रीवा जिला की कानून व्यवस्था काफी बदहाल और चिंताजनक है । सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब बारी खुद खेत खाने लगे तो फसल कैसे सुरक्षित होगी । जिला की कानून व्यवस्था का यही संकट है जो सामने दिख रहा है । जिला सरकारी केन्द्रीय बैंक शाखा डभौरा के करोड़ों रूपए के घोटाले में वहां के एसडीओपी और थाना प्रभारी का हेराफेरी में शामिल होना अत्यंत शर्मनाक और चिंताजनक बात है ।
इतने बड़े कांड की गबन राशि में बंदरबांट करने वाले दो जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की अत्यंत गैरजिम्मेदराना आपराधिक कृत्य पर उनका अभी केवल निलंबन हुआ है । जिसको लेकर जन साधारण में काफी आक्रोश है । कई घटनाएं हैं जिसमें पुलिस वर्दी में आतंक फैलाया गया । पुलिसकर्मियों पर विभागीय जांच बैठाकर कुछ समय में क्लीन चिट दे दी जाती है वहीं आम आदमी बेकसूर होने पर भी पुलिस की प्रताड़ना से नहीं बच पाता है । कुछ सालों से बड़े अपराधों का ग्राफ बढ़ा है ।
कई मामले ऐसे हैं कि जिसमें थाने में एफआईआर दर्ज ही नहीं होती है । रीवा में अनेक ऐसे मामले हैं जिनकी गुत्थी आज तक नहीं सुलझी है । यातायात व्यवस्था पंगु है और सैकड़ों निर्दोष लोग हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं लेकिन उसका ग्राफ भी नहीं गिर रहा है । कितने ऐसे बड़े आपराधिक मामले हैं जिनकी सच्चाई दबा दी गई । बीहर नदी में दस दिन तक लाश सड़ने के बाद उसे बरामद किया जाएगा तो जांच में क्या निकलेगा । इधर अस्पताल में इलाज में हुई लापरवाही के कारण इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र की मौत के मामले को जिस तरह रफा-दफा किया गया वह छिपा नही है । छात्र प्रमोद तिवारी की आंख की रोशनी छीनने वाले पुलिसकर्मियों को बचाया जा रहा है वहीं बीसीए के छात्र प्रमोद को आदतन अपराधी बताने की ओछी हरकत हो रही है । क्या पुलिस को किसी घोषित अपराधी की आंख फोड़ने का अधिकार है ? खतरनाक से खतरनाक आतंकवादी जिनको फांसी की सजा होती है उसकी भी आंख फोड़ने का अधिकार किसी को नहीं मिला है । शांतिपूर्ण जनआंदोलनों को कुचला जा रहा है । 27 मार्च 2013 को नरेन्द्रनगर में सनतावन दिन से चल रहे शांतिपूर्ण क्रमिक धरना कार्यक्रम को जिस षड़यंत्र के साथ खत्म कराने के लिए गुण्डे भेजकर वहां दो गुटों का झगड़ा दिखाकर आंदोलनकारियों को फर्जी तरीके से फसाकर जेल भेजा और रात में ही समदड़िया मॉल का काम शुरू करवाया गया यह बात सबकी जुबान पर है । कानून में किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए । जब पुलिस पर कोई हमला होता है तो अपराधी को पकड़ने के लिए रणभेरी बजा दी जाती है लेकिन जब आम आदमी पर हमला होता है तो उसे हल्के से लिया जाता है और यदि कोई निर्दोष पुलिसिया चंगुल का शिकार बनता है तो उसका हश्र प्रमोद तिवारी जैसा होता है । ये दोहरे मापदण्डों से लोगों को न्याय कैसे मिलेगा । लोकतंत्र में लोगों को अपनी आवाज उठाने का अधिकार है लेकिन यह भारी बिड़म्वना है कि यहां कहीं कोई सुनवाई नहीं है । पुलिस की एफआईआर न्यायिक प्रक्रिया का आधार है जिसे न कायम करना सरासर मनमानी है ।





