940 में ‘बिहार-उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी प्रकाशित जनरल’ में कहा गया है कि वहां कितनी ही ऐसी घटनाएं देखने को मिली जिनका प्रत्यक्ष कारण वैज्ञानिकों की समझ में नहीं आ सकता, पर उनमें भी कार्य-कारण का नियम लागू हो सकता है। आवश्यकता है उचित अनुसंधान की।
बड़े भारी पत्थरों को जिनको बिना यन्त्र की सहायता से उठाना कठिन है, वहां के लोग सहज ही उठा लेते हैं। एक दस मन का पत्थर पड़ा हुआ था। एक लामा ने अपनी कटोरी से कोई गाढ़ा तेल उस पर तांबे के तार की एक कूची से छिड़का। पांच मिनट बाद जब #अवर्ने ने उस पत्थर को उठाया तब उसका वजन लगभग एक सेर (1 किलो से कम) रह गया था। उन्हें आश्चर्यचकित होते देखकर लामा ने हंसते हुए कहा–अब तो हमारी बात पर विश्वास होगा। दो घण्टे बाद पत्थर का वजन पहले जैसा ही हो जाएगा।
हुआ भी ऐसा ही। कारण पूछने पर लामा ने बतलाया–कुछ काल के लिए उसे पृथ्वी पर सुला दिया गया है अर्थात पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त करा दिया गया है। इस कार्य में किसी मन्त्र-शक्ति का उपयोग नहीं किया गया है। यह कुछ रासायनिक दृव्यों का प्रभाव मात्र है।
जिस प्रकार जल से आग बुझ जाती है, गर्मी से पानी भाप बन जाता है, उसी प्रकार से रासायनिक तेल के प्रभाव से भारी पत्थर भी हल्का हो जाता है। यदि आधुनिक विज्ञान इन दृव्यों का पता लगा ले तो कितना काम बन सकता है !
ऐसे ही एक बार उन्होंने देखा कि एक वृद्ध लामा ने 8 इंच गोल किसी धातु की नली को एक तरफ के ढक्कन को खोलकर और उसे अपने मुंह से लगाकर दो-चार वाक्य धीरे-धीरे बोल दिए।
मिस्टर अवर्ने को उसने आश्चर्य से देखकर कहा–इसके द्वारा मैं चार सौ मील की दूरी पर अपने मित्र युवक लामा जिसकी आयु लगभग 120 साल की है, से बात कर रहा हूँ। पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि यह यंत्र तिब्बत में #गुप्तदूत के नाम से प्रसिद्ध है। इस यन्त्र के जोड़े होते हैं। उनमें से एक, एक व्यक्ति के पास और दूसरा सैकड़ों मील स्थित दूसरे व्यक्ति के पास रहता है।
वे दोनों इस यंत्र की सहायता से परस्पर बातचीत कर सकते हैं। बिना जोड़े के अकेला यन्त्र बेकार है। कुछ वनस्पतियों से यह धातु की नली बनती है जिसमें शब्द पड़ने से वायु में स्पंदन होता है। उस स्पंदन का प्रभाव तत्काल यन्त्र के जोड़े पर पड़ता है। कुछ दिनों के बाद यन्त्र खराब हो जाता है तो कुछ रसायनों से फिर उसकी मरम्मत हो सकती है।
प्राचीन काल में ग्वालजो नामक सम्प्रदाय के लोगों में इसका बड़ा प्रचार था। वे इसके बनाने की विधि गुप्त रखते थे। लेकिन कुछ लोगों को इसका ज्ञान हो ही गया। आज भी इसके बनाने वाले कुछ लामा मिलते हैं।
मैंने स्वयं अपने तिब्बत प्रवासकाल में एक लामा के पास गुप्तदूत यन्त्र देखा था। यदि उसके बनाने की विधि का पता लगाया जाये तो यह यंत्र टेलीफोन, रेडियो आदि से कहीं सस्ता पड़ सकता है।
