दहलीज लांघी जब विद्यालय की
तो याद आया
जा चुके वक्त में
बच्चों का हंसना-मुस्कुराना,
एक दूसरे से लड़ना
और फिर गले से लग जाना।
अध्यापक की ज़रा सी
डांट पर बच्चों का रूठ जाना
पहले नम आंखें कर
फिर अश्रु बहाना।
अध्यापक का जरा सा
देखकर मुस्कुराना,
फिर अपनी ममता की
छाया में लेकर
मां की तरह चुप करवाना।
मगर जब वक्त ने अपनी
दहलीज लगी तो
अध्यापक ने कहा,
“सामने जो बैठे थे कल
मेरे वो बच्चे कहां?”
विद्यालय के बाहर खड़े
बच्चों ने कहा,
“डांटा कर भी जीवन का
सही राह दिखाते
मेरे वो अध्यापक कहा?”
डॉ.राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(हिंदी अध्यापक)
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