ले बलैय्या…! संकर्षण ठाकुर नहीं रहे। “ले बलैय्या…” मैथिली की आम बोलचाल में कहा जाने वाले इस विस्मयादिबोधक पद को वर्षों तक अपना व्हाट्सऐप स्टेटस बनाकर रखने वाले देश के शीर्षस्थ पत्रकारों में से एक संकर्षण ठाकुर के निधन पर शोक के साथ यह स्टेटस याद हो आया। कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी उपस्थिति विदा होने के बाद भी लंबे समय तक महसूस होती रहती है। संकर्षण ठाकुर उन्हीं में से एक थे।
एक ऐसे पत्रकार, जिनकी कलम ने न केवल अपने समय की सियासत को नए कोण से समझाया बल्कि आने वाले समय की आहटें भी बेहद सटीकता से पकड़ीं, अब हमारे बीच नहीं हैं। जीवन के अंतिम समय तक द टेलीग्राफ समूह के एडिटर इन चीफ रहे ठाकुर पत्रकारिता में अमूल्य ख्याति छोड़कर वे इस संसार से कूच कर चुके हैं। तेज चमक-दमक वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उफान के दौर में भी वे हमेशा प्रिंट मीडिया की गंभीरता को चुना। वो कहते थे कि खबरें सतही नहीं, गहरी होनी चाहिए, और पत्रकार को शोर नहीं, असर छोड़ना चाहिए। आज पत्रकारिता का वो इंस्टीच्युशन इस विधा पर अपना गहरा असर छोड़कर जा चुका है।
पत्रकारिता में सर्वोपरी नैतिकता संकर्षण ठाकुर का नैतिक बल अदम्य था। व्यवसायिकता के इस दौर में भी उन्होने पत्रकार की गरिमा और नैतिकता को सर्वोपरी रखा। 2015 के बिहार चुनाव कवरेज के दौरान का एक वाकया है। देश के इतने बडे पत्रकार को मैदान में देख कई पार्टियाँ लॉजिस्टिक्स सुविधा उपलब्ध करवाना चाहती थी। संकर्षण ठाकुर अपने जुनियर्स को प्यार से समझाते थे, “आज किसी नेता की गाड़ी पर चढोगे तो कल वो माथे पर चढ जाएगा। उनका यही नैतिक बल था कि किसी भी राजनीतिक शक्ति के सामने उन्होंने अपनी कलम को झुकने नहीं दिया। 90 के दशक से लेकर 2000 के शुरुआती वर्षों में बिहार की सत्ता में लालू प्रसाद यादव वर्चस्व और निरंतर हो रहे अपराध ने माननीय न्यायालय को भी “जंगलराज” कहने पर मजबूर कर दिया था। उस दौर में जहाँ लोग ऑन रिकॉर्ड कुछ बोलने से भी डरते थे, संकर्षण ठाकुर ने उन्हीं दिनों बिहार में अराजकता पर बोल्ड किताब लिख दिया – ” सबल्टन साहेब: बिहार एंड दी मेकिंग ऑफ लालू यादव”। इतनी निर्भीकता उच्च नैतिकता, ईमानदारी और जवाबदेही से ही आती है।
राजनीतिक पत्रकारिता और अचूक अनुमान भारत की राजनीति को तुरंत पढ़ लेना और उसके संकेतों को दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में समझना संकर्षण ठाकुर की सबसे खास क्षमता थी। उनकी लेखनी में न तो विचारधारा की अंधभक्ति थी, न ही नेताओं की चापलूसी। वे सत्ताधारी नेताओं के लिए असुविधाजनक और विरोधियों के लिए असहज करने वाले सवाल पूछते थे।
उनका सबसे चर्चित योगदान यह रहा कि वे पहले पत्रकार थे जिन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया था। यह 2002 के आसपास की बात है, जब गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय विमर्श में विवाद के केंद्र थे। उस समय अधिकांश पत्रकार उनकी राजनीतिक संभावनाओं को नज़रअंदाज़ कर रहे थे, लेकिन संकर्षण ठाकुर ने लिखा कि मोदी की राजनीति केवल गुजरात तक सीमित नहीं रहेगी। लगभग बारह साल बाद उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई। इसी तरह 2014 में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद जब बिहार विधानसभा चुनाव की बारी आई, तो संकर्षण ठाकुर ने दो टूक कहा कि भाजपा किसी भी हालत में बिहार चुनाव में जीत हासिल नहीं कर पाएगी। उस समय पूरे देश के विश्लेषक और सर्वेक्षण यह बता रहे थे कि मोदी लहर बिहार को भी बहा ले जाएगी। लेकिन ठाकुर डटे रहे। 2015 में चुनाव परिणाम आने पर उनकी भविष्यवाणी अक्षरशः सही साबित हुई। भाजपा उतनी ही सीटों पर सिमट गई जितनी कि उन्होंने अनुमान लगाई थी। पत्रकारिता में इस तरह की दूरदर्शिता बहुत कम देखने को मिलती है। देश की राजनीति की नब्ज़ पहचानने वाले ठाकुर जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक मामलों पर भी अत्यंत पैनी नजर रखते थे। कश्मीर की राजनीतिक समस्या की परख और विश्लेषण में उन्हे महारत हासिल थी।