तिब्बत में पुल बांधने का एक विचित्र प्रकार भी देखने को मिला मुझे। किसी वृक्ष की जड़ का गेंद के बराबर एक गोला किन्हीं रासायनिक दृव्यों में भिगो दिया गया 24 घण्टे तक। फिर वह गोला एक नाले के किनारे जो लगभग 20 फीट चौड़ा था, दो फ़ीट की गहराई में गाड़ दिया गया।
दो दिन बाद उसमें से कई लताओं की शाखाएं फूट निकली जो आसपास की चट्टानों से बड़ी मजबूती से लिपट गईं। वे सर्पाकार लताओं की शाखाएं रेंगती हुई और बढ़ती हुई प्रत्यक्ष दीख पड़ती थीं। जहाँ कहीं उनको जमीन मिलती, उसमें धंस जाती थी वे और पत्थरों-चट्टानों को कसकर पकड़ लेती थी।
नाले के एक किनारे पर से पुल की चौड़ाई भर के 6-6 इंच की दूरी पर सन के मोटे रस्से दूसरे किनारे पर बांध दिए गए और उस पर लताओं की शाखाएं चढ़ा दी गईं। दो-तीन दिन में वे लताएं उन रस्सों के सहारे नाले के उस पार तक पहुंच गईं और खूब मोटी-मोटी हो गईं।
एक सप्ताह के भीतर चार फीट चौड़ा झूले का एक मजबूत पुल तैयार हो गया। यह भी पता चला कि थोड़े ही दिनों के भीतर वे लताएं रस्सों को ख़ाकर, केवल अपने सहारे रहेंगी और जब तक नष्ट नहीं होंगी, तब तक पुल सुरक्षित रहेगा।
यदि पुल को शीघ्र नष्ट करना हो तो एक तार को एकोनाइट पदार्थ में भिगोकर जड़ में गाड़ देने से 20 मिनट के भीतर सारी लताएं सूखकर गिर जाएंगी। ये लताएं वहां तिब्बत में सस्वा कहलाती हैं।
इनका पता लगाकर दूसरी जगह लगाने से नदी-नाले में छोटे-मोटे पुल बनाने की कितनी सुविधा हो सकती है।
तिब्बत का सबसे ऊंचा पर्वत ‘गोखुन पर्वत’ है। उसकी ऊंचाई 18000 फीट है। एक दिन मैं दो-तीन लामाओं के साथ ‘गंधक की झील’ देखने गया। बड़ी गहराई में एक झील थी जहां लंबी-लंबी गुफाओं में से होकर जाना पड़ता था। उन गुफाओं के बीच सौ-सौ फीट के हॉल थे पर प्रकाश का कहीं भी नामोनिशान नहीं था।
गुफा में घुसने पर लामा ने एक घड़ियाल उठाया जो 9 इंच की गोलाई में था। उसी के साथ लकड़ी की एक छोटी-सी मुंगरी बंधी हुई थी। जो खूब चमक रही थी और उसके चारों ओर चांदी के तार की सुंदर-सी एक झालर लगी हुई थी। घड़ियाल पर मुंगरी लगते ही ध्वनि के साथ छः स्थानों पर हल्के हरे रंग की रोशनी हो गयी।
एक मिनट तक तो वह रोशनी धीमी रही फिर तो एक स्थान पर 500 मोमबत्तियों के बराबर प्रकाश हो गया।
20 फीट की दूरी पर जमीन से 6 फीट की ऊंचाई पर दीवालों पर लगी लकड़ी की खूंटियों के सहारे टंगी हुई किसी चीज से वह प्रकाश हो रहा था। अंतिम रोशनी से आगे बढ़ने पर घड़ियाल पर फिर एक चोट की गई और फिर आगे भी वैसा प्रकाश फैल गया।
अंत में लामाओं के साथ झील पर पहुंचा जो 100 फीट लंबी और 60 फीट चौड़ी थी। घड़ियाल पर दो बार चोट की गई और ध्वनि की गई पचासों स्थानों पर प्रकाश जगमगा उठा। देखने पर पता चला वह प्रकाश चार इंच के एक चमकीले पत्थर के टुकड़े से हो रहा था जो किसी धातु की आधा इंच मोटी एक थाली से जड़ा हुआ था।
