अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

आर एस एस – एक छोटी सी लंबी किताब*

Share

संघ का विश्लेषण करती कन्नड़ लेखक की पुस्तक*

हरनामसिंह

           कन्नड़ लेखक देव नूर महादेवा हिंदी पाठकों के लिए कोई पहचान हुआ नाम तो नहीं है। लेकिन आरएसएस पर लिखी उनकी एक छोटी सी पुस्तक ने उनकी पहचान को पंख लगा दिये। कन्नड़ में लिखी 2022 में प्रकाशित उनकी इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद आ चुका है। उससे पहले तमिल, तेलुगू, मलयालम, मराठी में अनुवादित होकर यह  पुस्तक साहित्य जगत में चर्चित हो गई है। पुस्तक की एक लाख से अधिक  प्रतियों को पाठकों ने हाथों हाथ लिया है।
        लेखक के परिचय अनुसार वे स्कूली दिनों से ही संघ से जुड़े थे। संघ के नारे सभी हिंदू एक हैं ने उन्हें प्रभावित किया। लेकिन कुछ ही वर्षों में संघ में जातिगत भेदभाव, मुसलमानों के प्रति घृणा, अंतरजातीय विवाह के प्रति नकारात्मक भाव ने उन्हें गहराई तक विचलित कर दिया था। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने संघ से नाता तोड़ लिया।
           वर्ष 1975 में आपातकाल के विरुद्ध प्रतिरोध में शामिल रहे देवनूर महादेवा ने वर्ष 2015 में जब देश में असहिष्णुता बढ़ी तब अन्य लेखकों की तरह उन्होंने भी विरोध स्वरूप सरकार से प्राप्त सम्मान सामग्री को लौटा दिया। उनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार और भारत सरकार का पद्मश्री पुरस्कार की शामिल था।
          उनकी पहचान नैतिक शक्ति रखने वाले चिंतक, बहुलतावाद और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए दृढ़ पक्षधर के रूप में रही है। उनके अनुसार संघ, सम्मोहन और स्वांग रचने में माहिर जादूगर है। संघ हिंदुओं में भय और घृणा का सम्मोहन फैला कर हिंदुत्व के नाम से उन्हें लामबंद करता है। झूठ ही उनके कुल देवता हैं, इन्होंने छल और धोखा करने की फैक्ट्री खोल रखी है।
        पुस्तक की शुरुआत  गोलवलकर और सावरकर के उद्दरणों से होती है, जिन्होंने संघ के हिंदुत्व की वैचारिक नींव रखी थी। महादेवा के अनुसार गोलवलकर चार वर्णों की व्यवस्था में ही भगवान देखते हैं तो सावरकर मनुस्मृति को हिंदुओं का कानून और मौलिक सत्य बताते हैं। गोलवलकर हिटलर से प्रभावित हैं, वे जर्मनी के नस्लीय गर्व और अपनी जाति की सांस्कृतिक पवित्रता के लिए, यहूदियों से मुक्त करने की प्रशंसा करते हैं और उनसे सीखने की बात कहते हैं। उनके अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय को राष्ट्रीय नस्ल में घुल मिल जाना चाहिए अन्यथा उन्हें किसी भी प्रकार की सुरक्षा और विशेष अधिकार नहीं मिलना चाहिए। गोलवलकर का संघ एक झंडा, एक नायक, एक विचारधारा, एक भाषा से प्रेरित है। संघ के लिए हिटलर की आर्य नस्ल की सर्वश्रेष्ठता आदर्श है।

 #संघ सरकार और संविधान*
       संघ ने प्रशासन तंत्र और समाज पर नियंत्रण कर लिया है। इनके शासन में मीडिया, न्यायपालिका, कार्यपालिका ने अपनी शक्ति खो दी है।हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के तहत संघ और सरकार देश के पुराने कानूनों में संशोधन कर उन्हें वर्ण व्यवस्था के अनुरूप ढाल रही है। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संविधान में दिए गए अधिकारों को धीरे-धीरे छीना जा रहा है। लेखक के अनुसार भाजपा शासित राज्यों में भगवत गीता को पाठ्यक्रम में शामिल 

