साल 1985 था, वो दौर जनरल जियाउल हक़ की तानाशाही का था जब पत्ता पत्ता तक जनरल जिया से काँपता था।
ऐसे ही ख़ौफ़नाक दौर में लाहौर स्टेडीयम में लगभग पचास हज़ार की भीड़ के सामने इक़बाल बानो काली साड़ी पहन कर सत्ता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध को हवा देती हैं। वो भी जब जनरल जिया के दौर में काली साड़ी बैन थी।
फ़ैज़ साहब की लिखी हुई “हम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे” गाकर पाकिस्तान की सियासत एवं इंक़लाब का हिस्सा बना देती हैं।
जानते हो इसके बाद क्या होता है? इसके बाद इक़बाल बानो को पब्लिक लाइफ़ एवं शो से हमेशा के लिये रोक लगा दी जाती है।
इक़बाल बानो की हिम्मत को सलाम जो उन्होंने मुल्क के सबसे ताक़तवर शख़्स के ख़िलाफ़ ऐसा एतिहासिक विरोध किया था, इतिहास में ऐसी मिसाल बहुत कम देखने को मिलेगी।
इक़बाल बानो ही नहीं हबीब जालिब से लेकर ऐसे कई उदाहरण हैं जो जेल जाने से नहीं डरे हमेशा सरकारों की ज़ुल्म एवं तानाशाही के ख़िलाफ़ बोलते एवं लड़ते रहे।
ऐसा उदाहरण तो आपको अपने यहाँ देखने को नहीं मिलेगा। क्योंकि भारतीय कलाकार कायर हैं जो वक़्त के हिसाब से समझौता करके सरकारों की दलाली करते हैं।
भारतीय कलाकार बिजनेस मैन हैं। इन्हें कलाकार कहना कला की बेइज़्ज़ती है।
Majid Majaz की वाल से…






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