वह तांबे के तार से लकड़ी के खम्बे पर टंगा हुआ था। पूछने पर लामा ने बतलाया–घड़ियाल की ध्वनि थाली में प्रवेश करती है जिससे वायु में स्पंदन-शक्ति उत्पन्न होती है और उससे चमकीले पत्थर में प्रकाश पैदा होता है। स्पंदन-शक्ति के बलानुसार प्रकाश घटता-बढ़ता रहता है।
यदि घड़ियाल किसी धातु की मुंगरी से बजाया जाय तो प्रकाश इतना तीव्र होगा कि आंखें उसे सहन नहीं कर सकेंगी। वे फूट भी सकती हैं। इतने पर भी न तो पत्थर में और न तो थाली में गर्मी का लेशमात्र भी अनुभव होता था।
लामा लोग प्रायः दीर्घजीवी होते हैं। दूर की घटनाएं जान लेने, मनःशक्ति के सहारे रोगों को अच्छा कर देने, अत्यन्त शीत में भी रह सकने आदि के रहस्यों का उन्हें ज्ञान रहता है।
‘मिस्टर अवर्ने ने’ अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जिन्हें ठीक पाया, उन्हीं का अपने लेख में वर्णन किया है। उनका कहना था कि विज्ञान इनके अनुसंधान से बहुत कुछ लाभ ले सकता है।
इन रहस्यों को जान लेने से वैज्ञानिक साधनों पर जितना खर्च हो रहा है, उसे घटाया जा सकता है। इसमें सन्देह नहीं कि प्राचीन भौतिक विज्ञान भी आधुनिक विज्ञान से कम आश्चर्यजनक नहीं था। परंतु आजकल के वैज्ञानिकों ने उसे टोना-टोटका भर ही समझ कर उपेक्षित कर दिया है।
यह बात अवश्य है कि भौतिक विज्ञान के साथ-साथ उन दिनों योग और तन्त्र की सिद्धियों का भी प्रभाव था पर अब उसकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। धीरे-धीरे वैज्ञानिकों को इसकी सत्यता समझ में आ रही है। यदि थोड़ी देर के लिए इसे न भी माना जाय तो भी भौतिक दृष्टि से प्राचीन विद्याओं के अध्ययन से आज भी बहुत कुछ लाभ उठाया जा सकता है।
कहा जा सकता है कि उन विद्याओं को गुप्त रखकर उनके ज्ञाताओं ने स्वयं ही उन्हें नष्ट कर दिया परन्तु इस संबंध में एक बात ध्यान रखने योग्य है कि केवल अधिकारी को ही किसी विद्या की जानकारी देना–यह सब जगह प्राचीन नियम था।
यह इसीलिए किया जाता था कि उस विद्या का दुरुपयोग न किया जा सके। दूसरी बात यह थी कि उन विद्याओं का उपयोग लोक-सेवा में या लोक-कल्याण में ही किया जाता था। उनसे निजी स्वार्थ-सिद्धि को पाप समझा जाता था।
अपने यहां आज भी साधू महात्मा लोगों को औषधि के चुटकुले बतला देते हैं, पर यह शर्त करा लेते हैं कि उनसे धन न कमाया जाय। यदि ऐसा किया गया तो सब कुछ निष्फल हो जाएगा। बड़े-बड़े वैज्ञनिक अविष्कार भी गुप्त रखे जाते हैं। उनके पेटेन्ट किये जाते हैं।
उनसे फिर धन कमाया जाता है और किया जाता है नरसंहार। इसे देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि ऐसी साधना गुप्त रखने में प्राचीन लोगों ने अपनी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का ही परिचय दिया था।
यह तो हुई तिब्बत की सिद्धियों और चमत्कारों की चर्चा। अगली बार यहां मैं वहां के एक महत्वपूर्ण विज्ञान की चर्चा करूँगा जिसका सम्बन्ध ध्यानयोग से है।





