सौ साल पहले प्रखर विद्वान पत्रकार राहुल बारपुते लोधीपुरा इंदौर में जन्मे थे।इलाहाबाद के नैनी इन्स्टिट्यूट से सन १९४२ में कृषि यांत्रिकी में स्नातक होकर आप इंदौर लौटे और श्रम शिबिर में मज़दूर नेता वी वी द्रविड़ से आपने उनके मज़दूर संघ पत्रिका में नौकरी माँगी।द्रविड़ साहाब ने कहा कि १२ रुपया माहवार वेतन मिलेगा।राहुलजी ने कहा मुझे ११ रुपया ही चाहिए।इस तरह स्वेच्छा से लौटाया रुपया राहुलजी के उदात्त चरित्र का सार था। वहॉ कुछ वर्ष काम करने के बाद तात्यासाहब सर्वटे के मार्फ़त लाभचंदजी छजलानी ने उन्हें नईदुनिया में लिया जहॉं वे आजन्म प्रमुख संपादक रहे।
सन १९५१ में बाबा डिकेने उनकी अभिनय क्षमता देख उन्हें नाटकों में आमंत्रित किया।राहुलजी एक कुशल संपादक ही नहीं उत्कृष्ट अभिनेता थे नाट्य दिग्दर्शक थे।कुछ मराठी नाटकों का उन्होंने हिंदी भाषा में बिना मेहनताना लिए यादगार भाषांतर भी किया था।
एक जिले स्तर का अख़बार होते हुए भी नईदुनिया का देशभर में नाम था।ऊँचे वेतनमान पर टाईम्स ऑफ इंडिया ने राहुलजी को दिल्ली आमंत्रित किया था लेकिन वे गए नहीं।मैंने जब कारण पूछा तो वे बोले मनचाहूं तब कुमार(गंधर्व) का गाना,नाट्य भारती के नाटक और रोज़ दोपहर नई दुनिया में मिलनेवाली सेंव परमल और कचौरी दिल्ली में कहॉं मिलेगी?
स्वेच्छा से समृद्ध ग़रीबी को गले लगानेवाले राहुलजी ने कई्ं ज़िंदादिल पत्रकार तैयार किए जिनमें राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी प्रमुख नाम हैं।
मुझसे उम्र में १८ वर्ष बड़े होने के बावजूद राहुलजी के विचार १८ साल मुझसे जवान थे।वे मेरे मित्र,दार्शनिक और मार्गदर्शिक रहे।नाट्य भारती(१९५५) के वे संस्थापक सदस्य और थिंक टैंक थे। इसी वर्ष हम उनकी जन्म शताब्दी मनाएँगे।
हम सभी का नाट्यभारती की ओर से उनकी पावन स्मृति को सादर नमन।