वर्ष 2003 में कश्मीर पर रिसर्च के लिए उन्हें अप्पन मेनन फेलोशिप दिया गया था। इसके अतिरिक्त वर्ष 2001 में राजनीतिक रिपोर्टिंग के लिए उन्हें प्रेम भाटिया पुरस्कार से नवाजा गया था।
ठाकुर की लेखन-शैली संकर्षण ठाकुर के लेख केवल खबर भर नहीं होते थे। वे शब्दों से एक दृश्य खड़ा करते थे। राजनीति की भीतरी चालों, नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और जनता की उम्मीदों को वे ऐसे पिरोते कि पाठक को लगता जैसे आंखों के सामने एक पूरा नाटक चल रहा हो। उनकी शैली निरपेक्ष होने के बावजूद मानवीय थी। उनका विश्वास था कि पत्रकार का काम केवल सूचनाएं देना नहीं, बल्कि समाज को उसका आईना दिखाना भी है। वे पत्रकारिता में मूल्य सृजन के पक्षधर थे। अंग्रेजी, हिंदी और मैथिली भाषा पर उनका समान अधिकार था लेकिन उनकी अंग्रेजी असाधारण थी। अंग्रेजी के अखबारों में उनके आलेख एक एक शब्द इतने मारक और वजनी होते थे कि शब्दकोष निकाल कर भी उनका विकल्प खोजना आसान नहीं था। उनकी अंग्रेजी धारदार लेकिन सुसंस्कृत थी, और मैथिली व हिंदी में की गई बातचीत में वही व्यक्ति अत्यंत आत्मीय और सरल प्रतीत होता। यही द्वैत उन्हें भारतीय पत्रकारिता का अद्वितीय व्यक्तित्व बनाता है।
उनके लेखन में गहराई, बहुआयामी चित्रण और समाज की जड़ों व सत्ता की चालों का सटीक विश्लेषण देखने को मिलता था। वे केवल खबरें पेश नहीं करते थे, बल्कि हर खबर के पीछे छुपे मानवता और सामाजिक परिप्रेक्ष्य को उजागर करते थे। संकर्षण ठाकुर का पत्रकारिता में चार दशकों का अनुभव भारतीय मीडिया के इतिहास में एक उदाहरण के रूप में स्थापित है। उनके योगदान ने राजनीतिक रिपोर्टिंग को गहराई, संवेदनशील दृष्टिकोण और बेबाकी से संपन्न किया। उनकी लिखी किताबें बिहार और राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य बन गई हैं। निडर खबर और जन-सरोकार संकर्षण ठाकुर की लेखनी ने राजनीति के गहरे सच को उजागर किया। उनके लेखन का मुख्य फोकस बिहार की राजनीति, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, कश्मीर, श्रीलंका संकट, कारगिल युद्ध, भोपाल गैस हादसा, 1984 के सिख विरोधी दंगे और इंदिरा गांधी की हत्या पर रहा। उन्होंने बड़े नेताओं की चमक-दमक से परे आम जनता की आवाज़ को प्रमुखता से प्रस्तुत किया।
संकर्षण ठाकुर के जीवन की सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज सेवा और सच्चाई की खोज का माध्यम माना। वे अपने परिवार, बिहार की धरती, और देशवासियों से जुड़े रहे और उनके कार्य ने भारत को अपने आप को गहराई से सोचने, समझने और सुधारने की प्रेरणा दी। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस सोच का जाना है जो पत्रकारिता को जनता और लोकतंत्र की धड़कनों से जोड़कर देखती थी।
