अग्नि आलोक
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विकल्प के पूर्व संकल्प निरर्थक?

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शशिकांत गुप्ते

भूषाचार को सरल भाषा में Fashion कहते हैं। यह ऐसी क्रिया है जो,मानव के सर्वांग से लेकर,मानव की त्वचा और बालों को श्रृंगारित करती है।यह क्रिया मानव के पहनावे को भी आकर्षक बनाती है।
फैशन को आधुनिकता पर्याय माना जाता हैं।
मानव के सर्वांग को श्रृंगारित करने के साथ फैशन मानव के चाल-ढाल के साथ बोल-चाल की भाषा पर भी हावी हो गई है।
समाज में बाह्य प्रदर्शन को दुर्भाग्य से सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमाण माना जा रहा है।
इन दिनों राजनीति तो पूरी तरह फैशनेबल हो गई है। राजनीति में जुमले की कीमत हो पंद्रहालाख गई है।
राजनीति से स्वयं को दूर रखने वाले भी राजनीति को भाषा बोलने लगे हैं।
जुमला,घोषणा,वादे,नीति,और संकल्प आदि शब्द राजनीति में परस्पर पर्यायवाची बन गएं हैं।
संकल्प शब्द की अवहेलना तब प्रत्यक्ष दिखाई देती है,जब किसी समूह के साथ विकल्पहीन संकल्प लिया जाता है।
हाल ही में मध्यप्रदेश की व्यापारिक राजधानी कहलाने वाले महानगर में चंद लोगों ने भिक्षा नहीं देने का संकल्प लिया है। उक्त समाचार पढ़ने के बाद यकायक फिल्मी गीतों की निम्न पंक्तियों का स्मरण होता है।
चाहे लाख करो तुम पूजा तीरथ करो हजार
दीन दुखी को ठुकराया तोह सब कुछ है बेकार
गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा
तुम एक पैसा दोगे,वो दस लाख देगा

साथ ही निम्न पंक्तियां भी याद आ जाती है
तुझको राखे राम तुझको अल्हा रखे
दे दाता के नाम तुझको अल्हा रखे

उक्त गीतों को जिन अभिनेताओं और अभिनेत्रियों पर फिल्माया है,उन कलाकारों ने निश्चित ही भिखारी का अभिनय करने के लिए बेशकीमती मान धन लिया ही होगा?
क्या भिक्षावृत्ति को समाप्त करने वाले भिखारियों को रोजगार मुहैया करवा ने सहयोग करेंगे?
ये लोग कुछ भिखारियों को गोद में लेंगे और उनका लालन पालन करेंगे?
क्या ये लोग मुफ्त राशन,बिजली,पानी मुहैया करवाने वाली राजनीति का विरोध करने में सक्षम हैं?
जो राजनीति गरीब जनता को स्वावलंबी बनाने के बजाए परावलंबी बना रही है। ऐसी राजनैतिक व्यवस्था का विरोध करेंगे?
धार्मिक स्थानों के बाहर भिखारियों की तादाद को आस्था के नाम पर के दिए जाने दान रूपी भीख का विरोध करेंगे?
ऐसे अनेक व्यवहारिक प्रश्न उपस्थित होते हैं।
किसी भी समस्या का हल हाथों में तख्ती लेकर चौराहे पर खड़े होने से नहीं होगा?
किसी भी समस्या को गहराई से समझने के बाद उस पर गंभीरता और ईमानदारी से विचार कर उसका हल ढूंढने के पूर्व,किसी भी समस्या का फैशनेबल विरोध करना दिखावा मात्र है।
भिक्षा शब्द पर व्यापक बहस की आवश्यकता है।
हयात ले के चलो काएनात ले के चलो
चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो

इस शेर के रचियता हैं शायर मख़दूम मुहिउद्दीन

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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