करने के पीछे वर्ण व्यवस्था को ही मान्यता दिलवाना है। भगवत गीता में कृष्णा स्वयं कहते हैं कि मैंने ही चार वर्णों को उत्पन्न किया है। शिक्षा व्यवस्था में अंधविश्वासों को जोड़ा जा रहा है। 1998 की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने पाठ्यक्रम में पौरोहित्य, कर्मकांड, ज्योतिष शास्त्र को जोड़ा था।एक अध्याय में बताया गया कि यज्ञ द्वारा कैसे पुत्र पैदा किया जा सकता है। ऐसे ही प्रयोग वर्तमान सरकार भी गोमूत्र और गोबर को लेकर कर रही है। सरकार ने पाठ्यक्रम से धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों वाले लेखों को हटाकर सांप्रदायिकता फैलाने वाले पाठ को शामिल किया है।
बंच ऑफ़ थॉट्स में गुरु गोलवलकर देश की संवैधानिक संघीय व्यवस्था से सहमत नहीं थे। वर्तमान केंद्र सरकार उसी असहमति के अनुरूप राज्यों के अधिकार कम कर रही है। जीएसटी पहली नजर में अर्थव्यवस्था सुधार करने का कानून लगता है, पर व्यवहार में केंद्र सरकार टैक्स का पूरा पैसा राज्यों से ले लेती है उसके बाद राज्य अपने हिस्से के लिए केंद्र से गिड़गिड़ाते रहते हैं। ऐसे ही अधिकार केंद्रिय जांच से एजेंसियों को भी दिए गए हैं। ये एजेंसियां बिना राज्य सरकारों की सहमति,जानकारी अथवा मशवरे के राज्यों में जाकर किसी को भी गिरफ्तार कर लेती हैं। चाहे वह राज्य का मंत्री अथवा मुख्यमंत्री ही क्यों न हो।
वर्ण व्यवस्था के अनुरूप देश में आरक्षण को समाप्त करने के लिए संविदा आधारित नौकरियां दी जा रही है। निजीकरण में तो आरक्षण व्यवस्था है ही नहीं। संवैधानिक अधिकार प्राप्त कर्मचारियों को आज्ञाकारी सेवक में बदला जा रहा है। इसी के अनुरूप महिलाओं को घरों की चारदिवारी में सीमित रखने के लिए ही शिक्षा का निजीकरण कर उसे मंहगा किया जा रहा है। इसके कारण समाज का वंचित वर्ग और लड़कियों की शिक्षा में भी गिरावट देखी जा रही है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की निगरानी करने वाली एक संस्था के अनुसार वर्ष 2017 से वर्ष 2022 के बीच दो करोड़ महिलाएं रोजगार से बाहर कर दी गई है। यह सब अनायास नहीं हुआ है। सोची समझी योजना के तहत किया जा रहा है ताकि मनुस्मृति में महिलाओं के लिए की गई व्यवस्था के अनुरूप उनके जनजीवन को ढाला जा सके। हिंदू महिलाओं को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करना, इसी योजना का एक भाग है इसी के लिए धार्मिक असंतुलन का प्रचार कर हिंदुओं को डराया जाता है।
संघीय व्यवस्था हमारे संविधान की आत्मा है। एकाधिकार कायम करने के लिए राज्यों को कमजोर किया जा रहा है। ऐसा ही भाषा के मामले में भी है। वर्तमान सरकार देश की विविधता को समाप्त कर एक भाषा, एक नेता, एक नस्ल की विचारधारा देश पर थोप रही है।

झूठ ही कुल देवता है*

          अपने जन्म के समय से ही आरएसएस धोखा और छल करता आया है। 14 मार्च 1948 को डॉ राजेंद्र प्रसाद जो शीघ्र ही राष्ट्रपति बनने वाले थे उन्होंने गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखकर बताया था कि आरएसएस वाले देश में अशांति फैलाने की योजना बना रहे हैं। कुछ लोग मुसलमानो के वेश में हिंदुओं पर हमला करेंगे ताकि उन्हें भड़काया जा सके। ऐसे कई उदाहरण अतीत और वर्तमान में सामने आ चुके हैं।
        संघ प्रचारक टीपू सुल्तान पर आरोप लगाते हैं कि उसने कोडागू में  69 हजार हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया था। उसे समय कोडागू की आबादी बहुत कम थी। अगर यह सच होता तो आज कोडागू में सभी मुसलमान होते, जबकि कोडागू में मुसलमानों की आबादी मात्र 15 प्रतिशत है। यह टीपू सुल्तान के लिए नफरत पैदा करने का प्रचार है। झूठ ही उनका कुल देवता हैं, इन्होंने छल और धोखा करने की फैक्ट्री खोल रखी है। 
       संघ की शाखाओं में अनुशासन के नाम पर अंधभक्ति सिखाई जाती है। श्री गुरु जी समग्र दर्शन में गोलवलकर  कहते हैं *अगर हम यह कहते हैं कि हम संस्था के अंग हैं... तो जीवन में चुनने का विकल्प समाप्त हो जाता है। वही करो जो कहा जाता है... बिना सवाल किये आज्ञा का पालन करना चाहिए। उनके विवेक की कोई आवश्यकता नहीं है।*
        संघ के अनुसार उनकी मान्यता और विश्वास ही इतिहास है उसे सत्य से कोई मतलब नहीं है।
       महादेवा की भाषा में क्रोध नहीं है, गहरी उदासी है। लेखक चाहता है कि भाजपा और संघ की विभाजनकारी राजनीति के विरुद्ध एक साझा मंच बने ताकि हमारे बच्चों में विवेक और करुणा बची रहे।
      पुस्तक की भाषा सरल है परंतु अध्याय विभाजन एवं शीर्षक लेखन के अनुरूप नहीं है। समकालीन हालत में विषय की प्रासंगिकता ने आकर्षित किया है। पुस्तक में और अधिक उदाहरण जोड़े जा सकते थे। पुस्तक उन सुधी पाठकों को अवश्य पढ़ाना चाहिए जो संघ के बढ़ते प्रभाव को समझना चाहते हैं।

हरनाम सिंह

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें