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फ़िल्म वो पचास दिन की पटकथा

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यह बात सभी भुक्त भोगियों के जेहन में अच्छे से नोट हो गई है।नोट बंदी के निर्णय को पांच वर्ष पूर्ण हो गए हैं।मतलब साठ माह समाप्त हुए हैं।इस मुद्दे पर बहस का विषय है?पचास दिन बनाम साठ माह?
इस विषय पर एक अच्छी फिल्म बन सकती है। फ़िल्म का टाईटल यह हो सकता है।
वो पचास दिन।
फ़िल्म में नोट बदलने के लिए लगी,जनता की लंबी कतारों का दृश्य दिखाना जरूरी होगा?
अत्याधुनिक तकनीक मतलब कंप्यूटर के माध्यम से किसी भी तरह के कैसे भी दृश्य दिखाना आसान हो गया है।
यदि कोई फ़िल्म निर्माता वो पचास दिन नाम से फ़िल्म बनाता है, तो निर्माता को तात्कालिक पचास दिनों के दृश्य समाचार माध्यमों के पास मिल जाएंगे।
यह फ़िल्म Tragedy फ़िल्म बनेगी? इस फ़िल्म में Tragedy अर्थात त्रासदी के दृश्य होंगें। फिल्मों में ऐसे दृश्यों के साथ Sad song अर्थात दुःख भरें गीत दृश्य के बैक ग्राउंड में प्रस्तुत करना पड़ेंगे।
फ़िल्म मदर इंडिया का गीत तात्कालिक पचास दिनों की त्रासदी को ध्यान में रखतें हुए, इस प्रकार प्रस्तुत करना पड़ेगा।
सुख भरें दिन बीते रे भैया अब दुःख आयों रे
रंग जीवन का सारा उजाड़ गयों रे
एक दृश्य ऐसा भी फिल्माया जा सकता है।एक ओर त्रासदी की शिकार वयोवृद्ध,कृशकाय,दादी और नानी कतार में खड़ी है।
दूसरी ओर अस्सी सावन,बराबर नो सौ साठ माह, मतलब आठ दशक देख चुकी माँ को बेटा बाकयदा व्हील चेयर पर कतार में खड़ा करता है।अधिकांश संचार माध्यम इस दृश्य को कैमेरे में कैद कर महिमामंडित करतें हुए,इस तरह दर्शाने का प्रयास करतें है, मनों, कलयुग में आधुनिक श्रवण अपनी माँ को कावड़ में बैठा कर तीर्थ यात्रा करवा रहा हो?
बहुत से दृश्यों में कतार में खड़े विकलांग लोगों को भी दिखाना पड़ेगा।
भारतीय गृहिणियों ने आपातकाल के लिए गुप्त रूप से एकत्रित किए हुए रुपयों को, जो
उनके जीनव साथी ने अपना पसीना बहा कर मेहनत से कमाएं हैं।उन रुपयों को बदलने के लिए याचक बन कतार में खड़े होने का दृश्य भी फिल्माया जाना चाहिए।
नोटबंदी की घोषणा के बाद नोट बदलने के लिए दी गई समयावधि के दौरान कतार में खड़े लोगों में लगभग दो सौ लोगों से ज्यादा लोग इहलोक छोड़ परलोक सिधार गएं।भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।
एक दृश्य यह भी फिल्माया जा सकता है।मानो परलोक से पीड़ितों की आत्मा यह पंक्तियां गुनगुना रही है
वो भी क्या दिन थे हमसे अच्छेदिनों का वादा किया था कभी
और हँस हँस के तुम ने जुमले सुनाएं थे कभी
खेल ही खेल में क्यों जान पे बन आई है
यह गहरी चोट हमें परलोक ले आई है।
फ़िल्म फ़्लैश बैक के सीन से शुरू होगी।

कुछ लोग एक विशेष रंग का दुपट्टा गले ओढ़े अच्छेदिनों के संवादों को बार दोहराएंगे।
चुनाव के नतीजों के बाद लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत के पहले पायदान पर अभनेता को माथा टेकते हुए दिखाने से फ़िल्म की शुरुआत होगी।
फ़िल्म में संवाद की जगह जुमले बोले जाएंगे?
देशी फिल्मों में प्रायः ऐसा ही होता है।
अभिनेता,अभिनेत्री के समक्ष आसमान में चांद तारे तोड़ कर लाने का वादा करता है।
गाना गातें हुए अभिनेता किसी गरीब बच्चें को गोद में भी उठा लेता है।फ़िल्म निर्माण में करोड़ो की लागत लगती है।
नोट बंदी पर बनने वाली फिल्म एकदम सफेद रूपयों से बनेगी।
कलाकरों को उनका पारिश्रमिक कैशलेस तरीके दिया जाएगा।
वो पचास दिन फ़िल्म में किसी चौराहे का दृश्य भी दर्शाना जरूरी होगा।कारण पचास दिनों का और चौहरे का अपना एक अलग ही महत्व है?
चौराहे पर जमा भीड़ में लोगों को बहस करते हुए दर्शाया जाएगा।
एक ओर सामान्य जन दूसरी ओर सावन के अंधे इस कहावत को चरितार्थ करने वाले भक्त लोग होंगे।
बहस का नतीजा अंडर स्टुड ही होगा।यहीँ पर फ़िल्म का दी एंड होगा?
बहुत ही धीमी आवाज में बैक ग्राउंड में टायटल सांग बजेगा।
सुख भरे दिन बीतें रे भैया……..
यह फ़िल्म पूर्ण रूप से सस्पेंस फ़िल्म होगी?

शशिकांत गुप्ते इंदौर
:

Ramswaroop Mantri

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