पत्रकारिता – पीढ़ी से मिली विरासत संकर्षण ठाकुर का जीवन और उनकी लेखनी एक गहरी परंपरा की देन थी। उनके पिता जनार्दन ठाकुर बिहार के दिग्गज पत्रकार थे। जनार्दन ठाकुर की तेजधार लेखनी और निर्भीकता का असर संकर्षण ठाकुर के लेखन में साफ़ दिखता था। यह विरासत केवल पेशे की नहीं, विचार की भी थी। दरअसल, ठाकुर परिवार ने बिहार की पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन को कई दशकों तक दिशा दी। संकर्षण ठाकुर का जन्म पटना में हुआ था, लेकिन उनकी जड़ें दरभंगा जिले के सिंघवारा गांव में थीं। इस मिट्टी से रिश्ता उनके जीवन भर कायम रहा। वे अक्सर कहते थे कि पत्रकारिता चाहे विश्व राजनीति तक फैली क्यों न हो जाए, लेकिन उसकी गंध वही पहचान सकता है जो अपने गांव-खेत से जुड़ा रहे। मातृभूमि और मातृभाषा से लगाव संकर्षण ठाकुर का गहरा रिश्ता अपनी जड़ों से था।
मिथिला और मैथिली सिर्फ उनकी पहचान भर नहीं, बल्कि उनके हृदय की धड़कन थे। वे पटना के मिशनरी स्कूल में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर चुके थे और उसके बाद उन्होंने अंग्रेजी पत्रकारिता में अपार नाम कमाया। लेकिन दिल की भाषा मैथिली ही रही। यह दिलचस्प है कि उनकी मां लखनऊ की रहने वाली एक हिंदी भाषी युवती थीं। विवाह के बाद उन्होंने न केवल मैथिली सीखी बल्कि अपने बच्चों को भी यही भाषा सिखाई। संकर्षण ठाकुर अक्सर मैथिली में बातचीत किया करते थे, खासकर जब सामनेवाला भी मिथिलांचल से हो। यह उनका अपनेपन का तरीका था। गांव और खेत से जुड़ा रिश्ता पत्रकारिता में अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्लेषण करने वाले संकर्षण ठाकुर को गांव और खेत की याद हमेशा खींच लाती थी। वे अक्सर खेती के दिनों में गांव जाते और धान की रोपाई में मज़दूरों के बीच बैठ जाते।
खेत की मेड पर बैठे सिगरेट पीते हुए, किसानों से सहज बातचीत करते संकर्षण को देखकर कोई अंदाज़ा ही नहीं लगा सकता था कि यही व्यक्ति राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति पर सबसे तगड़े विश्लेषण लिखता है। उनके भीतर यह ‘दोहरा संसार’ – एक तरफ़ आधुनिक, अंग्रेज़ी अख़बारों का ग्लोबल पत्रकार और दूसरी तरफ़ मिट्टी से सना मिथिला का बेटा – उन्हें खास बनाता था। एयरकंडीशंड ड्राइंगरूम और स्टूडियो की चमक-दमक से अलग, संकर्षण ठाकुर पत्रकारिता की असलियत चाय की दुकानों, चौपालों और खेत-खलिहानों में खोजते थे। सत्ता के दरबारों की बजाय उन्हें गाँव के आंगनों और आम लोगों की जुबानी बातें अधिक आकर्षित करती थीं। 1 अणे मार्ग और पारिवारिक इतिहास बिहार की राजनीति के वर्तमान केंद्र 1 अणे मार्ग से भी संकर्षण ठाकुर का पारिवारिक रिश्ता जुड़ा रहा।
कभी उनके दादा बतौर पटना एसडीएम इसी पते पर निवास करते थे। स्वतंत्रता के बाद जब श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने, तो इसी भवन के ग्राउंड फ्लोर पर उनका निवास था और ऊपरी मंजिल पर मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव और संकर्षण ठाकुर के दादा और उनका परिवार रहता था। यह संयोग ही था कि वही घर आगे चलकर बिहार की राजनीति का सबसे चर्चित पता बना और बाद में एक पत्रकार के रूप में संकर्षण ठाकुर ने भी वहीं से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रमों को अपनी लेखनी में दर्ज किया।
पत्रकारिता-जगत के लिए अपूर्णीय क्षति पत्रकारिता की दुनिया उनकी अनुपस्थिति बहुत दर्द के साथ महसूस करेगी। उन्होंने कभी खुद को ‘स्टार पत्रकार’ बनाने की कोशिश नहीं की। वे भीड़ में कैमरे की ओर देखकर बोलने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे खामोश पर्यवेक्षक थे, जिनकी कलम का हर शब्द भारी था। संकर्षण ठाकुर को याद करना दरअसल बिहार, मिथिला और भारतीय पत्रकारिता की उस परंपरा को याद करना है, जो सादगी में गहराई और भविष्यवाणी में सटीकता रखती है। खेत की महक, मातृभाषा का लहजा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक फैला नजरिया – इन तीनों का संगम ही संकर्षण ठाकुर थे।





